कुछ दिनों पहले आए एकनिर्णय में दिल्ली की सेशन कोर्ट की अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लॉ ने एक फैसले के माध्यम से सरकार का ध्यान एक बार फिर देश में कैदी सुधार व्यवस्था की ओर खींचा है। उन्होंने सरकार से जेलों की भीड़ कम करने और हिंसक प्रवृत्ति नहीं दिखाने वाले कैदियों के प्रति नरम रुख अख्तियार करते हुए कैदी सुधार व्यवस्था पर गौर करने का आग्रह किया है। दरअसल एडशिनल सेशन जज कामिनी लॉ ने 2006 में दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में पड़ोसी को चोट पहुंचाने के आरोप में चार युवाओं को दोषी ठहराने वाले एक फैसले में यह सुझाव दिया है। फैसले में यह भी कहा है कि मुझे लगता है कि खुली जेलों का मुद्दा सरकार के एजेंडे में उच्च वरीयता पर होगा। दिल्ली सरकार उपलब्ध विकल्पों पर विचार कर सकती है। एडशिनल जज कामिनी लॉ अपने फैसलों के जरिए सरकार को नए-नए सुझाव अक्सर देती रहती हैं। पिछले महीने उन्होंने नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करने वालों के बधियाकरण की सजा देने की राय अभिव्यक्त करके इस मुद्दे को बहस में ला दिया था और अब उन्होंने कैदी सुधार व्यवस्था का मुद्दा उठाया है। उनकी राय है कि अदालत के फैसले व कैदी के जेल आचरण को देखते हुए यदि उस कैदी को खुली जेल में भेजने वाली परिस्थितियां बनती हैं तो उसे खुली जेल में भेज देना चाहिए। इसकी व्यवस्था करना राज्य सरकार का काम है, लेकिन दिल्ली में ऐसी कोई खुली जेल नहीं है तो दिल्ली सरकार को इस मुद्दे को उच्च वरीयता देनी चाहिए। कैदी सुधार व्यवस्था की पैरवीकारों का मानना है कि यदि अपराधी का दोष साबित हो चुका है तो उसकी दुनिया वहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। कैदियों को भी आम नागरिकों की तरह रोज 10 से 5 बजे तक ऑफिस जाने, परिवार के साथ समय बिताने, सालाना छुट्टियां लेने की छूट मिलनी चाहिए। फिर उसे वापस जेल आकर सजा काटनी चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में ऐसी सलाह देते हुए सरकार के सामने हिमाचल प्रदेश की बिलासपुर खुली जेल का उदाहरण रखा है। 1960 में शुरु हुई इस पहली खुली जेल में कैदियों को 9 बजे से 5 बजे तक नौकरी व कारोबार करने की इजाजत मिली हुई है। सुबह 7.15 बजे कैदी जेल छोड़कर शहर में अपने अपने काम पर निकल जाते हैं। कोई कपड़ा तो कोई परचून का सामान बेचने निकल पड़ता है। कई र्क्लक का काम भी करते हैं। अगर काम पर से लौटने में देरी हो जाती है तो आठ बजे तक आने की छूट है। इन कैदियों को साप्ताहिक अवकाश के अलावा साल में 42 दिन का अवकाश भी मिलता है। इस जेल में 78 कैदी हैं और सभी हत्या के जुर्म में सजा काट रहे हैं। इस खुली जेल का रिकॉर्ड रहा है कि यहां से कोई भी कैदी अब तक फरार नहीं हुआ है और न ही अपराध की दुनिया में फिर से लौटा है। इस खुली जेल में बलात्कारियों, जेबकतरों के लिए कोई जगह नहीं हैं। यहां वही कैदी आ सकते हैं, जिनके भागने का खतरा बहुत कम हो और जो हिंसक प्रवृत्ति वाले नही हों। दरअसल, अपराधियों को सुधारने और उनके पुनर्वास के सवाल पर हमेशा विवाद रहा है। सजा से संबंधित प्रचलित दो प्रमुख सिंद्धांतों में से एक के अनुसार सजा का काम अपराधी को डराना है तो दूसरे सिद्धांत का मानना है कि सजा का मकसद अपराधी को पश्चाताप कराना व सुधारना है। ऐसे व्यक्ति के भीतर ऐसे विचार पैदा करना है ताकि समाज व कानून की नजर में दोषी व्यक्ति सजा के दौरान ही खुद को एक बेहतर इंसान बनाए। उसे एक ऐसा माहौल प्रदान करना है कि वह कैदी होते हुए भी बाहरी समाज से जुड़ा रहे और रिहा होने के बाद उसका सामाजिक पुनर्वास भी सहज ढ़ग से हो सके। विदेशों में खासतौर पर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में अपराधियों को सुधारने व उनके पुनर्वास के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। विदेशों में समाज विज्ञानी अपराधियों के सामाजिक माहौल और उनके मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर शोध करते हैं, जिससे अपराध के कारणों की तह में जाने का मौका मिलता है। इस तरह अपराधी स्वभाव के लोगों की रोकथाम की योजना भी बनाई जाती है। अर्थात दोषी को जेल में डालने मात्र से अपराध कम हो जाता है, यह नजरिया बदलने की जरूरत है। जाहिर तौर पर कानून की नजर में अपराधी ने जो अपराध किया है, उसकी सजा का वह हकदार है पर जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती। सजा के दौरान व सजा के बाद उन्हें जो नई जिंदगी शुरू करनी है, उसे किस तरह बेहतर बनाया जाए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। अपने देश में जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी हैं और इस कारण कई जेलों में तो कैदियों के सोने के लिए शिफ्ट वाली व्यवस्था का बंदोबस्त किया गया है। देश में जेल सुधार संबधित जो प्रयोग किए गए उनमें से एक खुली जेल वाला प्रयोग भी है। इस समय देशभर में 32 खुली जेलें हैं। इन जेलों की अवधारणा के पीछे मुख्य उद्देश्य कैदियों के साथ सम्मान से पेश आना और उन्हें अपनी जिम्मेवारियों का अहसास कराना है। इस अवधि में अपना काम खुद करना, काम करके रोजी कमाना, दूसरे कैदियों व जेल कर्मचारियों के साथ सहयोग करना आदि भी सिखाया जाता है। जेलों के बाहर कोई चार दीवारी नहीं होती और न ही बाहर कोई चौकीदार बंदूक लिए चौकीदारी करता है। यहां कैदियों को पर्याप्त आजादी दी जाती है और उन पर भरोसा भी किया जाता है। इन जेलों में अक्सर बंद जेलों से वही कैदी भेजे जाते हैं, जिन्होंने गुस्से में आकर हत्या जैसे संगीन अपराध को अंजाम दिया हो और अदालत ने यह बात अपने फैसले में कही हो। इसके अलावा जेल में वे किसी हिंसक गतिविधि में शमिल न रहे हों और उनकी सजा की आधी अवधि शेष रह गई हो। ऐसे कैदियों को इन खुली जेलों में भेजने का एक ठोस आधार यह होता है कि सख्त सजा के भय के कारण हत्यारों की उस अपराध को करने की संभावना बहुत कम होती है। देश में सिर्फ महिला कैदियों के लिए पहली खुली जेल बीते साल महाराष्ट्र में पुणे के नजदीक यरवदा जेल परिसर में खोली गई है। अगर महिला कैदी खुली जेल के नियमों का सम्मान करती हैं तो उनकी सजा कम करने का भी प्रावधान रखा गया है। खुली जेल का प्रयोग शत-प्रतिशत सफल रहा हो ऐसा भी नहीं है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है इस प्रयोग के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, जिसमें एक तरफ कैदी के परिवार से लगातार संपर्क में रहने से समुदाय भी परिवार को कैदी को सुधारने की इजाजत देता है तो दूसरी तरफ परिवार के जुड़ने से कैदी को भी समुदाय के साथ उसके अपराध संबंधित घावों को धीरे-धीरे भरने का मौका मिल जाता है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, June 29, 2011
खुली जेल की वकालत क्यों
कुछ दिनों पहले आए एकनिर्णय में दिल्ली की सेशन कोर्ट की अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लॉ ने एक फैसले के माध्यम से सरकार का ध्यान एक बार फिर देश में कैदी सुधार व्यवस्था की ओर खींचा है। उन्होंने सरकार से जेलों की भीड़ कम करने और हिंसक प्रवृत्ति नहीं दिखाने वाले कैदियों के प्रति नरम रुख अख्तियार करते हुए कैदी सुधार व्यवस्था पर गौर करने का आग्रह किया है। दरअसल एडशिनल सेशन जज कामिनी लॉ ने 2006 में दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में पड़ोसी को चोट पहुंचाने के आरोप में चार युवाओं को दोषी ठहराने वाले एक फैसले में यह सुझाव दिया है। फैसले में यह भी कहा है कि मुझे लगता है कि खुली जेलों का मुद्दा सरकार के एजेंडे में उच्च वरीयता पर होगा। दिल्ली सरकार उपलब्ध विकल्पों पर विचार कर सकती है। एडशिनल जज कामिनी लॉ अपने फैसलों के जरिए सरकार को नए-नए सुझाव अक्सर देती रहती हैं। पिछले महीने उन्होंने नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करने वालों के बधियाकरण की सजा देने की राय अभिव्यक्त करके इस मुद्दे को बहस में ला दिया था और अब उन्होंने कैदी सुधार व्यवस्था का मुद्दा उठाया है। उनकी राय है कि अदालत के फैसले व कैदी के जेल आचरण को देखते हुए यदि उस कैदी को खुली जेल में भेजने वाली परिस्थितियां बनती हैं तो उसे खुली जेल में भेज देना चाहिए। इसकी व्यवस्था करना राज्य सरकार का काम है, लेकिन दिल्ली में ऐसी कोई खुली जेल नहीं है तो दिल्ली सरकार को इस मुद्दे को उच्च वरीयता देनी चाहिए। कैदी सुधार व्यवस्था की पैरवीकारों का मानना है कि यदि अपराधी का दोष साबित हो चुका है तो उसकी दुनिया वहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। कैदियों को भी आम नागरिकों की तरह रोज 10 से 5 बजे तक ऑफिस जाने, परिवार के साथ समय बिताने, सालाना छुट्टियां लेने की छूट मिलनी चाहिए। फिर उसे वापस जेल आकर सजा काटनी चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में ऐसी सलाह देते हुए सरकार के सामने हिमाचल प्रदेश की बिलासपुर खुली जेल का उदाहरण रखा है। 1960 में शुरु हुई इस पहली खुली जेल में कैदियों को 9 बजे से 5 बजे तक नौकरी व कारोबार करने की इजाजत मिली हुई है। सुबह 7.15 बजे कैदी जेल छोड़कर शहर में अपने अपने काम पर निकल जाते हैं। कोई कपड़ा तो कोई परचून का सामान बेचने निकल पड़ता है। कई र्क्लक का काम भी करते हैं। अगर काम पर से लौटने में देरी हो जाती है तो आठ बजे तक आने की छूट है। इन कैदियों को साप्ताहिक अवकाश के अलावा साल में 42 दिन का अवकाश भी मिलता है। इस जेल में 78 कैदी हैं और सभी हत्या के जुर्म में सजा काट रहे हैं। इस खुली जेल का रिकॉर्ड रहा है कि यहां से कोई भी कैदी अब तक फरार नहीं हुआ है और न ही अपराध की दुनिया में फिर से लौटा है। इस खुली जेल में बलात्कारियों, जेबकतरों के लिए कोई जगह नहीं हैं। यहां वही कैदी आ सकते हैं, जिनके भागने का खतरा बहुत कम हो और जो हिंसक प्रवृत्ति वाले नही हों। दरअसल, अपराधियों को सुधारने और उनके पुनर्वास के सवाल पर हमेशा विवाद रहा है। सजा से संबंधित प्रचलित दो प्रमुख सिंद्धांतों में से एक के अनुसार सजा का काम अपराधी को डराना है तो दूसरे सिद्धांत का मानना है कि सजा का मकसद अपराधी को पश्चाताप कराना व सुधारना है। ऐसे व्यक्ति के भीतर ऐसे विचार पैदा करना है ताकि समाज व कानून की नजर में दोषी व्यक्ति सजा के दौरान ही खुद को एक बेहतर इंसान बनाए। उसे एक ऐसा माहौल प्रदान करना है कि वह कैदी होते हुए भी बाहरी समाज से जुड़ा रहे और रिहा होने के बाद उसका सामाजिक पुनर्वास भी सहज ढ़ग से हो सके। विदेशों में खासतौर पर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में अपराधियों को सुधारने व उनके पुनर्वास के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। विदेशों में समाज विज्ञानी अपराधियों के सामाजिक माहौल और उनके मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर शोध करते हैं, जिससे अपराध के कारणों की तह में जाने का मौका मिलता है। इस तरह अपराधी स्वभाव के लोगों की रोकथाम की योजना भी बनाई जाती है। अर्थात दोषी को जेल में डालने मात्र से अपराध कम हो जाता है, यह नजरिया बदलने की जरूरत है। जाहिर तौर पर कानून की नजर में अपराधी ने जो अपराध किया है, उसकी सजा का वह हकदार है पर जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती। सजा के दौरान व सजा के बाद उन्हें जो नई जिंदगी शुरू करनी है, उसे किस तरह बेहतर बनाया जाए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। अपने देश में जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी हैं और इस कारण कई जेलों में तो कैदियों के सोने के लिए शिफ्ट वाली व्यवस्था का बंदोबस्त किया गया है। देश में जेल सुधार संबधित जो प्रयोग किए गए उनमें से एक खुली जेल वाला प्रयोग भी है। इस समय देशभर में 32 खुली जेलें हैं। इन जेलों की अवधारणा के पीछे मुख्य उद्देश्य कैदियों के साथ सम्मान से पेश आना और उन्हें अपनी जिम्मेवारियों का अहसास कराना है। इस अवधि में अपना काम खुद करना, काम करके रोजी कमाना, दूसरे कैदियों व जेल कर्मचारियों के साथ सहयोग करना आदि भी सिखाया जाता है। जेलों के बाहर कोई चार दीवारी नहीं होती और न ही बाहर कोई चौकीदार बंदूक लिए चौकीदारी करता है। यहां कैदियों को पर्याप्त आजादी दी जाती है और उन पर भरोसा भी किया जाता है। इन जेलों में अक्सर बंद जेलों से वही कैदी भेजे जाते हैं, जिन्होंने गुस्से में आकर हत्या जैसे संगीन अपराध को अंजाम दिया हो और अदालत ने यह बात अपने फैसले में कही हो। इसके अलावा जेल में वे किसी हिंसक गतिविधि में शमिल न रहे हों और उनकी सजा की आधी अवधि शेष रह गई हो। ऐसे कैदियों को इन खुली जेलों में भेजने का एक ठोस आधार यह होता है कि सख्त सजा के भय के कारण हत्यारों की उस अपराध को करने की संभावना बहुत कम होती है। देश में सिर्फ महिला कैदियों के लिए पहली खुली जेल बीते साल महाराष्ट्र में पुणे के नजदीक यरवदा जेल परिसर में खोली गई है। अगर महिला कैदी खुली जेल के नियमों का सम्मान करती हैं तो उनकी सजा कम करने का भी प्रावधान रखा गया है। खुली जेल का प्रयोग शत-प्रतिशत सफल रहा हो ऐसा भी नहीं है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है इस प्रयोग के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, जिसमें एक तरफ कैदी के परिवार से लगातार संपर्क में रहने से समुदाय भी परिवार को कैदी को सुधारने की इजाजत देता है तो दूसरी तरफ परिवार के जुड़ने से कैदी को भी समुदाय के साथ उसके अपराध संबंधित घावों को धीरे-धीरे भरने का मौका मिल जाता है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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