उत्तर प्रदेश में बलात्कार से जुड़े मुकदमों का फैसला अब सिर्फ छह माह में होगा। बलात्कार के आरोपी को तब तक जमानत न मिलेगी, जब तक वह खुद को निर्दोष साबित न कर दे। महिलाओं के शील भंग से जुड़े सभी अपराध गैर जमानती हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश में बलात्कार और महिलाओं से छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर राज्य सरकार ने मंगलवार को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की संबंधित धाराओं में संशोधन का फैसला किया है। इसका अध्यादेश भी मंगलवार को राज्यपाल को भेज दिया गया। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सीआरपीसी व आइपीसी में बदलाव के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे में राज्यपाल इसे राष्ट्रपति को संदर्भित कर देंगे। वहां से हरी झंड़ी मिलने के बाद यह नये प्रावधान राज्य में लागू हो जाएंगे। सीआरपीसी और आइपीसी की धाराओं में संशोधन के निर्णय की जानकारी मुख्यमंत्री मायावती ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में दी। उन्होंने कहा,कानून में इस संशोधन से महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले असमाजिक तत्वों के मन में डर पैदा होगा और अपराध घटेंगे। राज्य सरकार ने सीआरपीसी व आइपीसी में संशोधन का जो निर्णय किया है, उसके तहत सीआरपीसी की धारा 235 में उपधारा एक जोड़ी जा रही है, जिसमें यह प्रावधान किया जाएगा कि बलात्कार के सभी मुकदमे का फैसला छह माह के अंदर हो जाए। मुख्यमंत्री के अनुसार, महिलाओं के शील भंग के अपराध से संबंधित आइपीसी की धारा 354 में संशोधन करते हुए, शील भंग के सभी कृत्यों को गैर जमानती अपराध घोषित कर दिया गया है। इसी तरह बलात्कार के आरोपी की जमानत आसानी से न हो, इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 और 439 में संशोधन किया जा रहा हे। 27 जून को अफसरों के साथ बैठक मुख्यमंत्री ने बताया कि 27 जून को सभी जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान, मंडलायुक्त, आइजी एवं डीआइजी की लखनऊ में बैठक बुलाई है। अफसरों को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए एक माह तक अभियान चलाने का निर्देश दिया जाएगा। चरित्रहीन व्यक्तियों की सूची तैयार कर उन्हें सुधारने का प्रयास किया जायेगा, इसके बाद भी यदि ऐसे लोगों का व्यवहार नहीं बदला तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जायेगी।
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