Wednesday, June 29, 2011

उत्तर प्रदेश में अपराधों का सिलसिला


उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनावों को लेकर सरगर्मियां काफी पहले ही शुरू हो गई थीं मगर हाल ही में प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने हितों को देखना शुरू कर दिया है। माया सरकार मुलायम सरकार से भी खराब बताई जा रही है। कई मामलों में यह तुलना सही भी जान पड़ रही है। प्रदेश में जहां बीते एक हफ्ते में दुष्कर्म के एक दर्जन से अधिक मामले सामने आए हैं वहीं हत्या के मामले भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गए हैं। कानपुर में जहां एक युवती को होटल में बंधक बनाकर उससे ज्यादती की गई, वहीं फतेहपुर में एक युवती सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुई। सीतापुर में मदरसे से लौटती नाबालिग लड़की से दुष्कर्म हुआ तो एटा में कुछ लोगों ने घर में घुसकर महिला से दुष्कर्म किया तथा उसे जिंदा जला दिया। बागपत में सीआरपीएफ के एक जवान की 17 वर्षीय पुत्री ने बलात्कार के बाद आत्महत्या कर ली। अलीगढ में चोरी की रिपोर्ट लिखाने गई महिला के साथ पुलिसकर्मियों ने ही बलात्कार किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में हर एक दिन में चार महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ होता है, लेकिन वास्तविक आंकड़े इससे इतर कहानी कहते हैं। कई मामले तो पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते और जो पहुंचते हैं, वे लेन-देन या सामाजिक वर्जनाओं के कारण अधर में ही खत्म हो जाते हैं। महिलाएं राज्य में कहीं नहीं सुरक्षित हैं। इन अप्रत्याशित घटनाओं के लिए मायावती ने सफाई दी, लेकिन तीन को सही माना। उन्होंने मीडिया को भी भ्रामक जानकारियां देने से कोताही बरतने की नसीहत दे डाली। हैरानी की बात तो यह है कि राज्य के मुख्य सचिव की नजरों में ये घटनाएं मामूली हैं तो राज्य के विशेष एडीजी बृजलाल तथा सचिव सूचना प्रशांत द्विवेदी मीडिया को स्पष्टीकरण दे रहे हैं। राजनीति अपने चरम पर है और अस्मत लुटा चुकी महिलाएं अपने नसीब को कोस रही हैं। दुष्कर्म के अलावा दूसरे मामलों में भी प्रदेश में लगातार अपराध के आंकड़ों में इजाफा हुआ है। सरकार तथा अन्य दलों के नेता भी अपराधियों को संरक्षण देते रहे हैं जिससे पुलिस भी दबाव में है। जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में इन दिनों अराजकता का माहौल है। हाल ही में लखनऊ डबल मर्डर केस के मुख्य आरोपी डॉ. वाईएस सचान की जेल में ही मौत हो गई। सरकार जहां इस घटना को ख़ुदकुशी करार दे रही है तो उनके परिवार सहित विपक्षी पार्टियां इसे हत्या करार दे रही हैं। अब सच्चाई क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, मगर देखा जाए तो यहां होने वाले अधिकांश मामलों में राजनीति भी कम नहीं हो रही। भट्टा पारसौल में जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश पहले ही राजनीति का अखाड़ा बन चुका है और अब पूरा प्रदेश अपराध की मंडी में तब्दील होता जा रहा है। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का नारा लगाने वाली मायावती सभी घटनाओं के लिए पुलिस को तो जिम्मेदार ठहरा रही हैं मगर यह भूल रही हैं कि राज्य की कानून-व्यवस्था बरकरार रखना और पुलिस पर नियंत्रण उन्हीं की सरकार का काम है। कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एकदिवसीय कार्यकर्ता सम्मलेन को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रदेश की भाजपा सरकार तथा कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा तथा आवाहन किया कि उनकी पार्टी मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय पार्टियों का विकल्प बनने की ओर अग्रसर है। जरा सोचिए, जो मायावती अपनी पार्टी का जनाधार बढाने पर आमादा हैं, उन्ही के गृह प्रदेश में कानून-व्यवस्था का यह हाल है। काश मायावती पहले अपने प्रदेश की कानून-व्यवस्था को संभालतीं तब दूसरे प्रदेशों की सरकार को कुछ कहतीं। मगर राजनीति है ही ऐसा मंच जहां अपना घर तो हमेशा साफ दिखता है और दूसरे के घर में गंदगी के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता। एक समय आतंक और अराजकता का प्रतीक बन चुका बिहार आज नीतीश राज में प्रगति के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है। इसके उलट उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति चरमराई हुई है। महिलाएं घरों से बाहर निकलने में अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। सरकार के विधायक तथा मंत्री जनता के लिए बोझ बनते जा रहे हैं। उस पर भी सरकार की मुखिया का तुर्रा कि यह सब विपक्षी पार्टियों की चाल है। दरअसल यह सरकार की नाकामी की दास्तां बयां करता है। निस्संदेह प्रदेश की कानून-व्यवस्था के संवेदनशील मसले पर माया सरकार बुरी तरह फेल हुई है और हर ओर अपराधी बेखौफ होकर अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने में सफल हो रहे हैं। राजनीति और चुनाव दोनों अपनी जगह हैं, मगर लोगों की सुरक्षा से तो समझौता नहीं किया जा सकता। पर आम आदमी की चिंता किसे है। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। कोई बयानबाजी कर रहा है तो कोई पीडि़त पक्ष के सामने घडि़याली आंसू बहा रहा है। पर कोई भी प्रदेश की दुर्दशा तथा लचर कानून-व्यवस्था से पार पाने की राह नहीं सुझा रहा। हर बड़े मुद्दे पर दलितों के घरों में रात गुजारने वाले युवराज राहुल गांधी गायब हैं तो मायावती ने भी पीडि़त पक्षों के पास जाने की जहमत नहीं उठाई। उत्तर प्रदेश में विकास की अनंत संभावनाएं हैं, परंतु राजनीति के चक्र ने इस प्रदेश को बीमारू राज्यों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। कभी अलग बुंदेलखंड, रूहेलखंड, हरित प्रदेश इत्यादि की मांग होती है तो कभी विशेष आर्थिक पैकेज को लेकर राजनीति। प्रदेश की स्थिति किसी भी तरह से ठीक नहीं कहा जा सकता। मायावती को देवी अवतार धारण करने से फुर्सत नहीं है तो विपक्ष सहित अन्य दल इतने बिखरे हैं कि सरकार पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। वैसे अब एकाएक सभी विपक्षी दलों ने मायावती सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उमा भारती की भाजपा में वापसी और उत्तर प्रदेश प्रभार मिलना भी इसी ओर संकेत करते हैं। राहुल गांधी के प्रदेशव्यापी दौरों ने भी सरकार में हलचल तो मचा ही दी है। कभी प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर सत्ता पर काबिज हुई मायावती आज उसी मुद्दे पर चौतरफा घिरती जा रही हैं। अगर यही हाल रहा तो जनता जनार्दन का जीवन नरक समान हो जाएगा। वैसे प्रदेश की जनता में अब सरकार तथा कानून-व्यवस्था के प्रति गुस्सा पनप रहा है जो किसी भी दिन विस्फोटक रूप धारण कर सकता है। विधानसभा चुनाव होने में अभी समय है और यदि अपराधों का बढ़ना चुनावी रस्साकशी का परिणाम है तो आने वाले दिनों में प्रदेश की कानून-व्यवस्था को एक बड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगा। सूबे की मुख्यमंत्री मायावती को चाहिए कि वह राजनीति करने तथा स्वयं को देवी अवतार में पेश करने की बजाय प्रदेश में आम जनता पर हो रही ज्यादतियों और शोषण पर ध्यान दें। अन्यथा, जनता अब जब जाग रही है तो कहीं ऐसा न हो कि उन्हें अपनी सत्ता खोनी पड़े। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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