Friday, February 18, 2011

किशोर अपराधियों से क्या हो सलूक


सर्वोच्च न्यायालय का 7 जनवरी, 2011 का एक निर्णय पढ़ते वक्त ख्याल आया कि आज के बदलते परिवेश में क्या यह उचित है कि 16 से 18 वर्ष के लड़कों को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 1986 (संशोधित 2000 एवं 2006) का लाभ देते हुए जेल में न रखकर उन्हें सुधार गृह में रखा जाए। मामला हरियाणा राज्य का है। दयानंद (उम्र 16 वर्ष, 5 महीने एवं 19 दिन) एक लड़की का पीछा उस समय करता है जब वह गांव में दिन के 10 बजे शौच निवृत्ति के लिए जा रही होती है। उसे अपने कपड़े उतारते देख लड़की चिल्लाते हुए घर भागती है। वह वहां भी वह आ जाता है, उसके शरीर पर हाथ डालता है और जबरन बलात्कार का शिकार बनाना चाहता है तब तक लड़की की मां एवं चाचा वहां आ जाते हैं। इस काम में जिस शारीरिक एवं मानसिक दुस्साहस, बुद्धि एवं शक्ति का वह परिचय देता है वह कहीं से उसे बालक की हरकत समझकर माफ करने के लिए हमें-आपको प्रेरित नहीं करता। वर्ष 1986 में जब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बना था या उससे पहले जब चिल्ड्रेंस एक्ट था तो एक लड़का 16 वर्ष की उम्र तक ही बालक की श्रेणी में रखा जाता था। यह उस समय के परिवेश, साधारण खानपान, इंटरनेट, टीवी-कंप्यूटर की दुनिया से अनजान बच्चों के अनुरूप सही था। तब बच्चे 16 वर्ष की उम्र तक इतने ज्यादा मजबूत एवं जवान नहीं होते थे। वर्ष 2000 में जब 16 वर्ष से 18 वर्ष तक की उम्र को भी बालक श्रेणी में शामिल किया गया तो परिस्थितियां एवं परिवेश इतने बदल चुके थे कि आज अपराध एवं यौनजनित क्रियाओं में शामिल होने के लिए यही उम्र सबसे ज्यादा खतरनाक हो चुकी है। इस उम्र के लड़के हर तरह के अपराध, खून, लूटपाट, छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे मामलों में शामिल हो रहे हैं। इस तरह या तो वे खुद अपराध कर रहे हैं या बड़े अपराधी उन्हें ऐसे अपराधों में लालच देकर शामिल कर रहे हैं। उन्हें पता है कि ऐसे अपराधों में वे मुख्य अभियुक्त होंगे तब भी उन्हें जेल नहीं भेजा जा सकता है और रिमांड होम या सुधार-गृह से भागना या उन्हें भगाना उनके बांए हाथ का खेल है। हर वर्ष सैकड़ों बाल अपराधी इन सुधार घरों से भागते हैं कारण होता है वहां की सुरक्षा का लचर इंतजाम। दिल्ली में रह रहे लोगों को याद होगा उस लड़के का किस्सा, जिसने 18 वर्ष की उम्र पहुंचने तक न जाने कितने ही घरों में चोरी कर आग लगा दी थी। दिल्ली पुलिस उसे बार-बार गिरफ्तार कर सुधारगृह भेजती और बार-बार वह भागकर नई वारदात को अंजाम देता। मुंबई पर हमला कर पूरे देश की धड़कन को मंद कर देने वाले आमिर अजमल कसाब ने भी इसी कानून के तहत बार-बार अपनी रिहाई का रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश की थी। यदि वह 18 वर्ष से कम उम्र का निकलता तो सोचिए पूरे देश को दहशत में डालने वाला यह आतंकवादी आराम से सुधारगृह में तीन वर्ष रहकर अपने देश पाकिस्तान जा चुका होता। 16 से 18 वर्ष की उम्र के अपने ही ममेरे भाई एवं उसके नाबालिग दोस्तों ने जिस तरह कानपुर में बहन का एसएमएस बनाकर सर्कुलेट किया वह स्तब्ध करने वाला है। इन कारनामों को बच्चों की हरकत में शामिल माना जाएगा तो लड़की का वर्तमान एवं भविष्य बरबाद करने वालों को सबक कैसे मिलेगा? इस उम्र में और उससे भी छोटी उम्र के बच्चे जिस तरह यौन क्रियाओं में लिप्त हैं, इसका अंदाजा डॉक्टरों से बात करके लगाया जा सकता है। अब किशोर उम्र की गर्भपात कराने वाली लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल में हुए एक सर्वे के अनुसार लड़कियों की मासिक धर्म की उम्र 13 वर्ष से घटकर 10 वर्ष हो गई है। खासकर शहरों के बच्चे जिस तरह फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर, चीज, पाश्ता, कोल्ड एवं हार्ड ड्रिंक्स का उपयोग कर रहे है, इससे उनकी युवावस्था समय से पहले ही आ गई है। इंटरनेट से सारी दुनिया जुड़ चुकी है और इस आयु वर्ग की जानकारियां भी हर तरह मौजूद हंै। अपराध, सेक्स एवं नशा इसमें प्रमुख है। सिर्फ गरीब व अनपढ़ लड़के-लड़कियां ही अपराधों में शामिल हैं, ऐसा भी नहीं है। आज इन बातों में अच्छे घरों के पढ़े-लिखे और बाहर नौकरी करने वालों के लड़के भी शामिल हैं। कार, बाइक चोरी, चेन स्नैचिंग, साइबर क्राइम, बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे अपराधों में यह आयु वर्ग तेजी से अपनी पैठ बनाता जा रहा है। इस तरह के मामलों में पुलिस पहले मुकदमे दर्ज करने से परहेज करती है और यदि करती भी है तो उसकी सारी कवायद जुवेनाइल कोर्ट जाकर खत्म हो जाती है। कानून के जानकारों के बीच बहस गर्म है कि आधुनिक युवा वर्ग की यौनजनित कार्यवाहियों को देखते हुए क्यों नहीं यौन संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 या कुछ और कम कर दी जाए। ऐसे में क्या यह सोचा जा सकता है कौन-सी उम्र जल्दी यौन संबंध बनाने के काबिल है। जो हर तरह का अपराध करने में सक्षम है उसी उम्र को बालक होने का लाभ देना समाज के साथ एक ऐसा धोखा है जिसे लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था हमेशा अभियुक्त को ही सोचकर चले ऐसा संभव नहीं है। अपराध से पीडि़त लोगों के बारे में सोचकर न्याय किया जाए। जो लड़कियां या महिलाएं इस वर्ग की वजह से हत्या या लूट जैसी घटनाओं का शिकार होते हैं उनकी तरफ देखना भी आवश्यक है। बढ़ते अपराधों के सिलसिले को रोकने की दिशा में यह एक अहम पहल हो सकती है कि अगर 16 वर्ष से बड़ी उम्र के लड़के गंभीर अपराध में दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें गिरफ्तार अवश्य किया जाए और सजा भी मिले। यह अलग बात है कि उन्हें 18 वर्ष से बड़ी उम्र के अपराधियों के साथ न रखकर एक विशिष्ट जेल में रखा जाए, जहां उनकी पढ़ाई का बंदोबस्त किया जाए और वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाए। आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा ही है कि रैंगिंग करने वालों छात्रों को भारतीय दंड संहिता के तहत उचित सजा दी जाए। अब समय आ गया है कि इस पर समाज के सभी लोग विचार करें और किशोर उम्र के अपराधों पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कानूनी सुधार किए जाएं। (लेखिका सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)


Thursday, February 17, 2011

जिला जेल में धड़ल्ले से बिक रही स्मैक


लखनऊ। राजधानी की जिला जेल में इन दिनों नशीले पदार्थ की बिक्री का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। इस सच का खुलासा पिछले दिनों तलाशी के दौरान पकड़े गए बंदीरक्षक के पास नशे के पाउडर की पकड़ी गई पुड़ियाओं की घटना से हुआ। जेल प्रशासन के अधिकारियों ने आरोपी बंदीरक्षक के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए मामला को रफादफा कर दिया। बंदियों का आरोप है कि एक समय में थम गया स्मैक की बिक्री का कारोबार एक बार फिर अफसरों की साठगांठ से शुरू हो गया है। इसे लेकर प्रतिमाह हजारों रुपए का वारा-न्यारा हो रहा है। इसके बावजूद विभाग के आला-अफसर इससे बेखबर है।

प्रदेश की शायद ही ऐसी कोई जेल हो जहां मादक द्रव्यों (स्मैक, गांजा, भांग, अफीम, चरस) की आपूर्ति न होती हो। इसको लेकर जेलों में आए दिन बवाल होने की बात भी जगजाहिर है। सूत्रों के मुताबिक शासन द्वारा घोषित प्रदेश की अतिसंवेदनशील लखनऊ जेल में करीब दो साल पहले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को मनमाफिक सुविधा शुल्क देकर जेल के बंदी ही इसकी आपूर्ति धड़ल्ले से अन्य बंदियों को करते थे। सूत्रों का कहना है कि जेल में नशीले पदार्थो की आपूर्ति को रोकने एवं बंदियों को नशे की लत छुड़ाने के लिए अधिकारियों ने स्वयंसेवी संस्था की मदद से नशा उन्नमूलन कार्यक्रम को एक अभियान भी चलाया गया। जानकारों का कहना है कि अधिकारियों को यह प्रयास रंग लाया और कड़ी मशक्कत के बाद जेल के अंदर स्मैक की बिक्री काफी हद तक बंद हो गई। मादक द्रव्यों की आपूर्ति को रोकने के लिए जान जोखिम में डालकर अंकुश लगाने वाले इन अधिकारियों को जान से मारने की धमकी तक मिली। इसके बावजूद अधिकारियों ने अभियान के तहत जेल के अंदर नशीले पदार्थ की आपूर्ति पर अंकुश लगा दिया। यह सिलसिला चल ही रहा था कि शासन के निर्देश पर तत्कालीन जेल अधीक्षक का तबादला कर दिया गया। सूत्र बताते हैं कि अधीक्षक का तबादला होते ही सर्किल प्रभारी उपकारापाल से साठगांठ कर शातिर अपराधियों के माध्यम से स्मैक की बिक्री धड़ल्ले से शुरू करा दी है। इस बात का खुलासा बीते दिनों जेलर व बंदीरक्षक की मौजूदगी में ड्यूटी पर जा रहे बंदीरक्षक के पास तलाशी में 20 पुड़िया स्मैक बरामद हुई। जेल प्रशासन के अधिकारियों ने गेटबुक में नशीले पाउडर के स्थान पर अन्य वस्तु बरामद होने की बात कहते हुए मामले का रफादफा कर दिया। बताया गया है कि इस तलाशी अभियान के दौरान कुछ बंदियों ने जेल में दबंग बंदियों एवं बंदीरक्षकों के स्मैक के कारोबार में लिप्त होने की शिकायत की। बताया गया है कि प्रभारी उपकारापाल अपने चहते राइटर बंदियों के मार्फत स्मैक की बिक्री करके अपनी जेब भरने में जुटे हुए है। आलम यह है कि इस कारोबार से जुड़े कई बंदी इसकी वजह से बाहर तक नहीं जाना चाहते हैं। उधर इस बाबत जब जेलर से बातचीत करने का प्रयास किया गया तो काफी प्रयास केबाद भी उनसे सम्पर्क नहीं हो सका।

Saturday, February 5, 2011

यूपी में सबसे कम दलित उत्पीड़न : सरकार


क्राइम एन इंडिया की रिपोर्ट में खुलासा
दलित उत्पीड़न के मामलों पर घिरी मायावती सरकार ने विपक्षी दलों को जवाब देने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की प्रकाशित ‘‘क्राइम इन इंडिया’’ की रिपोर्ट का सहारा लिया है। इस रिपोर्ट में यूपी के अनुसूचित जाति, जनजाति के व्यक्तियों के खिलाफ हुए अपराधों में कमी आई है। एनसीआरबी द्वारा जारी किए गए क्राईम इन इंडिया-2009 के आकंड़ों के अनुसार यूपी में अनुसूचित जाति के खिलाफ हुए अपराधों की दर 3.8 रही, जबकि राजस्थान में यह दर 7.5, उड़ीसा में 4.2, मध्य प्रदेश में 4.3, बिहार में 4.0, आंध्र प्रदेश में 5.4 दर्ज की गयी है।

सरकार प्रवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाली उत्पीड़न की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए कठोर कदम उठाए है। इन वगरे के उत्पीड़न से संबंधित अपराधों की विवेचना में यूपी पुलिस द्वारा 94.8 प्रतिशत विवेचनाओं का निस्तारण सुनिश्चित किया गया है जबकि सम्पूर्ण भारत के कुल 35 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों के विवेचना निस्तारण का प्रतिशत मात्र 74.1 रहा है तथा निस्तारित विवेचनाओं में उत्तर प्रदेश में आरोप पत्र का प्रतिशत 85.5 रहा है।

प्रवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा इन वगरे से संबंधित वादों में प्रभावी पैरवी तथा उत्पीड़ित व्यक्ति को त्वरित न्याय दिलाने के लिए प्रदेश में 40 जनपदों में विशेष न्यायालयों का गठन किया गया है। अनुसूचित जाति, जनजाति के लम्बित अभियोगों के तेजी से निस्तारण के लिए शासन द्वारा प्रदेश के विभिन्न जनपदों में 71 फास्ट ट्रैक न्यायालयों को भी वादों के निस्तारण के लिए अधिकृत किया गया है। इस प्रकार जिलों में विशेष न्यायालय है और इसके अतिरिक्त फास्ट ट्रैक न्यायालय भी कार्यरत है। प्रवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के वादों के न्यायालयों में प्रभावी पैरवी के लिए अभियोजन संवर्ग के अभियोजकों को विशेष लोक अभियोजक भी नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जाति, जनजाति का कोई भी विचाराधीन वाद वापस नहीं लिया गया, जबकि वर्ष 2009 में कर्नाटक में 3 एवं महाराष्ट्र में 5 वाद वापस लिए गए। प्रवक्ता ने बताया कि अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध हुए अपराधों में यूपी में दोषसिद्धि के प्रकरण में 3217 थे जबकि सम्पूर्ण भारत वर्ष में दोषसिद्धि के प्रकरण मात्र 5934 थे। इस प्रकार सम्पूर्ण भारत वर्ष में सजा किए गए प्रकरणों का 54.2 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में हुआ है तथा सजा की दर 52.6 रही है जबकि सम्पूर्ण भारत वर्ष में दोषसिद्धि का औसत दर मात्र 29.6 रहा। प्रवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा जुलाई 2009 में शासनादेश निर्गत कर अनुसूचित जाति, जनजाति के उत्पीड़न के प्रकरणों में जनपद के वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी द्वारा घटना स्थल का निरीक्षण तथा की गई कार्रवाई का विवरण मुख्यालय प्रेषित करने, जघन्य अपराधों में मंडलीय अधिकारियों द्वारा घटना स्थल का निरीक्षण एवं कृत कार्रवाई की सूचना मुख्यालय प्रेषित करने तथा पीड़ित को अनुमन्य राहत राशि प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। इसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रवक्ता ने बताया कि प्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति के खिलाफ हुए अपराधों पर पूर्ण सजगता एवं संवेदनशीलता बरतते हुए घटनाओं का त्वरित पंजीकरण, समयबद्ध विवेचना एवं प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की गयी है। जिसके फलस्वरुप उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों के खिलाफ अपराधों में गिरावट आयी है.