Thursday, November 24, 2011

बच्चों की तस्करी रोकने को बनेंगे 335 मानव तस्करी रोधी यूनिट


बच्चों की बढ़ती तस्करी को देखते हुए केंद्र सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष निर्देश जारी किए हैं। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी निर्देश में स्कूलों, स्कूल बसों, बच्चों के पार्को और रिहाइशी इलाकों में पुलिस गश्त बढ़ाने से लेकर अन्य उपाय करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही सरकार पूरे देश में 335 मानव तस्कर रोधी यूनिट खोलने की योजना भी बना रही है। राज्य सभा में एक सवाल का जबाव देते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि मानव तस्करी को रोकने की योजना के तहत देश में कुल 10 हजार पुलिस कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उनके प्रशिक्षण की प्रक्रिया अगले तीन साल में पूरी हो जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित 335 मानव तस्करी रोधी यूनिटों में से 115 यूनिट खोलने के लिए पहली किस्त के रूप में 8.72 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए हैं। जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैसे तो कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। पर बच्चों की सुरक्षा की अहमियत को देखते हुए केंद्र ने राज्य सरकारों को दिशानिर्देश जारी करने के साथ ही विशेष सहायता उपलब्ध कराने का फैसला किया है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी दिशा निर्देश में बच्चों और खास कर लड़कियों की तस्करी रोकने के लिए केंद्र ने राज्य सरकारों को ऐसे इलाकों की पहचान करने को कहा गया है, जहां बच्चों की तस्करी की आशंका सबसे अधिक होती है। ऐसे इलाकों में बीट कांस्टेबलों और पुलिस सहायता केंद्रों की संख्या बढ़ाने से लेकर महिला पुलिस की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति करने को कहा गया है।

Tuesday, November 22, 2011

ऐतिहासिक फैसले के बाद खामोशी क्यों


गुजरात दंगों पर पिछले नौ सालों से नरेंद्र मोदी विरोध का झंडा उठाने वालों का सरदारपुरा फैसले पर खामोशी विचलित करने वाली है। यह आजाद भारत के इतिहास में न्यायालय का पहला फैसला है, जिसमें एक साथ दंगों के 31 आरोपियों को सजा मिली है। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर गंभीरता और विस्तार से चर्चा नहीं हो रही। सच कहें तो मेहसाणा के विशेष न्यायालय ने सरदारपुरा दंगों के फैसले द्वारा इतिहास बना दिया है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआइटी) द्वारा जांच किए गए मामले का पहला फैसला है। जाहिर है, यह एसआइटी पर पक्षपात करने के आरोपों का जवाब भी है। इसे यदि हम एसआइटी के दायरे के अन्य मामलों की पूर्वपीठिका मान लें तो हमें आने वाले समय में ऐसे फैसलों की श्रृंखला के लिए तैयार रहना चाहिए। इसी साल 22 फरवरी को गोधरा कांड पर अहमदाबाद की विशेष अदालत फैसला सुना चुकी है और संयोग देखिए कि उसमें भी 31 लोगों को ही सजा मिली। उस समय से यह सवाल उठाया जा रहा था कि गोधरा कांड के दोषियों को तो सजा मिल गई, लेकिन दंगों के दोषी भारी संख्या में स्वतंत्र घूम रहे हैं। 27 फरवरी 2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आग लगाकर 59 लोगों को मार डाला गया था। अगर वह जघन्यतम अपराध था तो उसके बाद पूरे गुजरात में जो भयानक दंगा भड़का उसकी कुछ घटनाएं नृशंसता और जघन्यता जैसे शब्दों से भी परे चली गई थी। वीजापुर तालुका का सरदारपुरा कस्बा इन्हीं में से एक था। अदालत के फैसले के अनुसार 28 फरवरी और 1 मार्च की रात्रि एक समूह ने शेख वास नामक गली को घेर लिया, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते थे। इनमें से कुछ लोग इब्राहीम शेख नामक व्यक्ति के घर में छिप गए, लेकिन भीड़ ने घर पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी। इसमें 33 लोग मारे गए, जिनमें 22 महिलाएं थीं। गुजरात दंगों के दौरान कम से नौ ऐसी घटनाएं हैं, जो हैवानियत की सीमाएं पार कर जाती हैं। जिन 76 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, उनमें दो मर चुके हैं और एक अवयस्क था, जिसका मामला बाल न्यायालय में चला। बरी किए गए 11 लोगों के खिलाफ न्यायालय ने कोई सबूत नहीं पाया तो 31 को संदेह का लाभ मिला। लेकिन इन्हें 25 हजार का बॉन्ड भरना पड़ा है और ये न्यायालय के आदेश के बिना विदेश नहीं जा सकते यानी अभी इन्हें पूरी तरह बरी नहीं माना जा सकता है। ऐसे फैसले का कम से कम स्वागत तो किया जाना चाहिए। क्या ये इसलिए खामोश हैं, क्योंकि इससे मोदी को लाभ मिल जाएगा? दंगों के सभी मामलों के असली दोषियों को कानून के अनुसार कठोरतम सजा मिलने से आम मनुष्य के नाते पीडि़तों के जख्मों पर मरहम लगेगा और राज्य व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास फिर से कायम हो सकेगा। गोधरा से सरदारपुरा फैसले का असर दोनों पक्षों के मनोविज्ञान पर पड़ेगा। ये फैसले ऐसी उम्मीद के पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं कि गुलबर्ग सोसायटी से लेकर नरोड़ा पटिया, बेस्ट बेकरी जैसे प्रमुख नौ मामलों में एसआइटी दोषियों को ऐसे ही सजा दिलवाने में कामयाब होगा। एसआइटी को गोधरा सहित दंगों के नौ प्रमुख मामले सौंपे गए, जिसमें वह जांच पूरी कर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप चुका है। सरदारपुरा मामला कितनी तेजी से चला, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जून 2009 में इनके खिलाफ आरोप पत्र दायर हुआ जिसके बाद 157 सूचीबद्ध गवाहों में से 112 की गवाही हुई। इन गवाहों में 20 डॉक्टर, 40 दंगा पीडि़त, 17 छानबीन से जुड़े गवाह (इनक्वेस्ट गवाह), 20 पुलिसकर्मी और 15 अन्य शामिल थे। इतने लोगों की गवाही और उनसे जिरह करने में कितना समय लगा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। आरोप पत्र दायर होने के दो साल चार महीने के भीतर फैसला आना भारतीय न्याय प्रणाली के स्वभाव को देखते हुए सामान्य बात नहीं है। इससे यह उम्मीद जगती है कि एसआइटी जितने मामलों की जांच कर रही है, उन सबका फैसला भी हमारे सामने कुछ महीनों के अंदर आ जाएगा। लेकिन हमें सरदारपुरा और गोधरा कांड के फैसले के एक गुणात्मक अंतर को अवश्य ध्यान रखना चाहिए। सरदारपुरा मामले में जिन 31 लोगों को सजा मिली, उन पर हत्या, हत्या की कोशिश, दंगा, आगजनी आदि का आरोप तो न्यायालय ने स्वीकार किया, लेकिन आपराधिक साजिश को स्वीकार नहीं किया। इसीलिए इन्हें आजीवन कारावास मिला, मृत्युदंड नहीं। इसके विपरीत गोधरा कांड में 11 को मृत्युदंड और 20 को आजीवन कारावास की सजा हुई। न्यायालय ने सरदारपुरा घटना को जघन्य तो करार दिया है, लेकिन इसे गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में ही घटित माना है। तमाम जिरह के बाद लोगों को हमले के लिए हथियार आदि दिए जाने को भी उसने तात्कालिक प्रतिक्रिया में किया गया अपराध ही माना है। इसके पीछे पहले से कोई साजिश हो, इसे अदालत द्वारा स्वीकार न करना काफी महत्वपूर्ण है। वास्तव में गुजरात दंगों के संदर्भ में यह बहुत बड़ी बात है। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप लगाया जाता रहा है कि उसने साजिश के तहत दंगा भड़काया और प्रशासन को पूरी तरह सक्रिय न होने का प्रबंधन भी किया, जिससे संघ परिवार के संगठनों द्वारा एक समुदाय के लोगों को हिंसा का शिकार बनाने की आजादी थी। मोदी पर तो गोधरा रेल दहन का भी आरोप लग रहा था। पहले गोधरा रेल दहन संबंधी फैसले में अदालत ने मोदी की किसी प्रकार की भूमिका को खारिज किया और अब सरदारपुरा दंगा मामले में भी। गोधरा मामले को अदालत ने पूर्व नियोजित साजिश की श्रेणी करार दिया। क्या वर्तमान खामोशी का राज इसी में निहित है? ईमानदारी का तकाजा है कि दोनों मामलों के मौलिक अंतर को स्वीकार कर अपना विचार बनाया जाए। सांप्रदायिक हिंसा चाहे अल्पसंख्यकों द्वारा अंजाम दी जाए या बहुसंख्यकों द्वारा, इसका निरपेक्ष भाव से विरोध होना चाहिए। दुर्भाग्य से गुजरात मामले में ऐसा नहीं हुआ है। सरदारपुरा फैसले से पहले एसआइटी ने अपनी रिपोर्ट में यह तो स्वीकार किया कि प्रशासन को जिस ढंग से काम करना चाहिए, नहीं किया। एसआइटी की रिपोर्ट के अनुसार वह सक्षमता से अपनी भूमिका निभाकर हिंसा की अनेक घटनाएं रोक सकती थी, लेकिन मोदी ने संप्रदाय विशेष के खिलाफ लोगों को भड़काया, हिंसा में सहयोग दिया, प्रोत्साहित किया, इसके प्रमाण नहीं मिलते। 6 मार्च 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ के पूर्व प्रमुख आरके राघवन की अध्यक्षता में एसआइटी का गठन किया। एसआइटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी मॉनिटरिंग के तहत जांच की और उस दौरान विरोधियों की ओर से जो भी सवाल उठाए गए, उनका भी समय-समय पर संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल 2009 को दंगों में मोदी की भूमिका की जांच का आदेश दिया। इसने उस समय के दस्तावेज, भाषणों के टेप आदि की छानबीन की और मोदी से दो बार लंबी पूछताछ की। इसके बाद इसने मोदी को दंगों के आरोप से मुक्त कर दिया। चूंकि एसआइटी सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में काम कर रही है, इसलिए इसकी जांच पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश कुछ लोगों ने एसआइटी की भूमिका को ही संदेहास्पद बनाने की कोशिश की और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए। दंगों के बाद गुजरात में किसी भी ईमानदार व्यक्ति या समूह का दो ही उद्देश्य हो सकता है- दोषियों को उपयुक्त सजा दिलवाना और धीरे-धीरे उन सिहरन भरी यादों से समाज को बाहर लाकर आम जीवन में गतिशील करना। पहला उद्देश्य न्यायपालिका द्वारा पूरा हो सकता है और यह हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सारे सवालों को समाहित कर एसआइटी का गठन किया और वह छानबीन करने से लेकर मुकदमा लड़ने तक की भूमिका निभा रहा है। दूसरे उद्देश्य के लिए सरकार शेष राजनीतिक प्रतिष्ठान और सभी प्रकार के सामाजिक समूहों को संवेदनशील भूमिका निभाने की जरूरत है। इसके विपरीत बार-बार उन घटनाओं की एकपक्षीय और निहित स्वार्थो के आलोक में चर्चा कर जख्मों को कुरेदा जाता है, उन्हें अन्याय का शिकार बताया जाता है और निष्पक्ष न्याय सामने आने पर खामोशी अख्तियार कर ली जाती है। हम तो केवल कामना ही कर सकते हैं कि काश, इस स्थिति का अंत हो जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

आखिरकार मुजरिमों को मिली

इंसाफ के घर देर है, अंधेर नहीं। पिछले दिनों यह कहावत गुजरात में एक बार फिर चरितार्थ हुई। सूबे की एक विशेष अदालत ने वर्ष 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के एक मामले में 31 लोगों को गुनहगार ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। नौ साल बाद आए इस फैसले ने सूबे के बाकी दंगा पीडि़तों में भी एक आस जगा दी है कि एक दिन उन्हें भी इंसाफ मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त एसआइटी का यह पहला मामला है, जिसमें फैसला आया। गौरतलब है कि एसआइटी की दोबारा जांच के बाद वर्ष 2009 में मेहसाणा की एक फॉस्ट ट्रैक अदालत में मुकदमा शुरू हुआ था, जिसमें अब फैसला आया है। अदालत में कुल 73 लोगों के खिलाफ मुकदमा चला, जिनमें से 31 लोगों पर हत्या, दंगा और आगजनी के इल्जाम साबित हुए। वर्ष 2002 की 28 फरवरी और 1 मार्च की दरमियानी रात को जब सारा गुजरात दंगों की आग में झुलस रहा था, तब दंगाइयों ने सरदारपुरा के शेख वास नाम के इलाके को चारों ओर से घेरकर उस घर को आग लगा दी, जिसमें 22 महिलाओं समेत 33 लोग दंगों से बचने के लिए पनाह लिए हुए थे। जाहिर है, नफरत की आग में ये सारे लोग मारे गए। एक लंबा अरसा गुजर गया, लेकिन अपराधी कानून की गिरफ्त से बचे रहे। अफसोसनाक बात यह है कि इस नृशंस कांड की जांच शुरुआती खानपूर्ती के बाद न सिर्फ रोक दी गई, बल्कि मोदी सरकार गुनहगारों को भी बचाती रही। बहरहाल, गुजरात दंगों के बाबत सूबे में अभी तक पीडि़तों को जो भी इंसाफ मिला है, उसका सेहरा अगर किसी को बंधता है तो वह है अदालत। सूबे की पुलिस तो पर्याप्त सबूत न होने का बहाना बनाकर कई मामलों को अपनी तरफ से बंद कर चुकी थी कि फरवरी 2008 में दंगों के मामले में पहली सजा हुई। मुंबई की एक विशेष अदालत ने गुजरात दंगों के दौरान बिल्किस बानो के सामूहिक बलात्कार और उसके रिश्तेदारों की हत्या के मामले में 11 दागियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एसआइटी के गठन का निर्देश दिया और उसे सूबे के नौ बड़े नरसंहारों की नए सिरे से तहकीकात करने को कहा गया। जिसमें अहमदाबाद, आणंद, साबरकांठा, मेहसाणा और गुलबर्ग सोसायटी के नरसंहार शामिल हैं। एसआइटी की दोबारा जांच के बाद ही सरदारपुरा में हुए नरसंहार के खिलाफ अदालत में मुकदमा शुरू हो पाया। साल 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में सूबे के अंदर अल्पसंख्यकों के जान-माल की बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी। इंसानियत को शर्मसार करने वाले इन दंगों में उस वक्त दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए और लाखों बेघर हो गए। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरपरस्ती और सरकारी अमले की मिलीभगत से पूरे सूबे में दंगे कई दिन तक चलते रहे। यही नहीं, दंगों के बाद सूबे में जिस तरह से गुनहगारों को बचाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में कदम-कदम पर रुकावट डाली गई, वह भी किसी से छिपी नहीं। सबूतों को खत्म करने, गवाहों को डराने-धमकाने और आरोपियों को बचाने की सुनियोजित कोशिशें पुलिस की मदद से होती रहीं। गुजरात सरकार सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों की प्रति कितनी गंभीर है, इसे जानने के लिए इतना ही काफी है कि गोधरा और गुजरात दंगों की जांच कर रहा नानावटी आयोग अपनी रिपोर्ट दंगों के नौ साल बाद भी मुकम्मल नहीं कर पाया है। जबकि दंगों की जांच के लिए गठित एक गैर सरकारी संगठन कंसर्न सिटिजन ट्रिब्यूनल गुजरात 2002 ने मौखिक एवं लिखित साक्ष्यों, दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों एवं अन्य पीडि़तों के बयानों, महिला संगठनों और पुलिस में दर्ज मुकदमों की गहन विवेचना के बाद जारी अपनी रिपोर्ट में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को दंगों का दोषी ठहराते हुए कहा था कि मोदी फरवरी 2002 के बाद गुजरात में जो कुछ हुआ, उसके मुख्य शिल्पकार थे। ऐसे में मेहसाणा की विशेष अदालत का फैसला ऐतिहासिक है। मुल्क में सांप्रदायिक दंगों के मुकदमों के इतिहास में यह पहला मुकदमा है, जिसमें एक साथ इतने सारे लोगों को सजा हुई। सरदारपुरा गांव के अल्पसंख्यक परिवार भले ही इंसाफ की लड़ाई जीत गए हों, लेकिन आज भी ऐसे सैंकड़ों लोग हैं, जो अपनी हारी हुई लड़ाई पुरजोर तरीके से लड़ रहे हैं। इंसाफ उनसे दूर सही पर मुल्क की अदालत और उसके कानून पर उनका यकीन हौसला बंधाता है कि जम्हूरियत और इंसानियत की लड़ाई हम इतनी जल्दी हारने वाले नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार

Saturday, November 12, 2011

आखिर कहां जाते हैं लापता बच्चे


दिल्ली में हर साल गायब हो रहे बच्चों की तादाद लगातार बढ़ रही है, लेकिन पुलिस किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में है। इस मामले में पुलिस की नाकामी को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया गया है कि वह लापता बच्चों की तलाश के लिए विशेष टॉस्क फोर्स गठित करें, जो इस बात का पता लगाए कि कहीं कोई गैंग बच्चों की तस्करी में तो शामिल नहीं है। दरअसल, दो से चार साल की उम्र के बच्चों को तस्करी के लिए उठाया जाता है। दिल्ली के आसपास बच्चों की तस्करी और बाल मजदूरी कराने वाले गैंग सक्रिय हैं। अगर छह माह तक गायब कोई बच्चा नहीं मिलता है तो उसके मामले की जांच एंटी किडनैपिंग सेल को सौंप दी जाए। अदालत ने पुलिस आयुक्त को यह भी निर्देश दिया है कि गायब होने वाले बच्चों के बारे में पुलिस स्टेशन व पीसीआर को सूचना देने की प्रक्रिया के मानक तय किए जाएं। साथ ही बच्चों की गुमशुदगी के मामलों की जांच के लिए कुछ और पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाएं। इतना ही नहीं पुलिसकर्मियों को निर्देश दिया जाए कि ऐसे मामलों में जल्द से जांच पूरी की जाए। पुलिस आयुक्त कुछ अधिकारियों की एक टीम गठित करें जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण देंगे कि इस तरह के मामलों में किस तरह संवेदनशीलता के साथ काम किया जाए। अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया है कि बच्चों को ढूंढ़ने के बाद उन्हें डीएलएसए की सदस्य सचिव या उनके द्वारा नियुक्त सदस्य के समक्ष पेश किया जाए ताकि अदालत को बच्चों के गायब होने के कारणों की पूरी जानकारी मिल सके। अदालत ने दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग व डीएलएसए को कहा है कि वह काउंसलर की एक कमेटी भी गठित करें जिसका नोडल अधिकारी ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस को बनाया जाए। यह कमेटी पुलिस द्वारा तलाशे गए बच्चों और उनके माता-पिता की काउंसलिंग करेगी और बच्चे के गायब होने के कारणों का पता लगाएगी। इसके अलावा अदालत ने घर से गायब हुए बच्चों का स्कूल द्वारा नाम काटने की बात को ध्यान में रखते हुए शिक्षा निदेशालय के सचिव को निर्देश दिया है कि वह इस संबंध में सभी स्कूलों को सर्कुलर जारी करें कि इस तरह बच्चों के नाम न काटे जाएं ताकि बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। बच्चों के गायब होने के संबंध में अलग-अलग आंकड़े मीडिया में छपने के बाद अदालत ने इस मामले में विशेष तौर पर संज्ञान लिया था। असलियत यह है कि लापता बच्चों की बढ़ती तादाद हमारे देश की ही नहीं दुनिया की समस्या बन चुकी है। देश में बाल वेश्यावृत्ति का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है और वह नित नए आयाम में हमारे सामने आ रहा है। दुनिया में 12 लाख बच्चों की हर वर्ष खरीद-फरोख्त होती है जिनमें एक बड़ी संख्या भारतीय बच्चों की होती है। पूरे देश से सालाना तकरीब 44-55 हजार बच्चे गायब होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि गायब होने वाले बच्चों में से 11 हजार के करीब बच्चे कहां चले जाते हैं पता ही नहीं चलता। जाहिर सी बात है ये बच्चे आपराधिक गिरोहों के हत्थे चढ़ जाते हैं जहां यातना, यंत्रणा, शोषण, दु‌र्व्यवहार और उत्पीड़न उनकी नियति बन जाती है और फिर वे उन्हीं के गुलाम बनकर रह जाते हैं। ऐसे में उनके मौलिक अधिकारों की बात करना ही बेमानी है। एक बार कोई बच्चा यदि आपराधिक गिरोह के हत्थे चढ़ गया तो फिर उसके चंगुल से बाहर निकल पाना उसके लिए आसान नहीं होता। आज कम उम्र यानी 14 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों की मांग बाजार में सबसे ज्यादा है। यही वजह रही है कि बीते सालों में 12 से लेकर 16-17 वर्ष उम्र की लापता लड़कियों की तादाद बढ़ रही है। वहीं 12 साल से कम उम्र के लड़कों की तादाद भी ज्यादा है। इसका सबसे बड़ा कारण बालवेश्यावृत्ति है जिसे रोक पाने में सरकार नाकाम रही है। देश की राजधानी दिल्ली लापता होने वाले बच्चों के मामले में शीर्ष पर है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की तो स्थिति इस मामले में और भी खौफनाक है। राजधानी दिल्ली और इससे सटे जिलों गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर खासकर नोएडा की हालत और भी बदतर है। इन इलाकों में बच्चे और भी असुरक्षित हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण पुलिस की उदासीनता, गरीबी और जागरूकता का अभाव है। असलियत यह है कि कोई ही दिन ऐसा होता हो जबकि कोई बच्चा लापता न होता हो या फिर उसे अगवा न किया जाता हो। पुलिस भले ही दावा कुछ भी करे लेकिन हकीकत यही है कि वह इसे रोक पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। दिल्ली से औसतन हर दिन 16 बच्चे गायब होते हैं यानी हर माह करीब पांच सौ और साल में करीब छह हजार बच्चे गायब होते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक दिल्ली बच्चों के गायब होने के मामले में पहले स्थान पर है। मिसिंग पर्सन्स स्क्वॉड के आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले तीन साल में दिल्ली से लगभग 18 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हुए हैं। ज्यादातर मामलों की जांच में बच्चों को अगवा करने वाले उनके परिचित होते हैं। आंकड़े बताते हैं कि करीब पचास फीसदी मामलों में परिचित का हाथ होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की मानें तो हर साल दिल्ली से तकरीबन सात हजार बच्चे गायब हो जाते हैं। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि पुलिस के पास पहुंची लापता बच्चों की सूचनाओं में से कुल मिलाकर मुश्किल से 10-12 फीसदी मामलों की ही रिपोर्ट दर्ज की जाती है। इस मामले में देश की पहली महिला पुलिस अधिकारी रहीं किरण बेदी का मानना है कि-पुलिस के इस रवैये को लेकर लोग इस कदर हताश हो चुके हैं कि बच्चों की गुमशुदगी के मामले अब पुलिस से ज्यादा चाइल्ड हेल्पलाइन के पास दर्ज कराए जाते हैं। बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि इनके गायब होने के पीछे आपराधिक गिरोह का हाथ होता है। हालांकि अपनी साख बचाने के लिए पुलिस द्वारा सामाजिक या आर्थिक कारणों की आड़ ली जाती है। पुलिस इस मामले में कोई भी जिम्मेवारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहती। इसमें दो राय नहीं कि इस मामले में सामाजिक-आर्थिक कारणों को भी नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि अधिकांश बच्चे आपराधिक गिरोहों द्वारा उठाए जाते हैं, जिन्हें ढाबे, भीख मांगने, जेब तराशने के काम में लगा दिया जाता है अथवा बाल वेश्यावृत्ति के लिए बेच दिया जाता है। दुश्मनी अथवा फिरौती की खातिर अपहृत बच्चों की तादाद कम ही होती है। पिछले कुछ दिनों में ऐसे मामले भी उजागर हुए है जिनमें नौकर-नौकरानियों, पूर्व कर्मचारियों या परिचित ज्यादा शामिल रहे हैं। लापता बच्चों के मामलों पर नजर रखने के लिए करीब 32 राज्यों ने केंद्र के साथ एक करार किया है जिसके तहत गुमशुदा बच्चों की जानकारी आदान-प्रदान की जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)