नई दिल्ली राजधानी में लगभग रोज चार बच्चे लापता हो रहे हैं। दूसरी ओर एक बच्चा रोज लावारिस हालत में सड़क पर मिलता है। पुलिस का कहना है कि लापता बच्चों में से 75 फीसदी लौट आते हैं और लावारिस को अनाथालय भेज दिया जाता है। मगर लापता 25 फीसदी एवं लावारिस बच्चों के बचपन का क्या? आखिर कहां गए बाल अधिकार संरक्षण के दावे? लापता बच्चों के लिए काम करने वाली नवसृष्टि संगठन की सेक्रेट्री रीना बनर्जी का कहना है कि आंकड़ा कहीं अधिक है, मगर पुलिस के डर से लोग चुप बैठ जाते हैं। मजदूरी करने वाले पलायन कर जाते हैं। बच्चे देश का भविष्य हैं। लापता बच्चों के गलत हाथों में पड़ने की सर्वाधिक संभावना रहती है। जाहिर है कि ऐसे में उनका बचपन बर्बाद होगा। यह चिंता का विषय है। देश में हर साल औसतन 44 हजार बच्चे गुम होते हैं। इनमें सर्वाधिक 6.7 फीसदी दिल्ली के होते हैं। यदि बच्चों का वर्तमान ही बिगड़ गया तो उनके भविष्य की बात बेमानी हो जाती है। पुलिस कहती है अधिकतर बच्चे नाराज होकर, पढ़ाई से जी चुराकर या फिल्मों से प्रेरित होकर मुंबई भाग जाते हैं। इस साल (जनवरी से नवंबर तक) राजधानी में करीब 4500 बच्चों के लापता होने के मामले हुए, जिनमें से 3300 घर लौट आए। अब निठारी कांड के बाद गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सदस्य पीसी शर्मा की अध्यक्षता वाली कमेटी के बयान पर गौर फरमाएं। लापता होने वाले बच्चे या तो रंजिश की वजह से मार दिए जाते हैं या उनका उपयोग खतरनाक औद्योगिक इकाइयों समेत घरों में सस्ते बंधुआ श्रमिक, बाल वेश्यावृति, चाइल्ड पोर्न, भीख मंगवाने, गोद लेने, जबरन शादी या मानव अंग तस्करी में किया जाता है। यह और बात है कि कमेटी के महत्वपूर्ण सुझावों पर आज तक किसी ने अमल नहीं फरमाया। रीना बनर्जी कहती हैं कि पुलिसिया आंकड़े झूठ का पुलिंदा हैं। गरीब तबके की शिकायत दर्ज नहीं होती। आमतौर ठेकेदार के यहां काम करने वाले बच्चा लापता होने की शिकायत लेकर थाने जाते हैं, लेकिन सुनवाई नहीं होती। कुछ दिन लाडले की राह तकने के बाद ऐसे परिवार पलायन कर जाते हैं।
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