लखनऊ सूबे में लुटेरों और डकैतों के हौसले बढ़ रहे हैं। इनके खौफ से लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। कानपुर के एलआइसी अधिकारी और इलाहाबाद के सर्राफ के यहां हुई वारदात इनके हौसले की ताजा मिसाल है। प्रदेश में औसतन हर रोज आधा दर्जन परिवार लूट-डकैती के शिकार हो रहे हैं। कानपुर के नौबस्ता इलाके में 14 जनवरी की भोर में डकैतों ने एलआइसी के रिटायर्ड जिला प्रबंधक मदन मोहन चावला के घर डाका डाला और लाखों का माल-असबाब लेकर फरार हो गए। 7 फरवरी को चावला की बेटी की शादी होनी थी, जेवर और पैसा लुट जाने के सदमे से उनकी मौत हो गई। इलाहाबाद के सिविल लाइंस जैसे भीड़ भरे इलाके में डकैतों ने सर्राफ धु्रव अग्रवाल को शोरूम में सरेशाम गोली मारकर 50 लाख लूट लिया। ऐसी घटनाएं थम नहीं रही हैं। सड़क पर महिलाओं के गले की चेन, बैंक में रुपये जमा करने वाले व्यापारी, रकम लेकर सफर करने वाले कारोबारी सुरक्षित नहीं हैं। अपना सब कुछ गंवा देने का खौफ दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। गुस्साए लोग तो यहां तक कहने लगे हैं कि पुलिस ने दे दी छूट, लूट सके तो लूट। हकीकत यह है कि पिछले तीन वर्षो में लूट और डकैती की घटनाएं निरंतर बढ़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 में प्रदेश में 111 डकैती और 1552 लूट के मुकदमे दर्ज हुए। 2009 में यह तस्वीर बदलकर क्रमश: 152 और 1717 हो गई। वर्ष 2010 में 170 डकैती और 2007 लूट के मामले दर्ज किए गए। महज 3 वर्ष के अंदर डकैती की 59 और लूट की 455 घटनाएं बढ़ गईं। यह सिलसिला नए वर्ष में भी थमा नहीं है। इस बाबत विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल कहते हैं, अभी हमने आंकड़ों को देखा नहीं है, लेकिन प्रदेश की पुलिस चौकसी बरत रही है और जो घटनाएं हुई उनको वर्कआउट किया गया है। लुटेरों और डकैतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। पुलिसिया तर्क जो हों लेकिन सच यही है कि लुटेरों पर अंकुश लगाने की कोशिश कामयाब नहीं हो रही है। लोग पिछले साल लखनऊ के एसएसपी/डीआइजी आवास के निकट ला प्लास में पीडब्ल्यूडी इंजीनियर सलमान के घर पड़ी डकैती की याद दिलाते हैं और पूछते हैं कि जब सूबे की राजधानी का यह आलम है तो अन्य जगहों की क्या बिसात। इंजीनियर अनूप श्रीवास्तव, कारोबारी दिनेश मिश्रा और अधिवक्ता जितेंद्र शर्मा कहते हैं कि पुलिस सिर्फ नामचीन अपराधियों के पीछे पड़ी रहती है, जबकि सुख सुविधा की चाह में अब टीन एजर्स भी लूटपाट करते हैं। यह भी तर्क है कि सही वर्कआउट न होने से लुटेरों का हौसला बढ़ता है।
Wednesday, February 2, 2011
रोज 6 परिवार लूट-डकैती के शिकार
लखनऊ सूबे में लुटेरों और डकैतों के हौसले बढ़ रहे हैं। इनके खौफ से लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। कानपुर के एलआइसी अधिकारी और इलाहाबाद के सर्राफ के यहां हुई वारदात इनके हौसले की ताजा मिसाल है। प्रदेश में औसतन हर रोज आधा दर्जन परिवार लूट-डकैती के शिकार हो रहे हैं। कानपुर के नौबस्ता इलाके में 14 जनवरी की भोर में डकैतों ने एलआइसी के रिटायर्ड जिला प्रबंधक मदन मोहन चावला के घर डाका डाला और लाखों का माल-असबाब लेकर फरार हो गए। 7 फरवरी को चावला की बेटी की शादी होनी थी, जेवर और पैसा लुट जाने के सदमे से उनकी मौत हो गई। इलाहाबाद के सिविल लाइंस जैसे भीड़ भरे इलाके में डकैतों ने सर्राफ धु्रव अग्रवाल को शोरूम में सरेशाम गोली मारकर 50 लाख लूट लिया। ऐसी घटनाएं थम नहीं रही हैं। सड़क पर महिलाओं के गले की चेन, बैंक में रुपये जमा करने वाले व्यापारी, रकम लेकर सफर करने वाले कारोबारी सुरक्षित नहीं हैं। अपना सब कुछ गंवा देने का खौफ दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। गुस्साए लोग तो यहां तक कहने लगे हैं कि पुलिस ने दे दी छूट, लूट सके तो लूट। हकीकत यह है कि पिछले तीन वर्षो में लूट और डकैती की घटनाएं निरंतर बढ़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 में प्रदेश में 111 डकैती और 1552 लूट के मुकदमे दर्ज हुए। 2009 में यह तस्वीर बदलकर क्रमश: 152 और 1717 हो गई। वर्ष 2010 में 170 डकैती और 2007 लूट के मामले दर्ज किए गए। महज 3 वर्ष के अंदर डकैती की 59 और लूट की 455 घटनाएं बढ़ गईं। यह सिलसिला नए वर्ष में भी थमा नहीं है। इस बाबत विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था बृजलाल कहते हैं, अभी हमने आंकड़ों को देखा नहीं है, लेकिन प्रदेश की पुलिस चौकसी बरत रही है और जो घटनाएं हुई उनको वर्कआउट किया गया है। लुटेरों और डकैतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। पुलिसिया तर्क जो हों लेकिन सच यही है कि लुटेरों पर अंकुश लगाने की कोशिश कामयाब नहीं हो रही है। लोग पिछले साल लखनऊ के एसएसपी/डीआइजी आवास के निकट ला प्लास में पीडब्ल्यूडी इंजीनियर सलमान के घर पड़ी डकैती की याद दिलाते हैं और पूछते हैं कि जब सूबे की राजधानी का यह आलम है तो अन्य जगहों की क्या बिसात। इंजीनियर अनूप श्रीवास्तव, कारोबारी दिनेश मिश्रा और अधिवक्ता जितेंद्र शर्मा कहते हैं कि पुलिस सिर्फ नामचीन अपराधियों के पीछे पड़ी रहती है, जबकि सुख सुविधा की चाह में अब टीन एजर्स भी लूटपाट करते हैं। यह भी तर्क है कि सही वर्कआउट न होने से लुटेरों का हौसला बढ़ता है।
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