गाजियाबाद, पिछले दिनों पकड़े गए सात बदमाशों में फिर तीन बीटेक, एक एमसीए, एक बीबीए और एक बीकॉम का छात्र निकला। यह पहला मौका नहीं था जब जनपद के प्रतिष्ठित संस्थानों के होनहार सपूत ऐसे काले कारनामों में लिप्त मिले। इससे पहले भी मोबाइल फोन व चेन स्नेचिंग में तकनीकी संस्थानों के छात्र पकड़े जाते रहे हैं। इससे साफ है कि युवा जरूरत पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि लग्जरी पूरी करने के लिए अपराध की डगर पर चल रहे हैं। जानकारों के अनुसार गर्लफ्रेंड पर रौब जमाना और इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स की सनक उन्हें इस राह पर ला रही है। पिछले साल भी आठ छात्र अपराध के अलग-अलग मामलों में धरे गए। वर्ष 2009 में भी पांच छात्र झपटमारी में पकड़े गए थे। इस साल के पहले सप्ताह में ही पुलिस ने सात बदमाश गिरफ्तार किए, जिनमें से छह छात्र थे। काले कारनामों में केवल लड़के ही आगे हों, ऐसा नहीं है। व्यावसायिक कालेजों की लड़कियां भी कई बार पकड़ी जा चुकी हैं। सवाल यह उठता है कि इस सबके पीछे वजह क्या है कि प्रतियोगी परीक्षा पास करके प्रवेश लेने वाले युवा इस तरह के अपराध कर रह हैं। मनोविशेषज्ञ डा. संजीव त्यागी के अनुसार इसे पीयर प्रेशर कहा जाता है। यानी आपके आसपास का जो वातावरण है, उसका दबाव झेलना। वह कहते हैं कि गाजियाबाद के संस्थानों में बड़ी संख्या में छोटे शहरों के मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे शिक्षा लेने आते हैं। यहां रहते हुए उन्हें घर से सीमित राशि खर्च के लिए भेजी जाती है। अपने साथ पढ़ने वाले पैसे वाले घरों के बच्चों या स्थानीय छात्रों के साथ जब उनका सोशल मुकाबला होता है तो वह खुद को हीन महसूस करने लगते हैं। मसलन महंगे मोबाइल फोन, मॉल में शॉपिंग, ब्रांडेड कपड़े, मल्टीप्लैक्स में मूवी देखना आदि उनके लिए सीमित खर्च में मुमकिन नहीं है। ऐसे में अक्सर कई छात्र झपटमारी की राह पकड़ लेते हैं। मनोचिकित्सक डा.शशांक सिंघल कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह गर्लफ्रेंड के सामने स्टेटस सिंबल का रौब भी दिखाना है। वह कहते हैं कि कालेजों में अक्सर कई लड़कियां भी टाइम पास के लिए किसी रिलेशनशिप में शामिल हो रही हैं। ऐसे में लड़कों को उनके महंगे शौक पूरे करने के लिए यही सबसे आसान तरीका दिखता है।
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