सर्वोच्च न्यायालय का 7 जनवरी, 2011 का एक निर्णय पढ़ते वक्त ख्याल आया कि आज के बदलते परिवेश में क्या यह उचित है कि 16 से 18 वर्ष के लड़कों को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 1986 (संशोधित 2000 एवं 2006) का लाभ देते हुए जेल में न रखकर उन्हें सुधार गृह में रखा जाए। मामला हरियाणा राज्य का है। दयानंद (उम्र 16 वर्ष, 5 महीने एवं 19 दिन) एक लड़की का पीछा उस समय करता है जब वह गांव में दिन के 10 बजे शौच निवृत्ति के लिए जा रही होती है। उसे अपने कपड़े उतारते देख लड़की चिल्लाते हुए घर भागती है। वह वहां भी वह आ जाता है, उसके शरीर पर हाथ डालता है और जबरन बलात्कार का शिकार बनाना चाहता है तब तक लड़की की मां एवं चाचा वहां आ जाते हैं। इस काम में जिस शारीरिक एवं मानसिक दुस्साहस, बुद्धि एवं शक्ति का वह परिचय देता है वह कहीं से उसे बालक की हरकत समझकर माफ करने के लिए हमें-आपको प्रेरित नहीं करता। वर्ष 1986 में जब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बना था या उससे पहले जब चिल्ड्रेंस एक्ट था तो एक लड़का 16 वर्ष की उम्र तक ही बालक की श्रेणी में रखा जाता था। यह उस समय के परिवेश, साधारण खानपान, इंटरनेट, टीवी-कंप्यूटर की दुनिया से अनजान बच्चों के अनुरूप सही था। तब बच्चे 16 वर्ष की उम्र तक इतने ज्यादा मजबूत एवं जवान नहीं होते थे। वर्ष 2000 में जब 16 वर्ष से 18 वर्ष तक की उम्र को भी बालक श्रेणी में शामिल किया गया तो परिस्थितियां एवं परिवेश इतने बदल चुके थे कि आज अपराध एवं यौनजनित क्रियाओं में शामिल होने के लिए यही उम्र सबसे ज्यादा खतरनाक हो चुकी है। इस उम्र के लड़के हर तरह के अपराध, खून, लूटपाट, छेड़छाड़ या बलात्कार जैसे मामलों में शामिल हो रहे हैं। इस तरह या तो वे खुद अपराध कर रहे हैं या बड़े अपराधी उन्हें ऐसे अपराधों में लालच देकर शामिल कर रहे हैं। उन्हें पता है कि ऐसे अपराधों में वे मुख्य अभियुक्त होंगे तब भी उन्हें जेल नहीं भेजा जा सकता है और रिमांड होम या सुधार-गृह से भागना या उन्हें भगाना उनके बांए हाथ का खेल है। हर वर्ष सैकड़ों बाल अपराधी इन सुधार घरों से भागते हैं कारण होता है वहां की सुरक्षा का लचर इंतजाम। दिल्ली में रह रहे लोगों को याद होगा उस लड़के का किस्सा, जिसने 18 वर्ष की उम्र पहुंचने तक न जाने कितने ही घरों में चोरी कर आग लगा दी थी। दिल्ली पुलिस उसे बार-बार गिरफ्तार कर सुधारगृह भेजती और बार-बार वह भागकर नई वारदात को अंजाम देता। मुंबई पर हमला कर पूरे देश की धड़कन को मंद कर देने वाले आमिर अजमल कसाब ने भी इसी कानून के तहत बार-बार अपनी रिहाई का रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश की थी। यदि वह 18 वर्ष से कम उम्र का निकलता तो सोचिए पूरे देश को दहशत में डालने वाला यह आतंकवादी आराम से सुधारगृह में तीन वर्ष रहकर अपने देश पाकिस्तान जा चुका होता। 16 से 18 वर्ष की उम्र के अपने ही ममेरे भाई एवं उसके नाबालिग दोस्तों ने जिस तरह कानपुर में बहन का एसएमएस बनाकर सर्कुलेट किया वह स्तब्ध करने वाला है। इन कारनामों को बच्चों की हरकत में शामिल माना जाएगा तो लड़की का वर्तमान एवं भविष्य बरबाद करने वालों को सबक कैसे मिलेगा? इस उम्र में और उससे भी छोटी उम्र के बच्चे जिस तरह यौन क्रियाओं में लिप्त हैं, इसका अंदाजा डॉक्टरों से बात करके लगाया जा सकता है। अब किशोर उम्र की गर्भपात कराने वाली लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल में हुए एक सर्वे के अनुसार लड़कियों की मासिक धर्म की उम्र 13 वर्ष से घटकर 10 वर्ष हो गई है। खासकर शहरों के बच्चे जिस तरह फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर, चीज, पाश्ता, कोल्ड एवं हार्ड ड्रिंक्स का उपयोग कर रहे है, इससे उनकी युवावस्था समय से पहले ही आ गई है। इंटरनेट से सारी दुनिया जुड़ चुकी है और इस आयु वर्ग की जानकारियां भी हर तरह मौजूद हंै। अपराध, सेक्स एवं नशा इसमें प्रमुख है। सिर्फ गरीब व अनपढ़ लड़के-लड़कियां ही अपराधों में शामिल हैं, ऐसा भी नहीं है। आज इन बातों में अच्छे घरों के पढ़े-लिखे और बाहर नौकरी करने वालों के लड़के भी शामिल हैं। कार, बाइक चोरी, चेन स्नैचिंग, साइबर क्राइम, बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे अपराधों में यह आयु वर्ग तेजी से अपनी पैठ बनाता जा रहा है। इस तरह के मामलों में पुलिस पहले मुकदमे दर्ज करने से परहेज करती है और यदि करती भी है तो उसकी सारी कवायद जुवेनाइल कोर्ट जाकर खत्म हो जाती है। कानून के जानकारों के बीच बहस गर्म है कि आधुनिक युवा वर्ग की यौनजनित कार्यवाहियों को देखते हुए क्यों नहीं यौन संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 या कुछ और कम कर दी जाए। ऐसे में क्या यह सोचा जा सकता है कौन-सी उम्र जल्दी यौन संबंध बनाने के काबिल है। जो हर तरह का अपराध करने में सक्षम है उसी उम्र को बालक होने का लाभ देना समाज के साथ एक ऐसा धोखा है जिसे लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था हमेशा अभियुक्त को ही सोचकर चले ऐसा संभव नहीं है। अपराध से पीडि़त लोगों के बारे में सोचकर न्याय किया जाए। जो लड़कियां या महिलाएं इस वर्ग की वजह से हत्या या लूट जैसी घटनाओं का शिकार होते हैं उनकी तरफ देखना भी आवश्यक है। बढ़ते अपराधों के सिलसिले को रोकने की दिशा में यह एक अहम पहल हो सकती है कि अगर 16 वर्ष से बड़ी उम्र के लड़के गंभीर अपराध में दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें गिरफ्तार अवश्य किया जाए और सजा भी मिले। यह अलग बात है कि उन्हें 18 वर्ष से बड़ी उम्र के अपराधियों के साथ न रखकर एक विशिष्ट जेल में रखा जाए, जहां उनकी पढ़ाई का बंदोबस्त किया जाए और वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाए। आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा ही है कि रैंगिंग करने वालों छात्रों को भारतीय दंड संहिता के तहत उचित सजा दी जाए। अब समय आ गया है कि इस पर समाज के सभी लोग विचार करें और किशोर उम्र के अपराधों पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कानूनी सुधार किए जाएं। (लेखिका सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)
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