राजधानी में आर्थिक अपराध के मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने अपनी रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार अमानत में खयानत और धोखाधड़ी के मामलों में वर्ष 2010 में सबसे अधिक 3598 करोड़ रुपये संपत्ति का नुकसान अकेले कर्नाटक राज्य में हुआ। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र में 104 करोड़ रुपये और तीसरे नंबर पर दिल्ली में 84 करोड़ रुपये की संपत्ति (चल, अचल) का नुकसान लोगों को उठाना पड़ा। वहीं, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम और त्रिपुरा राज्य में वर्ष 2010 में अमानत में खयानत और धोखाधड़ी का एक भी मामला सामने नहीं आया। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली भ्रष्टाचार के मामलों में केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे ऊपर रही है। राजधानी में वर्ष 2010 में भ्रष्टाचार के 154 मामले पहले से लंबित थे, जबकि 39 नए मामले दर्ज किए गए। जबकि केंद्र शासित प्रदेश में दूसरे स्थान पर पुड्डुचेरी और तीसरे स्थान पर चंडीगढ़ का नाम है। राजधानी में भ्रष्टाचार के 64.7 प्रतिशत ही ऐसे मामले थे, जिनमें अदालत में चार्जशीट दाखिल की जा सकी। भ्रष्टाचार के मामलों में राजधानी में प्रथम श्रेणी के दो अधिकारी, द्वितीय श्रेणी के चार अधिकारी और अन्य 34 सरकारी कर्मचारी संलिप्त पाए गए। 316 केसों का अदालतों में ट्रायल चला, जिनमें 53 मामलों में सजा सुनाई गई, 38 मामले डिस्चार्ज किए गए, 226 आरोपियों को जमानत, 44 लोगों की गिरफ्तारी और 19 लोगों पर आरोप तय किए गए। अगर, पूरे रिकार्ड पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि राजधानी में कुल 46.2 प्रतिशत ही ऐसे मामले रहे, जिनमें आरोपियों को सजा सुनाई गई।
संवादसेतु-अपराध
Saturday, June 30, 2012
Friday, June 22, 2012
सीमेंट कंपनियों पर 6307 करोड़ का जुर्माना
गुट बनाकर सीमेंट के दाम बढ़ाना कंपनियों को महंगा पड़ा है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआइ) ने आपस में मिलकर सीमेंट के दाम बढ़ाने पर एसीसी, अल्ट्राटेक, अंबुजा और जयप्रकाश एसोसिएट्स समेत 11 बड़ी सीमेंट कंपनियों पर 6,307 करोड़ का भारी जुर्माना कर दिया है। देश में अपनी तरह का यह पहला फैसला है। आयोग का यह निर्णय बिल्डरों की शिकायत पर हुई जांच के बाद आया है। सीमेंट कंपनियों की ओर से अगस्त, 2010 के बाद बढ़ाई गई कीमतें प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच का आधार बनी हैं। इसलिए सीसीआइ ने इन कंपनियों के वर्ष 2009-10 और 2010-11 में हुए मुनाफे का 50 प्रतिशत हिस्सा अर्थदंड के तौर पर तय किया है। इसके तहत सबसे ज्यादा जुर्माना जयप्रकाश एसोसिएट्स को 1,323.6 करोड़ रुपये देना होगा। कंपनियों के अलावा सीमेंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन पर भी 73 लाख रुपये जुर्माना हुआ है। सभी कंपनियों और एसोसिएशन को 90 दिन के भीतर जुर्माने की राशि जमा करनी होगी। यह रकम संभवत: केंद्र सरकार की समेकित निधि में जाएगी। आयोग की तरफ से महानिदेशक जांच ने इस शिकायत की तफ्तीश की थी। जुलाई, 2011 में कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के अधीन गंभीर अपराध जांच विभाग (एसआइएफओ) ने भी एसीसी, अंबुजा और अल्ट्राटेक के खिलाफ जांच की थी। सीसीआइ ने अपने 258 पेज के फैसले में कहा है कि कंपनियों के तौर तरीके से यह साबित हो गया है कि उन्होंने सीमेंट के दाम बढ़ाने के लिए कार्टेल (गुट) बनाया। इन कंपनियों ने देश में सीमेंट के उत्पादन और कीमतों को नियंत्रित व सीमित करने की दिशा में मिलकर काम किया। सीसीआइ ने माना है कि सीमेंट कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा कानून 2002 के नियमों का उल्लंघन किया। इन नियमों के मुताबिक कार्टेल साबित होने की सूरत में कंपनियों पर उनके मुनाफे का 300 प्रतिशत तक जुर्माना किया जा सकता है। सीमेंट कंपनियों ने आयोग के इस आदेश पर चुप्पी साध ली है। कंपनियों के बयान के मुताबिक, वे आयोग के आदेश का अध्ययन करने के बाद ही आगे की रणनीति तय करेंगी।
Wednesday, June 20, 2012
घूस लेकर जमानत देने वाला निलंबित जज गिरफ्तार
घूस लेकर कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी को जमानत देने के आरोप में निलंबित जज टीपी राव को भ्रष्टाचार निरोधी ब्यूरो (एसीबी) ने मंगलवार को गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी से पहले एसीबी अधिकारियों ने राव को मुख्यालय लाकर पूछताछ की। अब ब्यूरो राव को अदालत में पेश करेगा। एसीबी ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश पीवी चलपति राव और टीपी राव के बेटे टीआर चंद्रा को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है। एसीबी के महानिदेशक बीवी राव ने बताया कि निलंबित जज को गिरफ्तार कर लिया गया है। अब उन्हें अदालत के सामने पेश किया जाएगा। एसीबी ने 9 जून को राव और सात अन्य पर आइपीसी की विभिन्न धाराओं सहित भ्रष्टाचार रोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया था। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 31 मई को सीबीआइ जज राव को निलंबित कर दिया था। साथ ही मामले को सीबीआइ से लेकर एसीबी को सौंप दिया था। एसीबी ने जिन लोगों पर मामला दर्ज किया था, उनमें जनार्दन रेड्डी के बड़े भाई और बेल्लारी शहर के विधायक जीएस रेड्डी भी शामिल हैं। निलंबित जज राव ने पांच करोड़ रुपये घूस लेकर जनार्दन रेड्डी को 11 मई को जमानत दी थी। पिछले हफ्ते हाई कोर्ट ने जमानत आदेश रद कर दिए थे। मामले की जांच के दौरान सीबीआइ ने रेड्डी के पांच बैंक लॉकर से 1.60 करोड़ रुपये नकद बरामद किए। इसके अलावा चलपति राव के भाई टी. बालाजी राव से भी 1.14 करोड़ रुपये जब्त किए थे। सीबीआइ ने मामले से जुड़े दस्तावेजों के अलावा सौदे में इस्तेमाल किए गए मोबाइल व लैंडलाइन नंबर और बातचीत का ब्योरा भी एसीबी को सौंप दिया था।
an � ] g H �(? H�@ font-size:10.5pt;font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:"Times New Roman"; mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"; color:black'>रुपये प्रति क्विंटल का मूल्य तय किया गया है। यह मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य 1285 रुपये प्रति क्विंटल से भी कम है। इस मूल्य पर गेहूं सितंबर, 2012 तक उपलब्ध रहेगा। इसके बाद खरीद करने वालों को 1285 रुपये के मूल्य बेचा जाएगा। इतना ही नहीं देश के किसी भी हिस्से में गेहूं का यही मूल्य रहेगा। गेहूं की ढुलाई का खर्च सरकार सब्सिडी से चुकाएगी। इससे लगभग 1,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ बढे़गा। सरकार ने आम बजट में खाद्य सब्सिडी के लिए 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 11 हजार करोड़ रुपये की यह खाद्य सब्सिडी अतिरिक्त होगी।Saturday, January 7, 2012
आंकड़ों की बाजीगरी : सीपी बोले, क्राइम हुआ कम
दिल्ली पुलिस आयुक्त ने एक बार फिर आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर यह दर्शाने का प्रयास किया कि बीते साल राजधानी में अपराध कम हुए हैं। अपने इस दावे को पुख्ता करने के लिए पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता ने जनसंख्या के अनुपात में हुए अपराध के आंकड़े पर ज्यादा जोर दिया है। उनका दावा है कि पिछले 13 वर्षो के मुकाबले साल 2011 में न सिर्फ जघन्य अपराधों में बल्कि कुल आईपीसी के मामलों में भी खासी कमी आई है। दिल्ली पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता ने बताया कि साल 2011 में जिन आपराधिक मामलों में कमी आई है, इनमें हत्या व लूट के मामले शामिल हैं। उन्होंने बताया कि साल 2010 में हत्या के करीब 565 मामले सामने आए थे लेकिन बीते साल यह संख्या घटकर 543 हो गई है, इसी तरह लूट के मामलों में 599 के मुकाबले बीते साल सिर्फ 562 घटनाएं हुई। पुलिस आयुक्त ने बताया कि हत्या में करीब 3.89 प्रतिशत की कमी आई जबकि लूट के मामलों में 6.18 प्रतिशत की कमी हुई। इसी तरह झपटमारी के मामले में साल 2010 के 1671 केस के मुकाबले बीते साल 1476 घटनाएं हुईं, हालांकि कुछ ऐसे भी मामले रहे जिनमें साल 2010 के मुकाबले बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें डकैती, हत्या का प्रयास, फिरौती के लिए अपहरण व दुष्कर्म आदि के मामले शामिल हैं। इस साल डकैती के मामलों में लगभग 3.13 प्रतिशत, हत्या के प्रयास में 24.12 प्रतिशत, दुष्कर्म में 12.03 प्रतिशत व फिरौती के लिए अपहरण में 38.89 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। पुलिस आयुक्त बी.के गुप्ता ने बताया कि उन्होंने दिल्ली पुलिस की कमान संभालते ही यह ऐलान किया था कि स्ट्रीट क्राइम तथा बुजुगरे व महिलाओं पर होने वाले अपराध पर हर हाल में अंकुश लगाना है। इसी क्रम में कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने तमाम उन लोगों की लगाम कसी, जो आए दिन झपटमारी, लूटपाट, लड़ाई, झगड़े जैसे आपराधिक मामलों में लिप्त रहते हैं। इसके अलावा इलाके के घोषित बदमाशों व भगोड़ों पर भी नजर रखी, जिसका नतीजा यह रहा कि लूट के साथ-साथ झपटमारी के मामलों में भी खासी कमी आई। उन्होंने बताया कि साल 2010 के मुकाबले 2011 में झपटमारी के मामलों में लगभग 11.67 प्रतिशत की कमी आई है। पुलिस आयुक्त ने कहा कि राजधानी में जघन्य अपराध के मामले कुछ अवश्य बढ़े हैं, लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर अधिकांश जघन्य मामलों को सुलझाने में दिल्ली पुलिस को सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि साल 2010 के मुकाबले बीते साल कुल आईपीसी के 46 प्रतिशत के मुकाबले 54 प्रतिशत मामले सुलझा लिए गए जबकि जघन्य मामलों में यह आंकड़ा 87 के मुकाबले करीब 92 प्रतिशत का है। पुलिस आयुक्त ने कहा कि नए साल में आतंक के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया जाएगा। साथ ही महिलाओं तथा बुजुगरें के प्रति होने वाले क्राइम और सड़कों पर होने वाले अपराध की रोकथाम की हरसंभव कोशिश की जाएगी। इसके अलावा यातायात और थानों के मॉनिटरिंग पर भी जोर रहेगा। पुलिस आयुक्त ने अधीनस्थों को हिदायत दी कि थाने में शिकायत लेकर आने वालों के साथ सही ढंग से पेश आएं। उन्हें इस बात की शिकायत अक्सर मिलती रहती है कि थानों में पुलिसकर्मी समस्या लेकर आने वाले आम लोगों को तरह-तरह के बहाने बनाकर टरका देते हैं जिससे आम लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
Saturday, December 10, 2011
हर घंटे लापता होते हैं 11 बच्चे
एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर घंटे करीब 11 बच्चे लापता हो जाते हैं। इनमें से अधिकतर बच्चों की तस्करी कर उन्हें बंधुआ मजदूरी, व्यावसायिक यौन शोषण और मादक पदाथरें के धंधे में लगा दिया जाता है। बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) एनजीओ के अनुसार जनवरी 2008 से जनवरी 2010 के बीच देशभर के 392 जिलों से 1,17,480 बच्चे लापता हुए। ये आंकड़े सरकारी एजेंसियों से प्राप्त किए गए हैं। बीबीए ने अपनी किताब ‘मिसिंग चिल्ड्रेन ऑफ इंडिया’ में कहा है कि इसने ये आंकड़े 392 जिलों में आरटीआई दायर कर हासिल किए हैं। इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के महानिदेशक सुनील कृष्ण ने कहा-‘‘पुलिस और कानूनी एजेंसियां इन मामलों को गंभीरता से नहीं लेतीं। लापता होने वाले बच्चों से संबंधित आंकड़े इकठ्ठा करने और बांटने वाली एजेंसियां न के बराबर हैं।’’ बीबीए ने अपनी एक वेबसाइट भी शुरू की है जहां इन बच्चों से संबंधित आंकड़े प्राप्त किए जा सकते हैं। 2004-05 में एनएचआरसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि हर साल लगभग 44,000 बच्चे लापता हो जाते हें जिनमें से एक चौथाई बच्चों का कोई सुराग नहीं मिलता। पिछले सात सालों में इस संख्या में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीबीए के अनुसार पिछले पांच सालों में लापता होने वाले बच्चे जो अभी तक नहीं मिले हैं, उनकी संख्या 30 प्रतिशत बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार अगर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर हर जिले से लापता होने वाले बच्चों की औसत 150 बच्चों की संख्या को 640 जिलों के साथ जोड़ा जाए तो हर साल लापता होने वाले बच्चों की संख्या 96,000 हो जाती है। आरटीआई से पता चला है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों से 24,744 बच्चे लापता हैं। इन शहरों में दिल्ली सबसे ऊपर आती है जहां इन लापता बच्चों में से 12 प्रतिशत बच्चों की अभी तक कोई खोज खबर नहीं मिली है। हर साल दिल्ली से लगभग 6,785 बच्चे लापता होते हैं जिसमें से 850 बच्चों का कोई सुराग नहीं मिलता। लापता होने वाले बच्चों में से 89 प्रतिशत बच्चे अकेले दिल्ली और कोलकाता से आते हैं। 20 राज्यों और चार संघ शासित क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बच्चे महाराष्ट्र से लापता होते हैं। इनकी संख्या 26,211 है।
Thursday, November 24, 2011
बच्चों की तस्करी रोकने को बनेंगे 335 मानव तस्करी रोधी यूनिट
बच्चों की बढ़ती तस्करी को देखते हुए केंद्र सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष निर्देश जारी किए हैं। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी निर्देश में स्कूलों, स्कूल बसों, बच्चों के पार्को और रिहाइशी इलाकों में पुलिस गश्त बढ़ाने से लेकर अन्य उपाय करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही सरकार पूरे देश में 335 मानव तस्कर रोधी यूनिट खोलने की योजना भी बना रही है। राज्य सभा में एक सवाल का जबाव देते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि मानव तस्करी को रोकने की योजना के तहत देश में कुल 10 हजार पुलिस कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उनके प्रशिक्षण की प्रक्रिया अगले तीन साल में पूरी हो जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित 335 मानव तस्करी रोधी यूनिटों में से 115 यूनिट खोलने के लिए पहली किस्त के रूप में 8.72 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए हैं। जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैसे तो कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। पर बच्चों की सुरक्षा की अहमियत को देखते हुए केंद्र ने राज्य सरकारों को दिशानिर्देश जारी करने के साथ ही विशेष सहायता उपलब्ध कराने का फैसला किया है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी दिशा निर्देश में बच्चों और खास कर लड़कियों की तस्करी रोकने के लिए केंद्र ने राज्य सरकारों को ऐसे इलाकों की पहचान करने को कहा गया है, जहां बच्चों की तस्करी की आशंका सबसे अधिक होती है। ऐसे इलाकों में बीट कांस्टेबलों और पुलिस सहायता केंद्रों की संख्या बढ़ाने से लेकर महिला पुलिस की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति करने को कहा गया है।
Tuesday, November 22, 2011
ऐतिहासिक फैसले के बाद खामोशी क्यों
गुजरात दंगों पर पिछले नौ सालों से नरेंद्र मोदी विरोध का झंडा उठाने वालों का सरदारपुरा फैसले पर खामोशी विचलित करने वाली है। यह आजाद भारत के इतिहास में न्यायालय का पहला फैसला है, जिसमें एक साथ दंगों के 31 आरोपियों को सजा मिली है। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर गंभीरता और विस्तार से चर्चा नहीं हो रही। सच कहें तो मेहसाणा के विशेष न्यायालय ने सरदारपुरा दंगों के फैसले द्वारा इतिहास बना दिया है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआइटी) द्वारा जांच किए गए मामले का पहला फैसला है। जाहिर है, यह एसआइटी पर पक्षपात करने के आरोपों का जवाब भी है। इसे यदि हम एसआइटी के दायरे के अन्य मामलों की पूर्वपीठिका मान लें तो हमें आने वाले समय में ऐसे फैसलों की श्रृंखला के लिए तैयार रहना चाहिए। इसी साल 22 फरवरी को गोधरा कांड पर अहमदाबाद की विशेष अदालत फैसला सुना चुकी है और संयोग देखिए कि उसमें भी 31 लोगों को ही सजा मिली। उस समय से यह सवाल उठाया जा रहा था कि गोधरा कांड के दोषियों को तो सजा मिल गई, लेकिन दंगों के दोषी भारी संख्या में स्वतंत्र घूम रहे हैं। 27 फरवरी 2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आग लगाकर 59 लोगों को मार डाला गया था। अगर वह जघन्यतम अपराध था तो उसके बाद पूरे गुजरात में जो भयानक दंगा भड़का उसकी कुछ घटनाएं नृशंसता और जघन्यता जैसे शब्दों से भी परे चली गई थी। वीजापुर तालुका का सरदारपुरा कस्बा इन्हीं में से एक था। अदालत के फैसले के अनुसार 28 फरवरी और 1 मार्च की रात्रि एक समूह ने शेख वास नामक गली को घेर लिया, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते थे। इनमें से कुछ लोग इब्राहीम शेख नामक व्यक्ति के घर में छिप गए, लेकिन भीड़ ने घर पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी। इसमें 33 लोग मारे गए, जिनमें 22 महिलाएं थीं। गुजरात दंगों के दौरान कम से नौ ऐसी घटनाएं हैं, जो हैवानियत की सीमाएं पार कर जाती हैं। जिन 76 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, उनमें दो मर चुके हैं और एक अवयस्क था, जिसका मामला बाल न्यायालय में चला। बरी किए गए 11 लोगों के खिलाफ न्यायालय ने कोई सबूत नहीं पाया तो 31 को संदेह का लाभ मिला। लेकिन इन्हें 25 हजार का बॉन्ड भरना पड़ा है और ये न्यायालय के आदेश के बिना विदेश नहीं जा सकते यानी अभी इन्हें पूरी तरह बरी नहीं माना जा सकता है। ऐसे फैसले का कम से कम स्वागत तो किया जाना चाहिए। क्या ये इसलिए खामोश हैं, क्योंकि इससे मोदी को लाभ मिल जाएगा? दंगों के सभी मामलों के असली दोषियों को कानून के अनुसार कठोरतम सजा मिलने से आम मनुष्य के नाते पीडि़तों के जख्मों पर मरहम लगेगा और राज्य व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास फिर से कायम हो सकेगा। गोधरा से सरदारपुरा फैसले का असर दोनों पक्षों के मनोविज्ञान पर पड़ेगा। ये फैसले ऐसी उम्मीद के पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं कि गुलबर्ग सोसायटी से लेकर नरोड़ा पटिया, बेस्ट बेकरी जैसे प्रमुख नौ मामलों में एसआइटी दोषियों को ऐसे ही सजा दिलवाने में कामयाब होगा। एसआइटी को गोधरा सहित दंगों के नौ प्रमुख मामले सौंपे गए, जिसमें वह जांच पूरी कर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप चुका है। सरदारपुरा मामला कितनी तेजी से चला, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जून 2009 में इनके खिलाफ आरोप पत्र दायर हुआ जिसके बाद 157 सूचीबद्ध गवाहों में से 112 की गवाही हुई। इन गवाहों में 20 डॉक्टर, 40 दंगा पीडि़त, 17 छानबीन से जुड़े गवाह (इनक्वेस्ट गवाह), 20 पुलिसकर्मी और 15 अन्य शामिल थे। इतने लोगों की गवाही और उनसे जिरह करने में कितना समय लगा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। आरोप पत्र दायर होने के दो साल चार महीने के भीतर फैसला आना भारतीय न्याय प्रणाली के स्वभाव को देखते हुए सामान्य बात नहीं है। इससे यह उम्मीद जगती है कि एसआइटी जितने मामलों की जांच कर रही है, उन सबका फैसला भी हमारे सामने कुछ महीनों के अंदर आ जाएगा। लेकिन हमें सरदारपुरा और गोधरा कांड के फैसले के एक गुणात्मक अंतर को अवश्य ध्यान रखना चाहिए। सरदारपुरा मामले में जिन 31 लोगों को सजा मिली, उन पर हत्या, हत्या की कोशिश, दंगा, आगजनी आदि का आरोप तो न्यायालय ने स्वीकार किया, लेकिन आपराधिक साजिश को स्वीकार नहीं किया। इसीलिए इन्हें आजीवन कारावास मिला, मृत्युदंड नहीं। इसके विपरीत गोधरा कांड में 11 को मृत्युदंड और 20 को आजीवन कारावास की सजा हुई। न्यायालय ने सरदारपुरा घटना को जघन्य तो करार दिया है, लेकिन इसे गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में ही घटित माना है। तमाम जिरह के बाद लोगों को हमले के लिए हथियार आदि दिए जाने को भी उसने तात्कालिक प्रतिक्रिया में किया गया अपराध ही माना है। इसके पीछे पहले से कोई साजिश हो, इसे अदालत द्वारा स्वीकार न करना काफी महत्वपूर्ण है। वास्तव में गुजरात दंगों के संदर्भ में यह बहुत बड़ी बात है। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप लगाया जाता रहा है कि उसने साजिश के तहत दंगा भड़काया और प्रशासन को पूरी तरह सक्रिय न होने का प्रबंधन भी किया, जिससे संघ परिवार के संगठनों द्वारा एक समुदाय के लोगों को हिंसा का शिकार बनाने की आजादी थी। मोदी पर तो गोधरा रेल दहन का भी आरोप लग रहा था। पहले गोधरा रेल दहन संबंधी फैसले में अदालत ने मोदी की किसी प्रकार की भूमिका को खारिज किया और अब सरदारपुरा दंगा मामले में भी। गोधरा मामले को अदालत ने पूर्व नियोजित साजिश की श्रेणी करार दिया। क्या वर्तमान खामोशी का राज इसी में निहित है? ईमानदारी का तकाजा है कि दोनों मामलों के मौलिक अंतर को स्वीकार कर अपना विचार बनाया जाए। सांप्रदायिक हिंसा चाहे अल्पसंख्यकों द्वारा अंजाम दी जाए या बहुसंख्यकों द्वारा, इसका निरपेक्ष भाव से विरोध होना चाहिए। दुर्भाग्य से गुजरात मामले में ऐसा नहीं हुआ है। सरदारपुरा फैसले से पहले एसआइटी ने अपनी रिपोर्ट में यह तो स्वीकार किया कि प्रशासन को जिस ढंग से काम करना चाहिए, नहीं किया। एसआइटी की रिपोर्ट के अनुसार वह सक्षमता से अपनी भूमिका निभाकर हिंसा की अनेक घटनाएं रोक सकती थी, लेकिन मोदी ने संप्रदाय विशेष के खिलाफ लोगों को भड़काया, हिंसा में सहयोग दिया, प्रोत्साहित किया, इसके प्रमाण नहीं मिलते। 6 मार्च 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ के पूर्व प्रमुख आरके राघवन की अध्यक्षता में एसआइटी का गठन किया। एसआइटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी मॉनिटरिंग के तहत जांच की और उस दौरान विरोधियों की ओर से जो भी सवाल उठाए गए, उनका भी समय-समय पर संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल 2009 को दंगों में मोदी की भूमिका की जांच का आदेश दिया। इसने उस समय के दस्तावेज, भाषणों के टेप आदि की छानबीन की और मोदी से दो बार लंबी पूछताछ की। इसके बाद इसने मोदी को दंगों के आरोप से मुक्त कर दिया। चूंकि एसआइटी सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में काम कर रही है, इसलिए इसकी जांच पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश कुछ लोगों ने एसआइटी की भूमिका को ही संदेहास्पद बनाने की कोशिश की और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए। दंगों के बाद गुजरात में किसी भी ईमानदार व्यक्ति या समूह का दो ही उद्देश्य हो सकता है- दोषियों को उपयुक्त सजा दिलवाना और धीरे-धीरे उन सिहरन भरी यादों से समाज को बाहर लाकर आम जीवन में गतिशील करना। पहला उद्देश्य न्यायपालिका द्वारा पूरा हो सकता है और यह हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सारे सवालों को समाहित कर एसआइटी का गठन किया और वह छानबीन करने से लेकर मुकदमा लड़ने तक की भूमिका निभा रहा है। दूसरे उद्देश्य के लिए सरकार शेष राजनीतिक प्रतिष्ठान और सभी प्रकार के सामाजिक समूहों को संवेदनशील भूमिका निभाने की जरूरत है। इसके विपरीत बार-बार उन घटनाओं की एकपक्षीय और निहित स्वार्थो के आलोक में चर्चा कर जख्मों को कुरेदा जाता है, उन्हें अन्याय का शिकार बताया जाता है और निष्पक्ष न्याय सामने आने पर खामोशी अख्तियार कर ली जाती है। हम तो केवल कामना ही कर सकते हैं कि काश, इस स्थिति का अंत हो जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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