बीते दिनों एक बाल अधिकार संगठन ने दावा किया है कि देश में बाल श्रम से हर वर्ष 1.20 लाख करोड़ रुपये काला धन पैदा हो रहा है। बचपन बचाओ आंदोलन की कैपिटल करप्शन : चाइल्ड लेबर इन इंडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में छह करोड़ बाल श्रमिक है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बाल श्रम रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं। इस पर रोक लगाने के लिए तमाम बहस चलाए जा रहे हैं। बावजूद इसके देश के कोने-कोने में बालश्रम जारी है। पिछले कुछ वर्षो में सरकारी एजेंसियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से सैकड़ों बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया है। इसके बाद यह संस्थाएं अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती हैं बिना यह जाने कि वे कहां जाएंगे अथवा उनका जीविकोपार्जन कैसे होगा? दुनिया से बालश्रम खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बालश्रम संगठन और 144 देशों ने बच्चों के अधिकारों के लिए एक प्रोटोकॉल बनाया है। इसके तहत अनुमोदन करने वाले देशों को अपने यहां बच्चों की बिक्री, बाल वेश्यावृत्ति और बाल पोर्नोग्राफी पर पूरी तरह से रोक लगानी होगी और इन्हें अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाएगा। भारत ने अभी तक इस प्रोटोकॉल का अनुमोदन नहीं किया है। रिपोर्ट से एक नया पहलू सामने आया है और वह है बाल मजदूरी का कालेधन और भ्रष्टाचार का स्रोत होना। अध्ययन बताते हैं कि देश के सभी छह करोड़ बाल श्रमिकों पर प्रतिदिन 120 करोड़ रुपया मजदूरी के रूप में खर्च होता है, जबकि इतने ही वयस्कों को काम पर रखने के लिए लगभग 720 करोड़ रुपये देने होंगे। इस तरह बालश्रम के जरिए देश में प्रतिमाह 18 हजार करोड़ यानी सालाना करीब दो लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा काला धन पैदा किया जाता है। यह संभव नहीं है कि नियोक्ता इतनी बड़ी रकम स्वयं के हजम कर जाए। इसमें पुलिस प्रशासन से लेकर, नेताओं तक को पैसा जाता है, क्योंकि इनके बिना यह उद्योग ठप हो जाएगा। अकेले उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर-भदोही के कालीन उद्योग में लगभग एक लाख बच्चे कार्य करते हैं जबकि फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग में भी हजारों बालश्रमिक झुलसने के लिए विवश हैं। बाल अधिकारों से जुड़ी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने अपनी रिपोर्ट में भारत में दुनियाभर में सर्वाधिक बालश्रमिकों के होने का हवाला देते हुए बालश्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 को अधिक कठोर बनाने की अपील की है। हालांकि केंद्र सरकार ने 2006 में कानून पारित कर 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को घरेलू बाल श्रमिकों के रूप में कार्य लेने पर रोक लगा दी है जिसका कोई प्रभाव शायद ही पड़ा है। निर्धनता, जागरूकता की कमी, अशिक्षा और परिवारों का बड़ा आकार कुछ ऐसे कारण हैं जो बालश्रम उन्मूलन के रास्ते में बाधा हैं। आमतौर पर बालश्रमिकों को कार्य करने के लिए अपने अभिभावकों की सहमति प्राप्त होती है या शायद इससे भी कहीं ज्यादा ये बच्चे अपने अभिभावकों को आर्थिक संबल देने के लिए अपने जीवन की बलि दे रहे हैं। सच यही है कि बाल श्रमिकों की विवशताएं इतनी गहरी हैं कि उनके लिए अपनी आजीविका को ठुकराना तब तक मुश्किल है जब तक उनके साथ-साथ उनके परिवार के सहयोग के लिए रास्ते न खोजे जाएं। नब्बे के दशक में अमेरिका ने जब नेपाल से कालीन के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था तो कालीन व्यवसाय से जुड़े सैकड़ों बच्चे देह व्यापार जैसे घिनौने व्यवसाय से जुड़ गए और कुछ इसी तरह बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग में संलग्न बच्चों ने पत्थर तोड़ने जैसे जोखिम भरे कार्य शुरू कर दिए। साफ है कि सिर्फ बच्चों के कार्य पर रोक लगा देने से बच्चों की पीड़ा खत्म नहीं होने वाली। बालश्रम उन्मूलन के लिए एक बहुआयामी और दूरगामी दृष्टिकोण को अपनाए जाने की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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