Friday, April 1, 2011

न्याय का नया रूप


देश की सबसे बड़ी अदालत जब यह मान ले कि उसके हाथ बंधे हैं तो गुनहगारों के हौसले ही नहीं बढ़ जाते, उन तमाम लोगों का मनोबल भी चुक सकता है, जिन्होंने न्याय की आस में जीवन काट दिया। एक औरत को थाने में वस्त्रविहीन कर घुमाने, पति के सामने ही पांच पुलिस वालों द्वारा बलात्कार करने और फिर पति को पीट-पीट कर मार डालने की वारदात पर सुप्रीम कोर्ट के जज मार्कण्डेय काटजू द्रवित हो गए। उन्होंने कहा कि ऐसे दरिंदे पुलिस वालों को फांसी पर लटकाना चाहिए। तमिलनाडु के अन्नामलाई में 18 साल पहले हुई इस घटना में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में अपराधियों पर बस आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चला। बावजूद इसके, न्यायमूर्ति के इतना स्वीकार लेने से तमाम उन औरतों ने काफी सुकून महसूसा होगा, जिनको किसी न किसी तरह के पुलिसिया आतंक को झेलना पड़ा है। इस सच से मुकरा नहीं जा सकता कि हमारी पुलिस स्त्रियों को लेकर बेहद संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त होती है। किसी साधारण स्त्री के थाने में प्रवेश को अब भी बेहद शंकालु नजरिये से देखा जाता है। उस पर स्त्री यदि आर्थिक रूप से कमजोर तबके या दलित वर्ग से है तो पुलिस का और भी रौद्र रूप नजर आता है। जिनके हाथों हमारी सुरक्षा का जिम्मा है, वही इतने वहशी होंगे तो सामाजिक रूप से हाशिए पर रह रहीं स्त्रियों के दर्द कौन सुनेगा? इस तरह के सवाल ऐसी हर वारदातों के संदर्भ में विचार करते वक्त हमेशा उठते रहे हैं। इसके बावजूद पुलिसिया जुल्म की घटनाएं थमती नजर नहीं आतीं। थाने में किसी भी औरत के साथ होने वाली छेड़छाड़, अभद्र भाषा का प्रयोग, विभेद भरा बर्ताव बेहद आपत्तिजनक है, उस पर जब पुलिस ही कपड़े उतरवाने और बलात्कार पर उतारू हो जाए तो उसे किसी भी दृष्टि से क्षमायोग्य नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ अमानत में खयानत भर ही नहीं है। यह उन तमाम स्त्रियों को भयभीत करने वाली घटना है, जिनको समाज व परिवार से किसी न किसी कारण सुरक्षा की जबर्दस्त जरूरत है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगातार मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें ही नहीं आती रही हैं, अब तो टीवी चैनलों पर उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की फुटेज भी दिखती रहती हैं। लेकिन जिस घटना के बाबत न्यायमूर्ति काटजू की टिप्पणी आई है, वह तो और भी भयंकरतम है। जो भी लोग इस मामले को दबाने या कमजोर बनाने की साजिश में संलिप्त रहे, वे सभी भीतर से अपराधी हैं। ये पांचों वहशी पुलिसकर्मी भले ही फांसी के फंदे पर चढ़ने से बच गए पर न्यायमूर्तियों की स्पष्टवादिता और ये द्रवित करने वाले उनके विचार हो सकता है, उन कुछ पुलिसवालों के मन पर चोट कर सकें जिनको अब तक स्त्रियों की उपेक्षा की आदत रही है। यों भी दैहिक दंड से गम्भीर होती है मानसिक प्रताड़ना और इन पांचों की मनोदशा को चुटहिल करने की जिम्मेदारी तो न्यायाधीशों ने बेहद साफगोई से निभाई ही है।

No comments:

Post a Comment