Thursday, April 28, 2011

समावेशी क्यों नहीं दिल्ली का समाज


राजधानी दिल्ली में हर साल पूर्वोत्तर राज्यों से हजारों लोग बेहतर शिक्षा व रोजगार पाने की उम्मीद के साथ कदम रखते हैं पर यहां उनके साथ समाज के दूसरे लोग व पुलिस किस तरह का व्यवहार करती है, इस बावत गाहे-बगाहे मीडिया हमें रू-ब-रू कराता रहता है। पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति जारी भेदभाव और पूर्वाग्रह की खतरनाक धारणा की पुष्टि एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट ने भी की है। 'नार्थ ईस्ट माइग्रेशन एंड चैलेंजस इन नेशनल केपिटल: सिटी साइलंट रेसिएल एटैक ऑन इट्स ओन पीपुल्स' नामक इस रिपोर्ट में इसके लिए अधिकारिक उदासीनता और कानून लागू करने वाली संस्थाओं के पूर्वाग्रही रवैए को प्रमुख कारण बताया गया है। 'नार्थ ईस्ट सपोर्ट सेंटर एंड हेल्पलाइन' द्वारा जारी यह अध्ययन सरकार को नींद से जगाने वाला ऐसा दस्तावेज है कि अगर सही समय पर उचित कदम नहीं उठाए गए तो दिल्ली को आने वाले समय में यहां के लोगों के सांस्कृतिक रोष का सामना करना पड़ सकता है। दिल्ली में पूर्वोत्तर राज्यों के करीब दो लाख लोग रहते हैं और इनमें आधी आबादी महिलाओं की है। दिल्ली-एनसीआर में यहां के लोगों के साथ नस्लीय भेदभाव होता है और उन पर हमले किये जाते हैं। वहां की लड़कियों और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ व बलात्कार किये जाते हैं। विरोध करने पर उनकी हत्या भी कर दी जाती है। इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि वर्ष 2005 से अब तक पूर्वोत्तर समुदाय के खिलाफ 96 आपराधिक मामले सामने आए हैं पर दिल्ली पुलिस ने सिर्फ 36 मामले ही दर्ज किए और 11 आपराधिक मामलों का ही फॉलोअप कर रही है। रिपोर्ट में ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों की निष्क्रियता व उनके पूर्वाग्रही व्यवहार पर सवाल खड़े किए गए हैं। पुलिस अधिकारी नस्लीय हमलों व यौन उत्पीड़न के शिकार होने वाले पुरुषों-महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रही नजर आते हैं और अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। नतीजतन उनके खिलाफ अपराध करने वालों को शह मिलती है और अपराधों की संख्या भी बढ़ती है। वर्ष 2005 में एक 19 वर्षीय मिजो युवती के साथ धौलाकुंआ में सामूहिक बलात्कार किया गया था तो चार साल बाद 2009 में नगालैंड की नौ साल की बच्ची की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। 2009 अक्टूबर में दिल्ली की ही मुनीरिका बस्ती में रहने वाली मणिपुर की 19 वर्षीय रामचंफी होंग्रे की उसके पड़ोसी पुष्पम कुमार ने गला दबाकर इसलिए हत्या कर दी थी क्योंकि उसने उसकी छेड़छाड़ का कड़ा विरोध किया था और पुलिस को बताने की धमकी दी थी। 2010 में बीपीओ सेक्टर में काम करने वाली 30 साल की मिजो महिला से सामूहिक बलात्कार किया गया था। इसे लेकर दिल्ली पुलिस की काफी आलोचना हुई थी और पुलिस आयुक्त ने महिलाओं को बेहतर सुरक्षा उपलब्ध कराने वाले कुछ कदमों की घोषणा की थी। यह घिनौना सच है कि असम, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल, मेघालय, सिक्किम व त्रिपुरा से लोग जब यहां शिक्षा, नौकरी या व्यापार के इरादे से आते हैं तो उन्हें यहां कई तरह से तंग किया जाता है। इन राज्यों की लड़कियों की शिकायत है कि स्थानीय आबादी खासकर पुरुष उन्हें अच्छी निगाहों से नहीं देखते। वह इस धारणा के शिकार हैं कि इनका चरित्र अच्छा नहीं होता। उनके पहनावे पर सवाल उठाए जाते हैं। उच्च शिक्षित जमात की मानसिकता और रवैया भी स्थानिकों से भिन्न नहीं हैं। छह साल पहले मिजोरम की एक युवती के साथ चलती कार में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल ने पूर्वोत्तर की छात्राओं को कॉलेज में सलवार-कमीज पहनने की सलाह दी थी। ऐसी सोच व सलाह यही संदेश देती है कि अपने ही देश के निवासी जब प्रवासी बनते हैं तो उन्हें अपनी सांस्कृतिक वेश-भूषा,भाषा,रीति-रिवाज व खान-पान छोड़ना होगा। तभी वे कुछ हद तक समाज में अपनाए जा सकते हैं, उनकी सुरक्षा हो सकती है। पूर्वोत्तरवासियों का मानना है कि उनके प्रति नस्लीय भेदभाव व उनके खिलाफ होने वाली यौन पीड़ा की मुख्य जड़ उनकी सामाजिक रूपरेखा है। ऐसे राज्यों की अधिकतर आबादी अनुसूचित जाति व आदिवासी है,जो मोंगोलिड नस्ल से हैं और ये जातिगत सीढ़ियों से बाहर हैं। ऐसे भेदभाव के महत्त्वपूर्ण सामाजिक पहलू हैं।

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