Monday, December 20, 2010

त्वरित न्याय की दरकार

देश की राजधानी दिल्ली में वीवीआईपी रहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी आलीशान सरकारी बंगलों में रहती हैं। मगर यह महानगर आधी आबादी यानी आम महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। यह एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन लगता है कि दिल्ली ऊंचा सुनती है। बीते कुछ दिनों से बलात्कार की घटनाएं बराबर मीडिया में छाई हुई हैं। 9 नवबंर को मंडावली में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा को टेंपो में अगवा कर चार युवकों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। 24 नवंबर को एक बीपीओ में नौकरी करने वाली पूर्वोत्तर भारत की एक युवती को टेंपो में सवार पांच युवकों ने धौलाकुआं इलाके से अगवा कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस युवती के साथ यह हादसा तब हुआ, जब वह आधी रात को अपने दफ्तर से घर जा रही थी। उसके दफ्तर की कैब ने रात के वक्त उसे घर से थोड़ी दूर सुनसान जगह पर ही छोड़ दिया था। 1 दिसबंर को दिलशाद कॉलोनी में एक महिला को कार में अगवा कर छह युवकों ने दुष्कर्म किया। 11 दिसबंर को सुल्तानपुरी इलाके में एक महिला के साथ चलती कार में चार युवकों ने दुष्कर्म किया। और 14 दिसबंर को कल्याणपुरी की एक नाबालिग स्कूली छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। दिल्ली में इस साल (30 नवबंर तक) दुष्कर्म के 425 मामले दर्ज हो चुके हैं। बीते साल ऐसे मामलों की संख्या 452 थी। यों तो बीते महीने दिल्ली के नए पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता ने पद संभालने के बाद दिल्ली की महिलाओं की सुरक्षा के प्रति अपनी खास चिंता जाहिर की थी। उन्होंने छात्राओं को भी आश्वस्त किया कि महिला पुलिसकर्मी आप के लिए तैनात होंगी। दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता ने यह भी निर्देश दिया कि कोई भी महिला और युवती गाड़ी खराब होने की स्थिति में या वाहन न मिलने के कारण कहीं अकेली खड़ी है तो वह पुलिस की मदद ले सकती है। इसके लिए उसे सौ नबंर डायल करना होगा, मगर पुलिस के लाख दावे के बावजूद एक महीने के भीतर दुष्कर्म की एक के बाद एक पांच वारदातें दर्ज की गई। इधर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जो कुछ कहा, उस पर भी चर्चा होनी चाहिए। 24 नवंबर को हुए धौलाकुआं सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद राजधानी दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर उठ रहे सवालों का हल तलाशने के लिए मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा बुलाई गई उच्च स्तरीय बैठक में यह मुद्दा उठा कि दुष्कर्मी पकड़े तो जाते हैं, लेकिन उन्हें सजा मिलने में बहुत देरी हो जाती है। वर्ष 2005 में हुए धौलाकुआं सामूहिक दुष्कर्म मामले का फैसला पांच साल बाद सुनाया गया। हालिया घटना के आरोपियों को भी सजा मिलने में देरी न हो, इसलिए यह मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री को यह सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने तत्काल इस पर अपनी सहमति की मुहर भी लगा दी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साफ कहा कि सरकार पैरवी करेगी कि दुष्कर्म के सभी मामलों के लिए विशेष अदालत का गठन किया जाए। इसे लेकर सरकार जल्द ही प्रक्रिया शुरू करेगी। हालांकि विशेष अदालत के गठन के बारे में अंतिम फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश ही करेंगे। दुष्कर्म के मामलों के त्वरित निपटारे से अपराधियों और ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों के मन में जल्द कड़ी सजा मिलने का डर तो रहता है। दिवगंत उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने एक साक्षात्कार में कहा था कि दुष्कर्म की पीडि़ता को इंसाफ दिलाने व ऐसा जघन्य अपराध करने वाले अपराधियों को तुरंत सजा दिलवाने के लिए त्वरित अदालतों का गठन होना चाहिए। राजस्थान में बलात्कार के कुछ मामलों की सुनवाई त्वरित अदालतों में ही हुई। मिसाल के तौर पर वर्ष 2005 में जोधपुर की एक अदालत ने एक जर्मन महिला के बलात्कार के आरोपी को 16 दिन के भीतर ही उम्रकैद की सजा सुनाई। इस फैसले का देश के सभी महिला संगठनों और राष्ट्रीय महिला आयोग ने स्वागत करते हुए अपने देश की ऐसी महिलाओं को तत्पर न्याय दिलाने की उम्मीद व्यक्त की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अभी अपने देश में त्वरित अदालतों में या तो विदेशी महिलाओं के साथ हुए दुष्कर्म या बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म संबंधी मामले ही सुनवाई के लिए जाते हैं। 23 सितबंर 2006 को उड़ीसा की एक स्थानीय अदालत ने एक नाबालिग बच्ची के साथ हुए बलात्कार के मुकदमे का केवल 20 दिन में निपटारा करते हुए आरोपी को दस साल की सजा सुनाई थी। 56 वर्षीय निरजंन प्रधान ने भुवनेश्वर की स्लम बस्ती शिकारचंडी में सात वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया था। पुलिस ने उसे अपराध के अगले दिन ही पकड़ लिया और आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया। मुकदमे की सुनवाई सिर्फ चार दिन तक चली और अदालत ने आरोपी को बलात्कार के जुर्म में दोषी मानते हुए सजा भी सुना दी। अपने देश में औसतन हर तीस मिनट में एक दुष्कर्म की एक वारदात होती है और दुष्कर्म के तकरीबन 60,000 मामलों की सुनवाई होनी है। औसतन दुष्कर्म का एक मामला 12 साल में जाकर निपटता है और सजा की दर बहुत कम है। ऐसे हालात में जरूरत त्वरित अदालती प्रक्ति्रया की है ताकि पीडि़त महिला को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। कुछ साल पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सामाजिक न्याय पर पहले अखिल भारतीय अंतरविभागीय सहयोग बैठक में इस बात पर जोर दिया था कि हमारी सरकार की ईमानदार प्रतिबद्धता है अपनी न्यायिक व्यवस्था को अनुसूचित जाति व जनजाति, अन्य पिछड़े, महिला अधिकारों और उनकी जरूरतों के प्रति संवदेनशील होना। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाल में ऐसी अदालतों के गठन के प्रति अपनी सहमति बेशक जाहिर कर खुद को एक संवदेनशील मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दिया है, लेकिन अंतिम फैसला तो दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को करना है। महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर काम करने वालों की राय में दिल्ली राजधानी होने के बावजूद महिलाओं के लिए असुरक्षित है। एक सर्वे के मुताबिक 96 प्रतिशत महिलाएं इस महानगर को असुरक्षित मानती हैं। 88 प्रतिशत आवश्यकता के समय खुद को असुरक्षित मानती हैं। 95 प्रतिशत पुरुषों के शोषण का शिकार होती हैं। अब आधी आबादी की निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि दिल्ली सरकार अपनी तरफ से इस प्रक्रिया को पूरा करने में कितना वक्त लेती है और फिर दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कब फैसला करेंगे। दिल्ली पुलिस में महिला पुलिसकर्मी भी जरूरत से कम हैं, यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है। दरअसल, राज्य सरकार को इस मुद्दे के प्रति गंभीरता सिर्फ बयानबाजी में ही नहीं व्यक्त करनी चाहिए, बल्कि उस पर अमल भी सख्ती से होना चाहिए और उसके नतीजे भी सकारात्मक होने चाहिए। इसके लिए प्रतिबद्धता और बुनियादी ढांचे में निवेश करने की जरूरत है। एक सवाल पूछा जा सकता है कि देश की अदालतों में बलात्कार के हजारों मामले लंबित पड़े होने के बावजूद त्वरित अदालतों के गठन का मुद्दा कभी-कभार ही चर्चा में आता है, जैसा कि दिल्ली में इन दिनों बलात्कार की कई घटनाओं के बाद दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री ने ऐसी अदालतों के गठन पर अपनी सहमति व्यक्त की है।

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