नये साल की खुमारी उतरी भी नहीं थी कि दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी ने यह स्वीकार कर सबको चौंका दिया कि राजधानी में हर 18 घंटे में एक औरत का रेप किया जाता है। बड़ी मासूमियत से यह भी मान लिया कि हर 14 घंटे में किसी ना किसी औरत के साथ र्दुव्यवहार होता है। जाहिर है, हम यह मान सकते हैं कि जिन गिनतियों को स्वीकार कर वे व्यवस्था का मखौल खुद उड़ाते दिख रहे हैं, हकीकत उससे भी भयावह होगी। यौन उत्पीड़न या यौन आक्रमण की शिकायत करने का साहस ना जुटा पाने वाली कितनी ही लड़कियां इसी दिल्ली में आंसुओं के साथ जीने को मजबूर हैं, जिनके परिवार उन पर जुबान ना खोलने का दबाव बनाते हैं। ये तो देश की राजधानी का हाल है, बाकी के मझौले शहरों और कस्बों में हालात इससे बेहतर तो नहीं ही हो सकते। लड़कियों के लिए समाज में चलना, निकलना खौफनाक होता जा रहा है। पुलिस मान रही है कि केवल 4 फीसद अपराधी ही अनजान होते हैं, वह कहती है कि 96 फीसद मामलों में अपराध करने वाले पहचान वाले ही होते हैं। यह वीभत्स सच है और इस पर गंभीरता से विचार अब नहीं होगा तो कभी नहीं हो पाएगा। देखने में आता है, अकसर सामाजशास्त्री व दूसरे जिम्मेदार लोग विश्लेषण करते वक्त रोना रोते हैं कि लोगों में सामाजिकता कम होती जा रही है। ज्यादातर लोगों पर आरोप लगते हैं कि वे एकाकी हो रहे हैं, दूसरों पर भरोसा नहीं करते और सिमट कर रहने लगे हैं। जबकि जीवन की सच्चाई तो स्वीकारनी ही होगी कि ये जो 96 फीसद अपराधी चिन्हित किये गये हैं, इनसे व इनकी घिनौनी मानसिकता से अपनी लड़कियों को बचाने के लिए सिमट कर रहना कितना जरूरी होता जा रहा है। इसी हफ्ते दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में 60 साल की औरत का बलात्कार के बाद किया गया र्मडर, बताता है अपराधियों की मानसिकता नहीं समझी जा सकती। जब वे घिनौनेपन पर उतारू होते हैं, तो कुछ भी कर सकते हैं। लड़कियों को आगाह करना हमारा काम है, पर जो पहचान वाले हैं, उनको कितना संदेह से देखेंगे। 56 प्रतिशत बलात्कारियों की उम्र 25 के आस-पास होना, भी सामाजिक चिन्तन का विषय है। देश की बड़ी आबादी इस समय जवान लोगों की है, सामाजिक बंधन लचीले होते जा रहे हैं। कानूनी ना होने के बावजूद सेक्स बिक रहा है। कीमत चुकाने वालों को उनकी पसंद की लड़की के चुनाव के ढेरों मौके हैं। ऐसे में किसी लड़की के साथ जबरदस्ती क्रूरता है और यह सिर्फ मर्दानगी की ऐंठ है। इसके खिलाफ कड़े कदम ना उठाया जाना, हमको ऐसे समाज की तरफ ढकेल देगा, जिसमें व्यभिचार, बलात्कार और शोषण के सिवा कुछ भी नजर नहीं आयेगा। कुछ ही दिन पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने आहत मन से कहा था कि रेप के मामले बहुत गंभीर विषय हैं, ये लगातार बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने माना कि जब तक अपराधियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक बार-बार वे यह करते रहेंगे। नये पुलिस कमिश्नर आते हैं, रस्म अदायगी के तौर पर मीठी-मीठी बातें बनाते हैं और लड़कियों को उनके हाल पर छोड़ कर अपनी दूसरी प्राथमिकताओं में व्यस्त हो जाते हैं। यह तय है कि अकेली पुलिस कुछ भी नहीं कर सकती, हर गली के मुहाने पर भी फौज खड़ी कर दी जाए, तो अपराधों को नहीं रोका जा सकता। दरअसल, सड़ी हुई मानसिकता और ये सामाजिक रवैया इतनी आसानी से बदलने वाला नहीं। जो लड़कियों को शुचिता में लपेटे रहने का ढोंग भी करता है और यौन उद्दंड भेड़ियों को खुला भी छोड़ देता है। जो दैहिक रिश्तों पर बोलने से घबराता भी है और अपने लड़कों की मर्दानगी पर ऐंठने को बेताब भी रहता है, जिसके पास लैंगिक
विभेद पर खुल कर सोचने का ना तो समय है और ना ही साहस ही। यह सच है कि लड़कियों के पास अपने हुनर दिखाने के मौके बढ़े हैं। वे पढ़ाई में अव्वल आ रही हैं, नौकरियों में बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं। पैसे और कमाई का महत्व उनको समझ में आ रहा है। वे किसी तरह का कम्प्रोमाइज करने की मानसिकता में नजर नहीं आ रहीं। लेकिन अब भी समाज में बड़ा तबका ऐसा है, जिसके लिए औरतें सिर्फ ‘उपभोग’ की चीजें हैं, जिनको फुसला कर, लालच देकर या जबरन झपट्टा मार कर वह कब्जा लेने की मानसिकता से बाज आता नहीं नजर आ रहा।
यह सच है कि हमारे कानून अधकचरे हैं। उनमें ऐसी धार नहीं, जो अपराधी के भीतर भय पैदा कर सकें। बलात्कारी के पक्ष में दलीलें देने वालों की मानसिक दुर्दशा पर हैरानी होती है। साथ ही, इस पर गंभीर चिन्तन की जरूरत भी लगती है कि इतनी वीभत्स सामाजिक स्थिति में उल्लास और उत्साह के साथ सड़कों पर दिखने वाली मस्त लड़कियों के भीतर कहां से आ जाता है यह जबर्दस्त आत्मविास। कह सकते हैं कि परिस्थितियां उनको भीतर से मजबूत बनाने का काम तो करती हैं। दूसरे, अपराधियों के हौंसले परास्त करने के लिए उनका यह आत्मविास और आगे बढ़ते जाने की ललक काफी है। यह कहना कतई गलत नहीं है कि विषम स्थितियों ने उनको भीतर से मजबूत तो बनाया ही है। साथ ही, वे आज जिस भी स्थिति में हैं, उसमें किसी सामाजिक या राजनीतिक चेतना की जरा भी सकारात्मक भूमिका नहीं है। वे जो कुछ भी कर पा रही हैं, वे उनके खुद के प्रयास हैं। हिम्मत है और जोखिमों को चुनौती देने की शक्ति है। हालात यदि ऐसे ही रहे, तो लड़कियों को इन खौफनाक सामाजिक चुनौतियों से जूझने के लिए ना-मालूम किन तरीकों को अपनाना पड़ेगा, जिसकी हम अभी कल्पना भी नहीं कर सकते। इसी हफ्ते जब पटना में रूपम पाठक ने सत्ता दल के विधायक को सबके सामने चाकू घोंप कर मार दिया तो सब स्तब्ध थे। कुछ लोगों का कहना था कि औरत इस तरह का अपराध नहीं कर सकती, तो कुछ को लगा कि उसमें इतनी ताकत कैसे आई कि छुरे के एक वार से जान ही चली गई। सच तो यह है कि आतंकित और शोषित के भीतर उठी प्रतिघात की भावना बहुत बलशाली होती है। मैं रूपम के अपराध को जस्टीफाई नहीं कर रही पर तमाम स्थितियां, जो औरतों के खिलाफ होती जा रही हैं, क्या उनको इस तरह के अपराधों के लिए उकसाने का काम नहीं करेंगी? जब न्याय से विास उठ जाएगा, न्यायिक प्रक्रिया का खिंचते जाना उकताऊ हो जाएगा। बिना किसी अपराध के भी उनको मुंह छिपा कर जीने को बेबस होना पड़ेगा, तो आखिरकार तंग आकर वे क्या करेंगी? बता रहे हैं कि रूपम अपने यौ न शोषण के खिलाफ शिकायत भी कर चु की थी। राजनीतिक गलियारों में औरतों के साथ क्या कुछ होता है, यह अलग से चर्चा का विषय है, पर सच तो यह है कि समाज का कोई भी हिस्सा इस तरह के अपराधों से अछूता नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि जेसिका लाल जैसे र्मडर पर फिल्म अपने यहां सिर्फ इसलिए बन जाती है क्योंकि यह हाईप्रोफाइल मामला था। बड़े-बड़े लोग जेसिका को न्याय दिलाने के नाम पर मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर निकल आये थे, पर ये लड़कियां जिनकी हर 18 घंटे में अस्मत लूटी जा रही है, किसके पास जाएंगी, अपना दुखड़ा रोने। साहस करके शिकायत दर्ज कराने और मीडिया में थोड़ी सी भी जगह पाने को लालायित रहने की चाह में ये कहां-कहां भटकेंगी। देह के भूखे भेड़ियों को भीड़ में पहचान पाना नामुमकिन है, पर जो पकड़ लिये जाते हैं, उनको कड़ी सजा हो, यह भी जरूरी है। साथ ही यह भी कि हम सब मिल कर इनका सामाजिक बहिष्कार करें, इनको अहसास करायें कि जो इन्होंने किया वह बेहद दर्दनाक गुनाह है। घर वाले भी पुत्र मोह से निकलें, ऐसे दरिन्दे बेटे के लिए पुलिस/मुकदमों से बाज आयें। छोड़ दें इनको, भूल जाएं। बेघर मान लें, ऐसे घिनौने व्यक्ति को। इसको समझने के लिए यह तथ्य भी जान लें कि जेलों में बंद दूसरे दुर्दान्त अपरधी भी बलात्कारियों से घृणा करते हैं और इनके साथ बेहद बेदर्दी से पेश आते हैं। पुलिस अधिकारी स्वीकारते हैं कि जेलों में सजा काट रहे दूसरे अपराधी बलात्कार करने वाले को हैवान मानते हैं और इनसे दूरी बना कर रहते हैं। यह अद्भुत लेकिन हकीकत बयान करने वाला सच है। जैसा कि मैं हमेशा से मानती रही हूं, मर्दानगी की ऐेंठ को भोथरा किये बिना, यह जंग नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही यह भी कि ऐसे अपराधियों को सजा के तौर पर सारा जीवन सामाजिक कार्य कराये जाएं। कम्युनिटी सर्विस जैसी सजाओं से इनको ता-उम्र मुक्त ना किया जाए। जेल के भीतर ठूंसने से इनका ब्रेनवॉश नहीं होने वाला, इनको बूढ़ों, अपाहिजों, मानसिक रूप से विकलांग लोगों की सेवा में लगाया जाए। इनसे सड़कों पर झाड़ू लगवायी जाए, कचरा उठवाया जाए, बूचड़खानों और शवगृहों की सफाई करयी जाए। पोस्टमार्टम हाउस में इनकी सेवाएं ली जाएं, सीवर लाइनें साफ कराई जाएं और सड़कों पर मरे पड़े लावारिस मवेशियों को उठवाने का काम दिया जाए।
इनको बूढ़ों, अपाहिजों, मानसिक रूप से विकलांग लोगों की सेवा में लगाया जाए। इनसे सड़कों पर झाड़ू लगवायी जाए, कचरा उठवाया जाए, बूचड़खानों और शवगृहों की सफाई करयी जाए। पोस्टमार्टम हाउस में इनकी सेवाएं ली जाएं
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