Thursday, February 3, 2011

कानून-व्यवस्था का सच


महाराष्ट्र के मालेगांव जिले के अपर जिलाधिकारी रहे यशवंत सोनवाने की जघन्य हत्या हमारे देश की कानून-व्यवस्था पर बहुत बड़ा सवाल है। गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले अपने नैतिक-सामाजिक कर्तव्य के निर्वाह की सजा के तौर पर जिस तरह धू-धू कर एक प्रशासनिक अधिकारी जलता रहा और इसके बाद भी तेल माफियाओं के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई महाराष्ट्र के आगे नहीं बढ़ सकी, इससे हमारी सरकार और राजनीतिक व्यवस्था की कौन सी छवि सामने आती है? सरकार कोई भी हो, सभी कानून के शासन की बात करते हैं, लेकिन कानून और उसके शासन में किसका कितना विश्वास है, यह घटना ही इसका एक ताजा उदाहरण है। इससे अधिक जघन्य और शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि एक प्रशासनिक अधिकारी धू-धू कर जलता रहे और तेल माफियाओं के भय से सिहरते उसके सहयोगी चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहें? किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह अपने अधिकारी को बचाने की कोशिश भी कर सके। इससे क्या संदेश जाता है? यही न, कि हमारे देश में भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ लड़ाई की बात सोचना भी गुनाह है! ऐसी कोई कोशिश करने वाले लोग अपनी लड़ाई में नितांत अकेले और बेसहारा हैं! ऐसी सोच वाले देश में किसी तरह की अराजकता के खिलाफ आवाज भी कोई कैसे उठाएगा? सोनवाने की हत्या के मामले को सिर्फ एक अधिकारी की हत्या के तौर पर देखना ठीक नहीं होगा। गौर करने की बात यह है कि उन्हें किस तरह मारा गया। वह शख्स अपने नैतिक कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। उनका यह कर्तव्य केवल देश और सरकार ही नहीं, देश की आम जनता के प्रति भी था। तेल में मिलावट करके माफिया सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को ही चूना नहीं लगाते हैं, वे आम जनता की जेब पर भी डाका डालते हैं। सब्सिडी पर मिलने वाला किरासन तेल पेट्रोल या डीजल में मिलाया जाता है। यानी दस रुपये की चीज 65 रुपये के भाव पर बेची जाती है। इससे गाडि़यों के इंजन खराब होते हैं और अत्यधिक प्रदूषण फैलता है। दूसरी तरफ, सब्सिडी का दुरुपयोग होता है। जिन्हें इसका लाभ मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिल पाता है। अलबत्ता यह लाभ उन माफियाओं के पास चला जाता है जो सिर्फ काले धन से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। इस तरह वे देश के साथ गद्दारी और आम जनता के अधिकारों के अपहरण का दुहरा अपराध कर रहे हैं। हैरत की बात है कि यह सब वे खुले आम कर रहे हैं और संबंधित अधिकारियों की इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही है कि वे उन्हें रोक सकें। लंबे अरसे बाद किसी अधिकारी ने ऐसी हिम्मत दिखाई और उसे जिंदा जला दिया गया। वह शख्स 35 मिनट तक धू-धू कर जलता और चीखता-चिल्लाता रहा। उसके साथी यह सब होते हुए देखते रहे और कोई उसे बचाने तक नहीं आया। जबकि सोनवाने जिस एक तेल माफिया को पकड़ रहा था, उसके साथी उसे तुरंत छुड़ा कर ले भागे और अस्पताल में भरती कराकर उसकी जान बचा भी ली। सोनवाने का बचाया नहीं जा सका। न तो समय पर पुलिस पहुंच सकी और न कोई अन्य दस्ता। न तो समय पर उनके शरीर में लगी आग बुझाई जा सकी और न उन्हें अस्पताल पहुंचाया जा सका। इस पूरे घटनाक्रम से आखिर क्या जाहिर होता है? यह कोई पहली घटना नहीं है जबकि किसी अधिकारी के साथ ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ। कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश में इंडियन ऑयल के एक अधिकारी एस. मंजुनाथ की इसी तरह हत्या कर दी गई थी। उनका भी दोष यही था कि वह मिलावटखोरों के खिलाफ अभियान चला रहे थे। माफियाओं का राज केवल तेल क्षेत्र में ही हो, ऐसा नहीं है। दूसरे क्षेत्रों में भी माफिया राज का पूरा असर देखा जा सकता है। बिहार में एक इंजीनियर सत्येंद्र दुबे और गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या भी केवल इसीलिए हो गई थी कि वे अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहते थे। हमारे देश में ऐसा क्यों होता है कि ज्यादातर अफसर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने से बचते हैं? जो निर्वाह करना चाहते हैं, वे या तो असमय काल कवलित हो जाते हैं, या फिर समय के साथ यह जज्बा गंवा बैठते हैं। धीरे-धीरे वे भी वैसे ही समझौतावादी हो जाते हैं, जैसे उनके ज्यादातर सहकर्मी होते हैं। आखिर क्या वजह है कि हमारे देश में तेल से लेकर गैस, बालू और शराब तक हर क्षेत्र में माफियाओं का बोलबाला है। ये माफिया इतने मजबूत हैं कि इनके सामने पुलिस और सरकारी अधिकारियों तक की कोई हैसियत नहीं होती है। नियम-कानून ये अपने ढंग से बनाते और बिगाड़ते हैं। अधिकारी इस बात के लिए मजबूर किए जाते हैं कि ये जैसा करना चाहते हैं, वैसा ही इन्हें करने दिया जाए। सोनवाने की हत्या के बाद भी महाराष्ट्र में अधिकारी तब यह कर सके जबकि राज्य के सारे अधिकारी-कर्मचारी एक दिन की हड़ताल पर चले गए। इसके पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर न तो छापेमारी हुई और न इतनी बड़ी संख्या में माफिया पकड़े गए। अकसर यही होता है, जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है तक आनन-फानन छापेमारी होती है। सबके भीतर सोई हुई आत्मा तभी जगती है जब कोई जान चली जाती है। आखिर यह छापेमारी समय से क्यों नहीं होती है? जाहिर है, या तो खुद अफसरशाही या फिर राजनेताओं से इसका कुछ न कुछ गठजोड़ तो है ही। अगर यह गठजोड़ न होती तो माफियाओं की इतनी हिम्मत भी नहीं होती। आम जनता का अनुभव भी आम तौर पर ऐसा ही होता है। कई गैस एजेंसियों पर लोग हफ्तों बुकिंग के लिए फोन मिलाते रहते हैं और लाइनें लगातार व्यस्त पाई जाती रहती हैं। दुनिया जानती है कि लाइनें इतनी व्यस्त होती नहीं हैं। किसी भी मामले में शिकायत करने कहीं जाएं तो कोई सुनवाई नहीं होती है। आम जनता खुद तो कोई कार्रवाई कर नहीं सकती और सुनवाई उसकी कहीं होती नहीं है। आखिर वह क्या करे? सच तो यह है कि पूरे देश की जनता इस स्थिति से ऊबी हुई है। लगभग हर शख्स यह मानता है कि कालाबाजारी, मिलावटखोरी और भ्रष्टाचार के इस खुले खेल में पूरी अफसरशाही और राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल है। अगर सभी शामिल न होते तो ये खेल इस तरह खुलेआम नहीं चल रहे होते। यह सरकार और पूरी व्यवस्था के प्रति आम जनता के अविश्वास का कारण भी बन रहे हैं। क्या जनता के विश्वास के बगैर कोई सरकार चल सकती है? अगर हां, तो कितने दिन? यह दुखद अवसर सिर्फ मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए ही नहीं, सरकार और प्रशासन के लिए आत्मनिरीक्षण का भी है। आज नहीं तो कल, सत्ता में मौजूद लोगों को यह देखना ही पड़ेगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। बेहतर होगा कि वे अभी चेतें और इस प्रवृत्ति को इससे ज्यादा बढ़ने न दें। माफियाओं में विश्वास न पनपने दें कि वे ज्यादा ताकतवर हैं और सरकार कम। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)



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