Wednesday, January 26, 2011

‘राजधानी में बढ़े नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी के मामले’


राजधानी में नाबालिग बच्चों की रहस्यमय गुमशुदगी में हुई बढ़ोतरी पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली में औसतनरोज पांच बच्चे गायब हो रहे हैं। यह हालत तब है जब पुलिस अधिकांश अपराधों को बगैर दर्ज किये ही रफा-दफा कर रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने केंद्रीय गृहमंत्री से दिल्ली में आधुनिक पुलिस दस्ता गठित करने की मांग की। गुप्ता ने कहा कि सरकार के दावों के बावजूद दिल्ली में अपराध कम नहीं हो रहे हैं। वर्ष 2010 में नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी का आंकड़ा 2500 था। मौजूदा साल के अब तक के 21 दिनों में ही यह आंकड़ा 120 पहुंच गया है। कमोवेश यही स्थिति महिलाओं के साथ छेड़छाड़, पर्स एवं चेन छिनैती की घटनाओं की है। गुप्ता ने आरोप लगाया कि दिल्ली की मुख्यमंत्री अपराधों को रोक पाने में असमर्थ हैं। वह अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि दिल्ली पुलिस उनके पास नहीं है। पाषर्द रजनी अब्बी एवं भाजपा प्रवक्ता और डॉक्टर प्रकोष्ठ के प्रभारी डॉ. सम्बित पात्रा की ओर से नेहरू विहार में स्वास्थ्य शिविर लगाया गया जिसमें करीब 2500 लोगों ने स्वास्थ्य की जांच करवाई। आयोजकों की ओर से 2 लाख रुपये से अधिक की दवाइयों का मुफ्त वितरण किया गया। डॉ. पात्रा के मुताबिक शिविर में करीब 50 चिकित्सक लोगों के स्वास्थ्य की जांच कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस तरह के शिविर पूरी दिल्ली में लगाये जायेंगे। इस मौके पर दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि वह राजधानी के लोगों को स्वस्थ देखना चाहते हैं।

Sunday, January 23, 2011

देश का सबसे असुरक्षित महानगर है दिल्ली


देश की राजधानी दिल्ली के खाते में एक और बदनुमा दाग जुड़ गया है। यह देश का सबसे असुरक्षित महानगर बन गया है। चाहे अपराध हो या महिलाओं पर अत्याचार की गिनती, राष्ट्रीय राजधानी इन सबमें अव्वल हो गई है। सरकार के ताजातरीन आंकड़ों के मुताबिक, 2009 में देश के 35 बड़े नगरों में हुए 3,43,749 अपराधों में दिल्ली का हिस्सा सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी रहा। इसके बाद बेंगलूर (9.4 फीसदी) और मुंबई (9.1 फीसदी) का स्थान रहा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार की गई क्राइम इन इंडिया 2009 रिपोर्ट में यह सच्चाई उजागर की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इन शहरों में दुष्कर्म के कुल।,696 मामलों में केवल दिल्ली में 404 मामले हुए। महिलाओं के अपहरण में भी दिल्ली का हिस्सा सबसे अधिक रहा। फिरौती के 3,544 मामलों में राजधानी का हिस्सा 38.9 फीसदी रहा है। पुलिस से नाखुश हैं लोग : राष्ट्रीय राजधानी सहित उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लोग अपने यहां की पुलिस से सबसे ज्यादा नाखुश हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2009 के दौरान देश में पुलिसकर्मियों के खिलाफ लोगों द्वारा 54 हजार 873 शिकायतें दर्ज कराई गई। इनमें इन तीन राज्यों का हिस्सा 60 फीसदी रहा है। मप्र में सबसे ज्यादा 15 हजार 903 शिकायतें दर्ज हुई हैं। जबकि उप्र में यह 10 हजार 953 रहा है। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 170 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया गया है। युवाओं में बढ़ी अपराध की प्रवृत्ति : रिपोर्ट में बताया गया, विभिन्न अपराधों में गिरफ्तार हुए लोगों में 46.5 फीसदी 18 से 30 आयुवर्ग के थे। जो यह दर्शाता है कि युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढी है। किशोर अपराधियों में 64.1 प्रतिशत हिस्सा उनका था, जो गरीब परिवारों से आते हें और जिनकी पारिवारिक आमदनी सालाना 25,000 रुपये से भी कम है। हत्या के मामले में उप्र सबसे आगे : देश में हुई 32,369 हत्याओं में यूपी का हिस्सा 14 फीसदी रहा और हत्या के 4,534 मामले दर्ज किए गए।


जम्मू : साल में 33 फीसदी महिलाएं बन रहीं अपराधी


जम्मू-कश्मीर राज्य में हर वर्ष 33 फीसदी महिलाएं संगीन आपराधिक एवं आतंकी गतिविधियों में संलिप्त पाई जा रही हैं। महिलाओं पर हावी अपराध के इस जुनून से खुफिया एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं। जम्मू-कश्मीर में इस समय डेढ़ सौ ओवर ग्राउंड वर्कर (ओजीडब्ल्यू) महिलाएं आतंकियों के लिए काम कर रही हैं। इस बात का खुलासा आरटीआइ के तहत पूछे एक सवाल के जवाब में हुआ है। पुलिस के जेल विभाग में 1 नवंबर को दायर आरटीआइ के जवाब में डीआइजी जेल मुहम्मद सुल्तान लोन ने बताया कि संभाग में हर वर्ष सैकड़ों महिलाएं संगीन अपराधों में संलिप्त पाई जा रही हैं, लेकिन अपराध में जिस प्रकार से महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है उस हिसाब से राज्य में पर्याप्त महिला थाने (वूमेन सेल) भी नहीं हैं। संभाग में महिला कैदियों के लिए फिलहाल कोई अलग जेल नहीं बनाई गई है। जम्मू संभाग में ही मात्र 3 महिला थाने (जम्मू, कठुआ व ऊधमपुर) बने हुए हैं। कानून के तहत महिला आरोपी को सामान्य थाने में न रखकर वूमेन सेल में रखा जाता है, लेकिन महिला थानों की कमी के कारण उन्हें जेल में रखना पड़ता है। मौजूदा समय में सेंट्रल कोट भलवाल, जिला जेल जम्मू, कठुआ, ऊधमपुर, पुंछ व राजौरी की जेलों में अलग बैरक बनाए गए हैं। जम्मू संभाग में 8 महिलाएं पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) जैसे गंभीर मामले में जेलों में बंद हैं। इस संभाग की 6 जेलों में 78 महिला कैदी बंद हैं। वर्ष 2009 में जम्मू संभाग में करीब 300 महिलाओं को विभिन्न आपराधिक व आतंकवाद फैलाने के मामलों में आरोपी बनाया गया था जबकि 2008 में 200 से कम महिलाओं के खिलाफ मामले दर्ज थे। मनोचिकित्सक जेके थापा का तर्क है कि आधुनिकता की दौड़ में लोगों का रुझान मीडिया से प्रभावित हो रहा है। आम महिलाएं अक्सर टीवी में चकाचौंध जीवन जीने वाले महिलाओं को देखकर उनकी तरह विख्यात होना चाहती हैं।


Thursday, January 13, 2011

इंसानियत पर धब्बा रेपिस्ट

पुलिस मान रही है कि केवल 4 फीसद अपराधी ही अनजान होते हैं, वह कहती है कि 96 फीसद मामलों में अपराध करने वाले पहचान वाले ही होते हैं
नये साल की खुमारी उतरी भी नहीं थी कि दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी ने यह स्वीकार कर सबको चौंका दिया कि राजधानी में हर 18 घंटे में एक औरत का रेप किया जाता है। बड़ी मासूमियत से यह भी मान लिया कि हर 14 घंटे में किसी ना किसी औरत के साथ र्दुव्‍यवहार होता है। जाहिर है, हम यह मान सकते हैं कि जिन गिनतियों को स्वीकार कर वे व्यवस्था का मखौल खुद उड़ाते दिख रहे हैं, हकीकत उससे भी भयावह होगी। यौन उत्पीड़न या यौन आक्रमण की शिकायत करने का साहस ना जुटा पाने वाली कितनी ही लड़कियां इसी दिल्ली में आंसुओं के साथ जीने को मजबूर हैं, जिनके परिवार उन पर जुबान ना खोलने का दबाव बनाते हैं। ये तो देश की राजधानी का हाल है, बाकी के मझौले शहरों और कस्बों में हालात इससे बेहतर तो नहीं ही हो सकते। लड़कियों के लिए समाज में चलना, निकलना खौफनाक होता जा रहा है। पुलिस मान रही है कि केवल 4 फीसद अपराधी ही अनजान होते हैं, वह कहती है कि 96 फीसद मामलों में अपराध करने वाले पहचान वाले ही होते हैं। यह वीभत्स सच है और इस पर गंभीरता से विचार अब नहीं होगा तो कभी नहीं हो पाएगा। देखने में आता है, अकसर सामाजशास्त्री व दूसरे जिम्मेदार लोग विश्लेषण करते वक्त रोना रोते हैं कि लोगों में सामाजिकता कम होती जा रही है। ज्यादातर लोगों पर आरोप लगते हैं कि वे एकाकी हो रहे हैं, दूसरों पर भरोसा नहीं करते और सिमट कर रहने लगे हैं। जबकि जीवन की सच्चाई तो स्वीकारनी ही होगी कि ये जो 96 फीसद अपराधी चिन्हित किये गये हैं, इनसे व इनकी घिनौनी मानसिकता से अपनी लड़कियों को बचाने के लिए सिमट कर रहना कितना जरूरी होता जा रहा है। इसी हफ्ते दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में 60 साल की औरत का बलात्कार के बाद किया गया र्मडर, बताता है अपराधियों की मानसिकता नहीं समझी जा सकती। जब वे घिनौनेपन पर उतारू होते हैं, तो कुछ भी कर सकते हैं। लड़कियों को आगाह करना हमारा काम है, पर जो पहचान वाले हैं, उनको कितना संदेह से देखेंगे। 56 प्रतिशत बलात्कारियों की उम्र 25 के आस-पास होना, भी सामाजिक चिन्तन का विषय है। देश की बड़ी आबादी इस समय जवान लोगों की है, सामाजिक बंधन लचीले होते जा रहे हैं। कानूनी ना होने के बावजूद सेक्स बिक रहा है। कीमत चुकाने वालों को उनकी पसंद की लड़की के चुनाव के ढेरों मौके हैं। ऐसे में किसी लड़की के साथ जबरदस्ती क्रूरता है और यह सिर्फ मर्दानगी की ऐंठ है। इसके खिलाफ कड़े कदम ना उठाया जाना, हमको ऐसे समाज की तरफ ढकेल देगा, जिसमें व्यभिचार, बलात्कार और शोषण के सिवा कुछ भी नजर नहीं आयेगा। कुछ ही दिन पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने आहत मन से कहा था कि रेप के मामले बहुत गंभीर विषय हैं, ये लगातार बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने माना कि जब तक अपराधियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक बार-बार वे यह करते रहेंगे। नये पुलिस कमिश्नर आते हैं, रस्म अदायगी के तौर पर मीठी-मीठी बातें बनाते हैं और लड़कियों को उनके हाल पर छोड़ कर अपनी दूसरी प्राथमिकताओं में व्यस्त हो जाते हैं। यह तय है कि अकेली पुलिस कुछ भी नहीं कर सकती, हर गली के मुहाने पर भी फौज खड़ी कर दी जाए, तो अपराधों को नहीं रोका जा सकता। दरअसल, सड़ी हुई मानसिकता और ये सामाजिक रवैया इतनी आसानी से बदलने वाला नहीं। जो लड़कियों को शुचिता में लपेटे रहने का ढोंग भी करता है और यौन उद्दंड भेड़ियों को खुला भी छोड़ देता है। जो दैहिक रिश्तों पर बोलने से घबराता भी है और अपने लड़कों की मर्दानगी पर ऐंठने को बेताब भी रहता है, जिसके पास लैंगिक
विभेद पर खुल कर सोचने का ना तो समय है और ना ही साहस ही। यह सच है कि लड़कियों के पास अपने हुनर दिखाने के मौके बढ़े हैं। वे पढ़ाई में अव्वल आ रही हैं, नौकरियों में बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं। पैसे और कमाई का महत्व उनको समझ में आ रहा है। वे किसी तरह का कम्प्रोमाइज करने की मानसिकता में नजर नहीं आ रहीं। लेकिन अब भी समाज में बड़ा तबका ऐसा है, जिसके लिए औरतें सिर्फ उपभोगकी चीजें हैं, जिनको फुसला कर, लालच देकर या जबरन झपट्टा मार कर वह कब्जा लेने की मानसिकता से बाज आता नहीं नजर आ रहा।
यह सच है कि हमारे कानून अधकचरे हैं। उनमें ऐसी धार नहीं, जो अपराधी के भीतर भय पैदा कर सकें। बलात्कारी के पक्ष में दलीलें देने वालों की मानसिक दुर्दशा पर हैरानी होती है। साथ ही, इस पर गंभीर चिन्तन की जरूरत भी लगती है कि इतनी वीभत्स सामाजिक स्थिति में उल्लास और उत्साह के साथ सड़कों पर दिखने वाली मस्त लड़कियों के भीतर कहां से आ जाता है यह जबर्दस्त आत्मविास। कह सकते हैं कि परिस्थितियां उनको भीतर से मजबूत बनाने का काम तो करती हैं। दूसरे, अपराधियों के हौंसले परास्त करने के लिए उनका यह आत्मविास और आगे बढ़ते जाने की ललक काफी है। यह कहना कतई गलत नहीं है कि विषम स्थितियों ने उनको भीतर से मजबूत तो बनाया ही है। साथ ही, वे आज जिस भी स्थिति में हैं, उसमें किसी सामाजिक या राजनीतिक चेतना की जरा भी सकारात्मक भूमिका नहीं है। वे जो कुछ भी कर पा रही हैं, वे उनके खुद के प्रयास हैं। हिम्मत है और जोखिमों को चुनौती देने की शक्ति है। हालात यदि ऐसे ही रहे, तो लड़कियों को इन खौफनाक सामाजिक चुनौतियों से जूझने के लिए ना-मालूम किन तरीकों को अपनाना पड़ेगा, जिसकी हम अभी कल्पना भी नहीं कर सकते। इसी हफ्ते जब पटना में रूपम पाठक ने सत्ता दल के विधायक को सबके सामने चाकू घोंप कर मार दिया तो सब स्तब्ध थे। कुछ लोगों का कहना था कि औरत इस तरह का अपराध नहीं कर सकती, तो कुछ को लगा कि उसमें इतनी ताकत कैसे आई कि छुरे के एक वार से जान ही चली गई। सच तो यह है कि आतंकित और शोषित के भीतर उठी प्रतिघात की भावना बहुत बलशाली होती है। मैं रूपम के अपराध को जस्टीफाई नहीं कर रही पर तमाम स्थितियां, जो औरतों के खिलाफ होती जा रही हैं, क्या उनको इस तरह के अपराधों के लिए उकसाने का काम नहीं करेंगी? जब न्याय से विास उठ जाएगा, न्यायिक प्रक्रिया का खिंचते जाना उकताऊ हो जाएगा। बिना किसी अपराध के भी उनको मुंह छिपा कर जीने को बेबस होना पड़ेगा, तो आखिरकार तंग आकर वे क्या करेंगी? बता रहे हैं कि रूपम अपने यौ न शोषण के खिलाफ शिकायत भी कर चु की थी। राजनीतिक गलियारों में औरतों के साथ क्या कुछ होता है, यह अलग से चर्चा का विषय है, पर सच तो यह है कि समाज का कोई भी हिस्सा इस तरह के अपराधों से अछूता नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि जेसिका लाल जैसे र्मडर पर फिल्म अपने यहां सिर्फ इसलिए बन जाती है क्योंकि यह हाईप्रोफाइल मामला था। बड़े-बड़े लोग जेसिका को न्याय दिलाने के नाम पर मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर निकल आये थे, पर ये लड़कियां जिनकी हर 18 घंटे में अस्मत लूटी जा रही है, किसके पास जाएंगी, अपना दुखड़ा रोने। साहस करके शिकायत दर्ज कराने और मीडिया में थोड़ी सी भी जगह पाने को लालायित रहने की चाह में ये कहां-कहां भटकेंगी। देह के भूखे भेड़ियों को भीड़ में पहचान पाना नामुमकिन है, पर जो पकड़ लिये जाते हैं, उनको कड़ी सजा हो, यह भी जरूरी है। साथ ही यह भी कि हम सब मिल कर इनका सामाजिक बहिष्कार करें, इनको अहसास करायें कि जो इन्होंने किया वह बेहद दर्दनाक गुनाह है। घर वाले भी पुत्र मोह से निकलें, ऐसे दरिन्दे बेटे के लिए पुलिस/मुकदमों से बाज आयें। छोड़ दें इनको, भूल जाएं। बेघर मान लें, ऐसे घिनौने व्यक्ति को। इसको समझने के लिए यह तथ्य भी जान लें कि जेलों में बंद दूसरे दुर्दान्त अपरधी भी बलात्कारियों से घृणा करते हैं और इनके साथ बेहद बेदर्दी से पेश आते हैं। पुलिस अधिकारी स्वीकारते हैं कि जेलों में सजा काट रहे दूसरे अपराधी बलात्कार करने वाले को हैवान मानते हैं और इनसे दूरी बना कर रहते हैं। यह अद्भुत लेकिन हकीकत बयान करने वाला सच है। जैसा कि मैं हमेशा से मानती रही हूं, मर्दानगी की ऐेंठ को भोथरा किये बिना, यह जंग नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही यह भी कि ऐसे अपराधियों को सजा के तौर पर सारा जीवन सामाजिक कार्य कराये जाएं। कम्युनिटी सर्विस जैसी सजाओं से इनको ता-उम्र मुक्त ना किया जाए। जेल के भीतर ठूंसने से इनका ब्रेनवॉश नहीं होने वाला, इनको बूढ़ों, अपाहिजों, मानसिक रूप से विकलांग लोगों की सेवा में लगाया जाए। इनसे सड़कों पर झाड़ू लगवायी जाए, कचरा उठवाया जाए, बूचड़खानों और शवगृहों की सफाई करयी जाए। पोस्टमार्टम हाउस में इनकी सेवाएं ली जाएं, सीवर लाइनें साफ कराई जाएं और सड़कों पर मरे पड़े लावारिस मवेशियों को उठवाने का काम दिया जाए।
इनको बूढ़ों, अपाहिजों, मानसिक रूप से विकलांग लोगों की सेवा में लगाया जाए। इनसे सड़कों पर झाड़ू लगवायी जाए, कचरा उठवाया जाए, बूचड़खानों और शवगृहों की सफाई करयी जाए। पोस्टमार्टम हाउस में इनकी सेवाएं ली जाए


असम सीमा में उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश

असम और मेघालय की सीमा पर गोलपाड़ा-पूर्वी गारो पर्वतीय इलाके में पिछले 10 दिनों में जातीय हिंसा में मरने वालों की संख्या 10 तक पहुंच गई है। इसे देखते हुए असम सरकार ने अपनी सीमा में उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किया गया है और सीमावर्ती इलाके में कफ्र्यू जारी है। आधिकारिक सूत्रों ने यहां बताया कि असम सरकार ने रविवार रात दिसपुर में उच्च स्तरीय सुरक्षा बैठक के बाद यह आदेश जारी किया। गोलपाड़ा के उपायुक्त पीके गोस्वामी ने फोन पर बताया कि रविवार शाम को दो और शव बरामद किए गए, जिससे राभा और गारों के बीच जातीय हिंसा में मरने वालों की संख्या 10 हो गई है। पूर्वी गारो पर्वतीय जिले के उपायुक्त प्रवीण बख्शी ने बताया कि रविवार को असम में गारो बहुल चिगिस्म, कलडांग और कासिकगारा गांवों पर हमला किया गया। यहां से करीब 200 गारो महिलाएं और च्च्चे अपना घरबार छोड़कर पूर्वी गारो पर्वतीय जिले भाग गए तथा वहां हुडाकोना प्राथमिक विद्यालय में रात के लिए शरण मांगी। इन महिलाओं और च्च्चों को सोमवार तड़के सैनिकों ने राहत शिविरों में पहुंचाया। इसके अलावा गोलपाड़ा के पैकान में राहत सामग्री ले जा रहे एक वाहन में आग लगा दी गई, जिससे 11 लोग घायल हो गए। गारो गांवों में आगजनी के बाद मेघालय सीमा में गेंदाबारी राभा गांव में आग लगा दी गई। बख्शी ने बताया कि सुरक्षा बलों ने सेना की मदद से त्वरित कार्रवाई करते हुए हिंसक स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए दोनों जिलों के बीच से गुजरने वाले सभी मार्ग बंद कर दिए।
 मेघालय में 103 गिरफ्तार, 25 मामले दर्ज : डीजीपी
  मेघालय के जातीय हिंसा प्रभावित क्षेत्रों से कुल 103 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और आगजनी तथा दंगा-फसाद का प्रयास करने को लेकर 25 मामले दर्ज किए गए हैं। राज्य के पुलिस प्रमुख एसबी काकाती ने सोमवार को बताया कि मेघालय में करीब 26 गांव हिंसा से प्रभावित हैं और करीब 1500 मकानों में आगजनी की घटनाएं हुईं। काकाती ने कहा कि मेघालय के पूर्वी गारो हिल्स जिले के मेंदीपाथर में संयुक्त नियंत्रण कक्ष स्थापित करने का फैसला किया गया है। नियंत्रण कक्ष हालात की निगरानी के साथ अफवाहों की जांच करेगा। अ‌र्द्धसैनिक बलों और पुलिस की 14 कंपनियों को यहां प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया गया

विदेशी इन्वेस्टमेंट कम्पनी करोड़ों लेकर फरार

जांच में जुटी पुलिस, एक लाख पर 12 सौ रुपए रोजाना रिटर्न के लालच में फंस गए लोग
नोएडा,विदेशी इन्वेस्टमेंट कम्पनी द्वारा करोड़ों की ठगी का मामला सामने आया है। कम्पनी ने एक लाख रुपए पर रोजाना करीब 12 सौ रुपए का रिटर्न देने को कहा था। कम्पनी का दफ्तर सेक्टर-58 कोतवाली क्षेत्र के सेक्टर-62 स्थित कोरेंथम टॉवर में है। कम्पनी पिछले साल मार्च से काम कर रही है। फिलहाल सेक्टर-58 कोतवाली पुलिस को 15 लोगों ने शिकायत दी है। उनकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज कर ली गई है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक शिकायत की जांच की जा रही है। पुलिस अधिकारी भी इस बात को मान रहे हैं कि घोटाला करोड़ों में हो सकता है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक ठगी का शिकार हुए लोगों की संख्या बढ़ सकती है। सेक्टर-58 कोतवाली पुलिस के मुताबिक एंडमार्क फॉरेक्स सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कम्पनी के बारे में शिकायत मिली है। इस कम्पनी ने अपना दफ्तर पिछले साल मार्च में सेक्टर-18 के ओशियन प्लाजा में खोला था। सितम्बर में यह दफ्तर सेक्टर-62 स्थित कोरेंथम टॉवर में शिफ्ट हो गया। कम्पनी ने अपनी वेबसाइट, प्रमोशनल एसएमएस और अखबारों में विज्ञापन देकर लुभावनी स्कीमों में निवेश करने का झांसा दिया। कम्पनी ने निवेशकर्ताओं से कहा कि एक लाख के निवेश पर प्रतिदिन 12 सौ रुपए का रिटर्न मिलेगा। इसके अलावा टेन्योर पूरा होने पर जमा की गई रकम पर पांच गुना तक रिटर्न देने का वादा किया था। कम्पनी की किसी भी स्कीम में 50 हजार रुपए से कम की रकम नहीं लगाई जा सकती थी। लुभावनी स्कीम के झांसे में आकर लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई के लाखों रुपए लगा दिए। रिटर्न नहीं मिला तो लोग पूछताछ करने कम्पनी के दफ्तर पहुंचे। शनिवार व रविवार का दफ्तर बंद रहता है। सोमवार को लोग पहुंचे तो दफ्तर के गेट पर ताला लगा हुआ था। यह देखकर लोगों का माथा ठनका और हंगामा शुरू कर दिया। घटना की जानकारी मिलने पर सेक्टर-58 कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। एसएसपी अमिताभ यश ने बताया कि जिस तरह से पीड़ित बता रहे हैं उससे लगता है कि यह मामला करोड़ों की ठगी का हो सकता है। इसमें कितने लोग शामिल हैं और यह कम्पनी कहां से ऑपरेट करती थी इसकी जांच की जा रही है। सभी लोगों की शिकायतों को दर्ज करने का आदेश दिया गया है। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ताओं की संख्या बढ़ सकती है।
आईएसओ सर्टिफाइड होने का किया था दावा
कम्पनी की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वह आईएसओ 9001 : 2008 सर्टिफाइड है। इसके अलावा मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स में रजिस्र्टड है। इतना ही नहीं कम्पनी ने कम्पनीज एक्ट के तहत भी रजिस्र्टड होने का दावा किया है। वेबसाइट पर बताया गया है कि कम्पनी का मुख्यालय यूके में है। इसके दफ्तर अमेरिका, हांगकांग और भारत में हैं। वेबसाइट पर इन देशों में मौजूद दफ्तरों के टेलीफोन नम्बर दिए गए हैं। इन पर सम्पर्क करने की कोशिश की गई लेकिन फोन नहीं उठे।
लुभावनी स्कीमों के झांसे में आए
एंडमार्क कम्पनी की वेबसाइट पर तमाम लुभावनी स्कीमों की जानकारी दी गई है। ट्रेडिंग डेज के मुताबिक मिलने वाले रिटर्न के बारे में बताया गया है। कम से कम 50 हजार का निवेश करने की बात कही गई है। पीड़ित अभय और आकाश वर्मा के मुताबिक 50 हजार रुपए निवेश करने पर 1 हजार रुपए रजिस्ट्रेशन फीस लगती थी। इसके बाद प्रत्येक ट्रेडिंग डे में .75 प्रतिशत रिटर्न देने की बात कही गई है। इस तरह रोजाना 50 हजार के निवेश पर 550 रुपए रोजाना रिटर्न और एक लाख के निवेश पर 12 सौ रुपए रोजान रिटर्न मिलने की बात कही गई है।
पहले भी ठगा है ऐसी कम्पनियों ने
कुछ माह पहले दो इन्वेस्टमेंट कम्पनियां लोगों के करोड़ों रुपए लेकर फरार हो चुकी हैं। इसके बावजूद लोग पैसा लगाने से परहेज नहीं करते। एंडमार्क कम्पनी की प्रोफाइल जाने बगैर लोगों ने महज विज्ञापन और वेबसाइट देखकर निवेश किया। पीड़ितों में कई ऐसे लोग थे जिन्होंने बैंकों से लोन लेकर कम्पनी में निवेश किया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक तमाम ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिन्होंने अपने काले धन को कम्पनी में निवेश किया होगा। इस कम्पनी ने भी वेबसाइट पर भी अपने अधिकारियों के बारे में कोई ब्योरा नहीं दिया है।

Monday, January 10, 2011

होनहारों की बन रही है बदमाश कंपनी

गाजियाबाद, पिछले दिनों पकड़े गए सात बदमाशों में फिर तीन बीटेक, एक एमसीए, एक बीबीए और एक बीकॉम का छात्र निकला। यह पहला मौका नहीं था जब जनपद के प्रतिष्ठित संस्थानों के होनहार सपूत ऐसे काले कारनामों में लिप्त मिले। इससे पहले भी मोबाइल फोन व चेन स्नेचिंग में तकनीकी संस्थानों के छात्र पकड़े जाते रहे हैं। इससे साफ है कि युवा जरूरत पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि लग्जरी पूरी करने के लिए अपराध की डगर पर चल रहे हैं। जानकारों के अनुसार गर्लफ्रेंड पर रौब जमाना और इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स की सनक उन्हें इस राह पर ला रही है। पिछले साल भी आठ छात्र अपराध के अलग-अलग मामलों में धरे गए। वर्ष 2009 में भी पांच छात्र झपटमारी में पकड़े गए थे। इस साल के पहले सप्ताह में ही पुलिस ने सात बदमाश गिरफ्तार किए, जिनमें से छह छात्र थे। काले कारनामों में केवल लड़के ही आगे हों, ऐसा नहीं है। व्यावसायिक कालेजों की लड़कियां भी कई बार पकड़ी जा चुकी हैं। सवाल यह उठता है कि इस सबके पीछे वजह क्या है कि प्रतियोगी परीक्षा पास करके प्रवेश लेने वाले युवा इस तरह के अपराध कर रह हैं। मनोविशेषज्ञ डा. संजीव त्यागी के अनुसार इसे पीयर प्रेशर कहा जाता है। यानी आपके आसपास का जो वातावरण है, उसका दबाव झेलना। वह कहते हैं कि गाजियाबाद के संस्थानों में बड़ी संख्या में छोटे शहरों के मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे शिक्षा लेने आते हैं। यहां रहते हुए उन्हें घर से सीमित राशि खर्च के लिए भेजी जाती है। अपने साथ पढ़ने वाले पैसे वाले घरों के बच्चों या स्थानीय छात्रों के साथ जब उनका सोशल मुकाबला होता है तो वह खुद को हीन महसूस करने लगते हैं। मसलन महंगे मोबाइल फोन, मॉल में शॉपिंग, ब्रांडेड कपड़े, मल्टीप्लैक्स में मूवी देखना आदि उनके लिए सीमित खर्च में मुमकिन नहीं है। ऐसे में अक्सर कई छात्र झपटमारी की राह पकड़ लेते हैं। मनोचिकित्सक डा.शशांक सिंघल कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह गर्लफ्रेंड के सामने स्टेटस सिंबल का रौब भी दिखाना है। वह कहते हैं कि कालेजों में अक्सर कई लड़कियां भी टाइम पास के लिए किसी रिलेशनशिप में शामिल हो रही हैं। ऐसे में लड़कों को उनके महंगे शौक पूरे करने के लिए यही सबसे आसान तरीका दिखता है।