इन दिनों उत्तर प्रदेश की लचर कानून-व्यवस्था को देखते हुए लोग यही कह रहे हैं कि प्रदेश में एक महिला मुख्यमंत्री के राज में औरतों की हिफाजत भगवान भरोसे है। राज्य में दरिंदगी का आलम यह है कि लखीमपुर खीरी हत्याकांड के बाद कई जिलों में बलात्कार के आधा दर्जन नए मामले सामने आए हैं। कन्नौज में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म की कोशिश में नाकाम होने पर दरिंदों ने उसकी आंखें फोड़ दिया। इसके अलावा पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के कई जिलों में भी दुष्कर्म की घटनाएं हुई हैं। एटा में एक महिला के साथ पांच लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। इतना ही नहीं, बाद दुष्कर्मियों ने उसे जिंदा जला दिया। वहीं बस्ती में एक 18 साल की लड़की के साथ गांव के दबंग ने बलात्कार किया, जबकि गोंडा में तेरह साल की एक लड़की की लाश मिली। कानपुर में बीस वर्षीय फरजाना के साथ तीन दिनों तक सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई। महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार के बाद निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश अराजकता के भीषण दौर से गुजर रहा है। इसके बावजूद प्रदेश की मुखिया मायावती ने अभी तक न तो प्रभावित गांवों का दौरा किया और न ही पीडि़त परिवार वालों से मुलाकात की। दरअसल, इन दिनों वह कुछ राज्यों में बसपा कार्यकर्ता सम्मेलनों में व्यस्त हैं। उन्हें देखकर रोमन सम्राट नीरो की याद आती है जब रोम जल रहा था तब वह बांसुरी वादन में मग्न थे। पिछले दिनों लखीमपुर खीरी में 14 साल की नाबालिग लड़की सोनम की हत्या से समूचा देश शर्मसार है कि एक महिला मुख्यमंत्री के राज में महिलाओं पर इतना जुल्म क्यों? निघासन थाना क्षेत्र की रहने वाली बदनसीब लड़की सोनम एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसके परिवार वाले मवेशी पालने और मजदूरी का काम करते हैं। सोनम को जिस तरह मौत मिली उसकी वह कतई हकदार नहीं थी। कहते हैं मौत के बाद कब्र सुकून की जगह होती है, लेकिन सोनम को कब्र में भी अपनी मौत का सुबूत देना पड़ रहा है कि उसकी हत्या से पहले उसके साथ बलात्कार हुआ अथवा नहीं। पोस्टमार्टम के लिए कब्र खोदकर उसकी लाश निकाली गई ताकि मौत से पहले उसके साथ क्या हुआ इसका पता चल सके। हालांकि सोनम की दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं? दोबारा पोस्टमार्टम में ये बात सामने आई कि लड़की की गला दबाकर हत्या की गई थी, लेकिन उसके साथ बलात्कार नहीं किया गया। इस रिपोर्ट पर लोगों को एतबार नहीं है। आखिर 14 साल की नाबालिग लड़की से किसी की क्या रंजिश हो सकती है? दरअसल, सोनम की मौत के पीछे जरूर कोई बड़ी वजह है जिसका खुलासा जरूरी है। सोनम की मां तरन्नुम मीडिया के सामने चीख-चीखकर कहा कि उसकी बेटी के साथ पुलिसवालों ने दुष्कर्म किया है। उसके बदन पर जख्मों के निशान उसके साथ हुई ज्यादती की कहानी खुद-ब-खुद बयां कर रहे थे। उस अभागन मां ने तो यहां तक कहा कि प्रशासन चाहे तो तीसरी दफा भी सोनम की लाश कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम करे, लेकिन उसे सही इंसाफ दे। सवाल यह है कि चंद रुपये की लालच में सरकारी डॉक्टर पुलिस वालों के हाथों अपने ईमान का सौदा कर गलत रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं तो इसकी क्या गारंटी है कि दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट सही ही हो। दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन ने जनता का यकीन खो दिया है। अक्सर कई मामलों में गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फर्जी मुकदमे की बात लोग सुना करते थे, लेकिन निघासन की घटना के बाद यह साबित हो चुका है कि अपनी गर्दन और साख बचाने की खातिर सरकार और प्रशासन किसी भी हद तक नीचे गिर सकती है। वैसे मुख्यमंत्री मायावती ने सीबीसीआइडी को मामले की गुत्थी सुलझाने का जिम्मा सौंपा है, लेकिन अभी तक उन्हें इस मामले में कोई अहम सुराग नहीं मिले हैं। लिहाजा पीडि़त परिवार वालों के पास सिवाय आंसू के कुछ नहीं, क्योंकि उनकी बिटिया भी गई और उनकी प्रतिष्ठा भी। इतना ही नहीं सोनम की मौत के बाद निघासन पुलिस थाने में तैनात पुलिसकर्मियों ने सोनम की मां को पांच लाख रुपये लेकर इस मामले में शांत रहने की धमकी दी। मना करने पर पुलिस ने उसके पूरे परिवार को रात भर थाने में बिठाए रखा। उन्हें किसी से मिलने की इजाजत नहीं दी गई। राज्य में पुलिस से लेकर राजनेता तक संगीन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। जिस तरह हत्या- बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि बहुजन समाज पार्टी अपने पूर्ववर्ती सरकारों से भी आगे निकल चुकी है। इसे दुर्भाग्य ही कहें कि ज्यादातर मामले बसपा के मंत्री और विधायकों के खिलाफ आ रहे हैं। जिस उम्मीद के साथ उत्तर प्रदेश की जनता ने मायावती को प्रचंड बहुमत के साथ लखनऊ की कमान सौंपी थी फिलहाल उस पर मायावती कहीं भी खरी उतरती नहीं दिख रही हैं। बसपा के ये दागी मंत्री और विधायक उनकी पार्टी की पतनगाथा लिख रहे हैं। क्या कभी डॉ. अंबेडकर और कांशीराम ने यह सपना देखा था कि उनके राज्य में महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों के ऊपर इतने जुल्म ढाए जाएंगे? यदि बसपा अभी भी नहीं चेती तो 2012 के विधान सभा चुनाव में उसकी दुर्गति होनी तय है। मायावती से यूपी की जनता ने काफी उम्मीदें पाल रखी थीं, लेकिन उनकी आशाएं मौजूदा सरकार ने धूमिल कर दी है। मायावती सरकार के कई मंत्री और विधायक हत्या, अपहरण और बलात्कार के आरोपों में घिरे हैं। सरकार इन्हें सजा देने से ज्यादा उनके बचाव का रास्ता तलाश रही है। वहीं दूसरी तरफ जनता के रक्षक कहलाने वाले पुलिस लाइसेंसी गुंडे की तरह लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही है। इन सबके बावजूद भी मायावती सरकार उत्तर प्रदेश में कानून के राज होने का दंभ भर रही हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश हत्या, अपहरण और बलात्कार का केंद्र बन चुका है। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी उत्तर प्रदेश की स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर की है। हालांकि मायावती खुद को दलितों का रहबर बताती हैं, लेकिन उनके चार साल के शासन में दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ कितनी ज्यादतियां हुई संभवत: इसकी फेहरिस्त सूबे की मुखिया मायावती की सोच से कहीं ज्यादा लंबी है। उनकी कार्यशैली और उनके अंदाज से कतई नहीं लगता कि वे समाज के सबसे निचले तबके के लोगों की रहनुमाई करती हैं। भारत जैसे देश में चौराहे पर महानायकों की प्रतिमा स्थापित करने की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन मुख्यमंत्री मायावती शायद देश की ऐसी पहली राजनेता हैं जिन्होंने अपनी मूर्ति जीवित रहते हुए लगवाई है। ऐसा तो राजतंत्र के जमाने में राजा-महाराजाओं की होती थी। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ये कतई स्वीकार्य नहीं है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री मायावती जब कभी प्रेसवार्ता का आयोजन भी पंचसितारा होटल में करती है, जो उनके सामंती अंदाज को ही बताता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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