Wednesday, May 25, 2011
काले कारोबार का दूसरा पहलू
उत्तरी कश्मीर के पट्टन इलाके से हाल ही में नशीली दवाओं की बड़ी खेप बरामद हुई है। इस सिलसिले में जो चार व्यक्ति पकड़े गए, उनमें से तीन पूर्व आतंकी हैं। इनसे हुए किसी और बड़े खुलासे का पता तो अभी नहीं चल सका है, लेकिन इतना जरूर मालूम हो गया है कि पहले आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े रह चुके कुछ लोग अब मुख्य धारा में शामिल होने के नाम पर युवाओं को नशे का शिकार बनाने की साजिश में जुट चुके हैं। यह इस नजरिये से तो गौर करने की बात है ही कि अपराध की दुनिया से अभी भी उनका साबका नहीं टूटा है, इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य इसके पीछे छुपा हुआ है। बहुत हद तक आशंका यह है कि वे अभी भी उन गिरोहों के लिए ही काम कर रहे हों, जिनके लिए पहले वे सीधे तौर पर देश का अमन-चैन छीनने का काम करते रहे हैं। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि नशीले पदार्थो की तस्करी से दुनिया भर के आतंकवादी गिरोहों का संबंध रहा है और अभी भी है। यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें बहुत कम मेहनत से बहुत ज्यादा धन मिल जाता है, बल्कि इसलिए भी कि इसके जरिये वे भोले-भाले युवकों को आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं और एक बार नशे का आदी हो जाने के बाद मनमाने काम करवाते हैं। कश्मीर के हालात को ध्यान में रखते हुए अगर इस नजरिये से इस स्थिति को देखें तो यह नशे के दूसरे मामलों की तरह सिर्फ नशीले पदार्थो के काले व्यापार तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि बड़ी संख्या में आतंकवादी गिरोहों का दारोमदार नशे के काले कारोबार पर ही टिका हुआ है। क्योकि इन्हें अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत होती है। जो वैध तरीके से इन्हें मिल ही नहीं सकता और अवैधानिक तरीकों से इसे हासिल करने के लिए इन्हें बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा अपने गिरोह में शामिल करने के लिए इन्हें रोज नए-नए युवकों की जरूरत होती है। सब्जबाग दिखाने के लिए भी जरूरी है कि पहले उन्हें कुछ धन मुहैया कराया जाए। साथ ही, ऐसे ही कई और काम गिरोह चलाने के लिए उन्हें करने होते हैं। इन सबके लिए उन्हें बड़ी धनराशि की जरूरत होती है। जाहिर है, वह किसी सही काम से आ ही नहीं सकता। अवैधानिक तरीके से बड़ी धनराशि हासिल करने का रास्ता नशे के कारोबार से होकर जाता है। इसलिए पूरे एशिया महाद्वीप में सक्ति्रय लगभग सभी आतंकवादी गिरोह आसानी से पैसा कमाने के लिए नशीले पदार्थो और नकली नोटों का काला धंधा ही करते हैं। कश्मीर तथा भारत के अन्य भागों में भी सक्ति्रय आतंकवादी गिरोह इस मामले में अपवाद नहीं हैं। न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि पूरे सीमावर्ती इलाके को नशा किस तरह अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। जम्मू-कश्मीर के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान तक के तमाम युवक इनकी चपेट में आ चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या में शिक्षित बेरोजगार शामिल हैं। रोजगारशुदा युवकों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। जो बेरोजगार हैं, उनकी स्थिति तो नशे के चलते बुरी है ही, रोजगारशुदा युवकों का भी पारिवारिक जीवन इसके चलते लगभग तबाह हो रहा है। अच्छी-खासी जिंदगी जीते युवक सिर्फ नशे के चलते हताशा के भंवर में फंस चुके हैं। जो बेरोजगार या कम आमदनी वाले व्यवसायों में हैं, उन्हें न चाहते हुए भी अपराधों की दुनिया की ओर कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे युवकों की शुरुआत चोरी-छिनैती जैसी घटनाओं से होती है, और बाद में ये सारी हदें पार करने लगते हैं। यह सब इन्हें इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि नशे की अपनी जरूरतें ये आसानी से पूरी नहीं कर सकते। ऐसी ही लतों के शिकार युवक आखिरकार राष्ट्रद्रोही गिरोहों के हत्थे भी चढ़ जाते हैं, जो उन्हें अपनी मर्जी के मुताबिक विध्वंसक गतिविधियों में इस्तेमाल करते हैं। ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें युवकों के गलत रास्ते पर जाने का पहला कारण नशा साबित हुआ है। इसके बावजूद पूरे देश में चोरी-छिपे नशीली दवाएं बिक रही हैं और जिन्हें उनकी जरूरत होती है वे किसी-न-किसी तरह हासिल भी कर रहे हैं। नशे की एक खुराक देने के लिए ये धंधेबाज अपने शिकार युवकों से अपने मन मुताबिक काम तो कराते ही हैं, उनसे मुंहमांगा दाम भी वसूलते हैं। जाहिर है, वे न सिर्फ हमारी अर्थ्व्यवस्था को खोखला बनाने पर तुले हुए हैं, बल्कि हमारी नई पीढ़ी को भी बर्बाद कर रहे हैं। जिन युवकों की प्रतिभा का सदुपयोग रचनात्मक कार्यो से देश की बेहतरी के लिए हो सकता है, उनका दुरुपयोग विध्वंसक गतिविधियों में करके वे देश की बर्बादी में कर रहे हैं। कश्मीर इस लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील है। एक तो वह सीमावर्ती राज्य है, दूसरे अलगाववादियों की सक्रियता अभी भी कुछ खास कम नहीं हुई है। अलबत्ता, सुरक्षाबलों और सरकार के सार्थक प्रयासों से उनके मंसूबों पर लगातार जिस पानी फिर रहा है, उससे वे हताशा की ओर बढ़ रहे हैं। यह हताशा उनके भीतर कुंठा पैदा कर रही है और कुंठा के तहत वे कुछ भी करने को आमादा हैं। यह बात अब पूरी तरह साफ हो चुकी है कि आम कश्मीरी न तो अलगाववाद को सही मानता है और न ही वह आतंक पसंद करता है। सच तो यह है कि अलगाववाद और आतंकवाद के चलते सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी जनता का ही हुआ है। अधिकतर कारोबार ठप हो गए हैं और अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। खेती-बागवानी का व्यवसाय भी आतंकवाद के ही कारण उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं दे पा रहा है। वे इससे बेतरह आजिज हैं और जल्द से जल्द छुटकारा चाहते हैं। इसके बावजूद इनकी विध्वंसक गतिविधियों में शामिल होना कई बार कश्मीरी युवाओं की मजबूरी होती है। बुजुर्गो की मानें तो अलगाववाद की उनकी बातों से कोई सहमत नहीं है। सभी कशमीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं और अमन-चैन की जिंदगी जीना चाहते हैं। यह पता लगाया जाना चाहिए कि इसके बावजूद वे उनकी गतिविधियों में किस मजबूरी में शामिल होते हैं? बहुत हद तक संभव है कि इसके मूल में एक बड़ी वजह यह नशा भी हो। इस मामले की तह तक जाना बहुत जरूरी हो गया है। इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि नशे के काले कारोबार को जितनी जल्दी हो सके पूरे देश में किसी तरह ठप करने का इंतजाम बनाया जाए। चूंकि इनका काला कारोबार पूरे देश में फैला हुआ है और हमारे देश में पुलिस के कार्य एवं अधिकार का दायरा अलग-अलग राज्यों तक सिमटा हुआ है, इसलिए इसे केवल राज्यों की पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। बेहतर यह होगा कि इसे उच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया जाए और इसके लिए एक अलग टास्क फोर्स बनाई जाए। इसके जिम्मे केवल नशे और इस कारोबार के विभिन्न पहलुओं पर काम करना ही हो। ताकि पूरे देश में फैले इनके नेटवर्क की ठीक से पड़ताल की जा सके और इनके काले कारोबार को पूरी तरह खत्म किया जा सके। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
Thursday, May 19, 2011
जेजे एक्ट को गैर जमानती बनाना होगा
मेरा विचार है कि बच्चों के खिलाफ उत्पीड़न की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए मां-बाप ही सबसे अधिक जिम्मेदार हैं क्योंकि बच्चों के सही लालन-पालन और उनके संरक्षण की पहली जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। हमारे पास ज्यादातर बच्चे मां- बाप की ज्यादतियों की वजह से ही भाग कर आते हैं। खुद मां- बाप ही बगैर यह सोचे उन्हें काम पर भेज देते हैं कि उनकी नजरों से दूर ये बच्चे आसानी से उत्पीड़न के शिकार बन जाएंगे। जो लोग बच्चों की खरीदिबक्री में संलिप्त हैं, जो मां-बाप को सुनहरे भविष्य का ख्वाब दिखाकर उनके बच्चे ले आते हैं हम केवल उन्हें ही दोषी नहीं मान सकते। आज दिल्ली जैसे महानगरों में उत्तर प्रदेश और बिहार से सबसे ज्यादा बच्चे आते हैं पर इसके लिए वहां की गरीबी ही एकमात्र कारण नहीं है। लोगों में जेजे एक्ट को लेकर जानकारी और जागरूकता का काफी अभाव है। इस वजह से बच्चों का व्यापार करने वाले लोग बड़े आराम से बच्चों का उत्पीड़न करते हैं और उन्हें पकड़े जाने का भय नहीं रहता। जिन राज्यों से आज बच्चे आते हैं या लाए जाते हैं। वास्तव में उन राज्यों में ही ऐसे उपाय किए जाने की जरूरत है ताकि बच्चों को वही रोका जा सके। राज्यों को अपने आधारभूत ढांचे का विकास करना होगा, रोजगार के पर्याप्त उपाय करने होंगे तभी ये हालात सुधरेंगे। इन राज्यों में बच्चों की समुचित शिक्षा का प्रबंध भी नहीं है। बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं तो उनके मुश्किल हालात में फंसने के खतरे काफी बढ़ जाते हैं।
कानूनन छूट का बेजा इस्तेमाल
बलात्कार जैसी हिंसा से बच्चों को सुरक्षा देने के लिए यों तो हमारे देश में कानून मौजूद हैं पर जब किसी बच्चे का बलात्कार होता है या परिवार का कोई सदस्य उसका शारीरिक शोषण करता है तो ऐसे मामलों में अक्सर बच्चों को डरा-धमका कर उनका बयान बदलवा देते हैं। सरकार को जेजे एक्ट के सेक्शन 23 (मां-बाप द्वारा उत्पीड़न के मामले में) को गैरजमानती बनाने की दिशा में भी ध्यान देना होगा क्योंकि इस छूट का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। मैं समझती हूं कि किसी भी देश की तरक्की का आकलन वहां की महिलाओं और बच्चे की सामाजिक स्थिति को देखकर करना चाहिए। यदि देश में महिलाएं और बच्चे रोजाना उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं तो यह कैसे माना जाए कि हमारा देश तरक्की कर रहा है? कानून के अनुसार बलात्कार या उत्पीड़न के शिकार बच्चों और लड़कियों को थानों में नहीं रखा जाना चाहिए पर इस कानून की रोज ही धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। हमने हाईकोर्ट तक में यह मामला उठाया पर स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। दिल्ली में मेरे हिसाब से बच्चों और महिलाओं के खिलाफ शोषण या हिंसा की घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं क्योंकि यहाँ बाल कल्याण समिति जैसी संस्थाएँ सक्रिय हैं पर बाहर कैसी स्थिति होगी हम इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। दिल्ली जैसे महानगर में हमारे पास लड़कियों के उत्पीड़न से सम्बंधित मामले आते ही रहते हैं।
राज्यों की भूमिका सही नहीं
यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्य आज भी अपनी भूमिका सही तरह से नहीं निभा रहा। बच्चों को उनके मूलभूत अधिकार तक नहीं मिल पाते। राज्य उनके अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रहा। आइसीपीएस (इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम) के तहत आज बच्चों के संरक्षण के लिए काफी पैसा आ रहा है पर सरकार न तो ठीक से योजना बना पा रही है और न ही यह पैसा खर्च कर पा रही है। यों दिखावे के लिए योजनाएं हैं भी पर उनका कोई फायदा होता दिखाई नहीं देता। जब तक परिवार, समाज और राज्य सभी अपनी भूमिका का मिलकर निर्वाह नहीं करेंगे, बच्चों को उनके अधिकार दिलाना सम्भव नहीं होगा। सरकार की योजनाएं दिल्ली जैसे स्थानों पर लागू की जा रही हैं पर और राज्यों में कुछ होता दिखाई नहीं देता। बच्चे जिन भयावह हालात से भाग कर आते हैं, उन्हें दोबारा उन्हीं हालात में वापस भेजने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। जरूरत है, यहीं पर उनके पुनर्वास, शिक्षा और विकास के समुचित प्रबंध किए जाएं। सुधार-गृहों में प्रशिक्षित काउन्सिलर्स से काउन्सिलिंग और उन्हें पूरे समय व्यस्त रखने की जरूरत है। सर्टिफिकेट कोर्सेस होने चाहिए जिनके अंतर्गत कारपेंटरी, मोबाइल रिपेयरिंग और खेलकूद जैसी चीजों के शिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। हाइकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस दिशा में कुछ काम हुआ है।
अवैध बाल सुधार गृह पर अंकुश लगे
उन चाइल्ड होम्स के हालात बेहतर हैं, जो हमारी निगरानी में रहते हैं। स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले होम की भी हर महीने जाँच की जाती है। नियम के अनुसार संस्थाओं को हर बच्चे को प्रत्येक तीन महीने पर सीडब्ल्यूसी के सामने पेश करना पड़ता है। महानगर में जो शेल्टर होम गैरकानूनी तरीके से चलाए जा रहे हैं वे बच्चों की खरीद- फरोख्त जैसे कायरें में लगे हो सकते हैं। यदि उनके पास वैध लाइसेंस नहीं हैं तो उन्हें बाल कल्याण समिति के समक्ष लाए जाने की जरूरत है ताकि हम बच्चों को उनसे बचा सकें। मेरा खयाल है कि बच्चों के पुनर्वास और उनके संरक्षण के लिए सरकार को पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चे देश का भविष्य होते हैं पर अगर हम उन्हें समुचित विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर पर्यावरण मुहैया कराने के लिए पर्याप्त बजट का प्रबंध नहीं करेंगे तो देश का भविष्य कैसा होगा? ज्यादातर आरोपित परिवार से ही होते हैं और उन्हें आसानी से बच्चों के उत्पीड़न के मामलों में जमानत मिल जाया करती है। (राजेश चन्द्र की बातचीत पर आधारित)
बच्चों के विरुद्ध अपराध में दिल्ली सवरेपरि वाराणसी में हुए सबसे कम अपराध
उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ से वाराणसी के बीच की पट्टी को मानव कबूतरबाजी, खासकर छोटी लड़कियों की अरब देशों में तस्करी के लिए भले ही सबसे घना जंगल कहा जाता हो लेकिन बच्चों के विरुद्ध अपराध के पुलिस में पंजीकृत संख्या के अनुसार देश की संस्कारधानी माने जाने वाले वाराणसी को बच्चों के लिए ‘अभयारण्य’
अथवा ‘स्वर्ग’ कहा जा सकता है। हाल के वर्षो में वहां इस श्रेणी के कमतर अपराध हुए हैं। वाराणसी में उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों के मुकाबले बच्चों के विरुद्ध कुल अपराधों में गिरावट भी आई है। अलबत्ता देश की राजधानी दिल्ली बच्चों के विरुद्ध अपराध में भी सवरेपरि है। प्रति लाख आबादी पर राष्ट्रीय औसत 02 प्रति लाख आबादी पर दिल्ली का औसत 16
बचपन के साथ भद्दा मजाक
पिछले महीने देश की राजधानी दिल्ली में एक दस वर्षीय बाल बंधुआ मजदूर मोईन की नृशंस हत्या ने तथाकथित सभ्य समाज के मुंह पर एक और करारा तमाचा जड़ा है। बिहार के मधुबनी जिले के लहरियागंज गांव से 8 से 10 साल के बीच की उम्र के चार बच्चों को एक दलाल समीमुल्लाह की मार्फत, अच्छी जिंदगी और पढ़ाई का लालच देकर दिल्ली लाया गया। लेकिन यहां उन्हें मदरसे के बजाय एक कारखाने में बंदी बनाने के काम में लगा दिया गया। उन बच्चों ने यह काम कभी देखा भी नहीं था, लिहाजा काम के दौरान उनसे गलतियां होना स्वाभाविक था। इस पर मालिक कलीमुल्लाह, बच्चों को बुरी तरह से पीटता था। गर्म लोहे से दाग देना, पंखे पर लटकाकर घुमा देना, दीवारों पर पटक-पटक कर मारना उसके सजा देने के तरीके थे। ऐसी ही सजा के दौरान एक दिन मासूम मोईन की मौत हो गयी।
मीडिया के दबाव में हुई गिरफ्तारी
आजादपुर कब्रिस्तान के बाहर मजदूरी करने वाले एक नौजवान रईस की नजर आनन-फानन में कब्र खोदकर गाड़ी जा रही एक बच्चे की लहू-लुहान लाश पर पड़ी। यह देखकर रईस को शक हुआ। लाश को लेकर आने वाले लोगों से जब उसने पूछताछ की तो पहले तो उन्होंने उसे धमकाने की कोशिश की बाद में खुद भाग खड़े हुए। रईस ने पुलिस और बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता रिजवान को फोन कर दिया। इसके बाद मामला तूल पकड़ता गया। मीडिया और सामाजिक संगठनों के दबाव में आकर आखिरकार पुलिस ने दलाल और मालिक को गिरफ्तार कर लिया। मोईन की मां हादसे के पांच दिनों बाद दिल्ली पहुंच सकी। तब तक बच्चे की लाश बिना पोस्टमार्टम के शवगृह में पड़ी रही। मोईन की मां नजमा, दादी और नानी की मौजूदगी में कुछ लोगों के साथ मैं और मेरी पत्नी ने उस मासूम के शव को कब्रिस्तान ले जाकर दफनाया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र तथा तेजी से अधिक विकास कर रहे देश के लिए एक गुलाम बाल मजदूर की हत्या को साधारण घटना नहीं माना जा सकता। फूल से कोमल बच्चे के जिस्म में लगा एक-एक घाव जैसे मेरी अंतरात्मा में कई चिरस्थायी घाव छोड़ गया। उसके जनाजे का बोझ जैसे सदियों से चले आ रहे शोषण और अन्याय के शिकार हुए लाखों, करोड़ों बच्चों के वजन की तरह अब भी मेरे कंधों को तोड़ रहा है। मोईन के जिस्म में लगी चोटें आतंकवादी हमले के कारण हमारी संसद पर लगी चोटों से कम नहीं। ऐसा लगा जैसे बच्चे की पीठ के नहीं, बल्कि हमारे संविधान के चिथड़े कर दिये गये हों। सर्वोच्च न्यायालय पर जैसे कोई कालिख पोत दी गयी हो या मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर व गुरुद्वारे भरभराकर अचानक ढह गये हों।
कहां है मानवीय संवेदना
मालिक द्वारा हत्या का शिकार मोईन कोई अकेला बच्चा नहीं है। मुझे इससे पहले भी कई बार उन बच्चियों एवं बच्चों की अर्थियां उठानी पड़ी हैं जिन्हें खूबसूरत सपने दिखाकर या मां-बाप को चंद रुपयों का लालच देकर, पहाड़ों, जंगलों में बसे दूर-दराज के गांवों से शहरों में लाया गया था। किंतु जंगली जानवरों के बीच बिना किसी खतरे के पली-पुसी उन आदिवासी बच्चियों की इज्जत-आबरू ही नहीं, शहरी जानवर तो उनका जिस्म तक निगल गये। कई बार बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर डाली गयी या फिर गुलामी में यौन शोषण की शिकार होकर वे खुदकुशी करने को विवश हो गयीं। एक ओर तो मज़हबों, संस्कृतियों, तीर्थो, धर्म-गुरुओं और धर्म-स्थलों के सबसे बड़े घर भारत में बच्चों को भगवान का रूप, खुदा का नूर या ईश्वर का सबसे खूबसूरत तोहफा कहा जाता है। किंतु दूसरी ओर शायद ही ऐसा कोई अपराध हो जो बच्चों के साथ न किया जाता हो। इनमें भी सबसे बड़ी शिकार लड़कियां होती हैं। हाल ही में प्रकाशित जनगणना की रिपोर्ट में लड़कियों की लगातार घट रही संख्या सबसे बड़ी चिंता का विषय है। स्पष्ट है कि बच्चियों के प्रति अपराध उनके जन्म लेने से पहले ही भूण हत्या के रूप में शुरू हो जाते हैं।
47 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार
इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी कि हमारे देश में पांच वर्ष तक की आयु के 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सरकार खुद मानती है कि दो तिहाई से अधिक बच्चों को किसी न किसी प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़ता है। एक अन्य सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक देश के 53 फीसद बच्चे किसी न किसी प्रकार के यौन अत्याचार के शिकार होते हैं। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 6 करोड़ और सरकारी हिसाब से लगभग सवा करोड़ बच्चे पूर्णकालिक बाल मजदूरी करते हैं। इनमें लगभग एक करोड़ बच्चे बंधुआ मजदूर बने हुए हैं। यूनीसेफ तथा दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का मानना है कि देश में फुटपाथी बच्चों की संख्या 1.8 करोड़ है। पिछले वर्ष हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन से यह चौकाने वाला तथ्य सामने आया कि 5 से 12 वर्ष के बीच के फुटपाथी बच्चों में 66.8 प्रतिशत शारीरिक हिंसा और 55 प्रतिशत बच्चे यौन उत्पीड़न झेलने को मजबूर होते हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार लगभग 47 फीसद नाबालिग लड़कियों की शादी करा दी जाती है। माफिया द्वारा 3 लाख से ज्यादा बच्चों को अपाहिज बनाकर उनसे जबरिया भीख मंगाने का धंधा कराया जा रहा है। अपराधी गिरोहों द्वारा हर साल देश भर से 60 हजार बच्चे गायब कर दिए जाते हैं। चूंकि ये बच्चे गरीबों के होते हैं अत: सरकार व पुलिस को इनकी कोई फिक्र नहीं। यूं तो ये सभी आंकड़े मात्र संख्याएं भर हैं, किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि हर एक संख्या के पीछे बुझा हुआ ही सही, एक चेहरा, एक धड़कता हुआ दिल और एक कुचली गई आत्मा है। कैसे लेंगे चैन की सांस बाल श्रम के अभिशाप को ही लें। 6 करोड़ बच्चों को सस्ते श्रम के लालच में अशिक्षा, बीमारियों व दासता की गहरी खाई में धकेलकर जो समाज समृद्धि और विकास के सपने संजो रहा है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में मानवीय गरिमा से वंचित रहकर पनपने वाले नागरिक समृद्धि के टापुओं पर बैठे लोगों को क्या कभी चैन की सांस लेने देंगे? ये बच्चे गरीब माता-पिता के बच्चे हैं, यह तय है। किंतु ये माता-पिता इसलिए गरीब हैं कि क्योंकि या तो वे बेरोजगार हैं या उन्हें साल भर में 50-60 दिन से ज्यादा रोजगार नहीं मिलता। उन्हें सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती। क्योंकि उनकी जगह उनके बच्चों को सस्ते या मुफ्त मजदूर की तरह काम पर लगा दिया जाता है। साथ ही बच्चे मालिकों के लिए किसी प्रकार की चुनौती भी नहीं होते। इसीलिए आज देश में साढ़े छ: करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं, जिनमें अधिकतर इन्हीं बच्चों के अभिभावक हैं।
47 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार
बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों के पीछे कुछ बुनियादी कारण जिम्मेदार हैं। पहला है, बचपन समर्थक और बाल अधिकार का सम्मान करने वाली मानसिकता की कमी। दूसरा, सामाजिक संवेदना और सरोकार का अभाव। तीसरा, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा ईमानदारी की कमी। चौथा, बच्चों के अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक संसाधन मुहैया कराने में कोताही। पांचवां, बच्चों की हिफाजत के लिए बने कानूनों के रखवालों की कोई भी जवाबदेही का न होना तथा छठा है, बच्चों के बारे में एक स्पष्ट नैतिकता का अभाव।
गरीब बच्चों के बारे में मानसिकता में खोट
गरीब बच्चों के मामले में हमारी मानसिकता दो प्रकार की है। यदि आप कथित तौर पर भले और संवेदनशील हैं, तो आप अभावग्रस्त बच्चों के ऊपर दया दिखाते या उन पर कोई उपकार करते हैं। परंतु दूसरी ओर ऐसे व्यावहारिक लोग हैं जो अपनी सम्पन्नता बढ़ाने, सुविधाएं हासिल करने और मौजमस्ती में यकीन रखते हैं। ऐसे लोग सस्ते मजदूरों के रूप में बच्चों के श्रम का शोषण, अपनी हवस मिटाने के लिए उनका यौन शोषण अथवा कुत्सित रौब-रुतबे के लिए बच्चों पर हिंसा का सहारा लेते हैं। हर बच्चा नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के साथ जन्मता है। किंतु उनके अधिकारों का सम्मान तथा पालना करते हुए बच्चों के प्रति संवेदनात्मक व मित्रतापूर्ण रिश्ता कितने लोग कायम कर पाते हैं?
बुद्धि-विलास का जरिया बना बाल अधिकार
आज बाल अधिकार तथाकथित ‘सिविल सोसायटी’ के बीच बुद्धि-विलास, र्चचा-परिर्चचा के विषय अथवा सरकारी महकमों की परियोजना भर बन कर रह गये हैं। बच्चों के प्रति हम कैसे सोचते हैं, उनके साथ कैसे मित्रता और इज्जत का व्यवहार करते हैं, उनका विकास, संरक्षण और सम्मान हमारी निजी, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में कैसे ढल जाता है, इस सब पर गहरे मंथन और अमल की जरूरत है। हमें बाल मित्र समाज की रचना के लिए बाल मित्र सोच और जीवनर्चया पर आधारित बाल मित्र संस्कृति निर्मित करनी होगी।
सफेद हाथी बने विभिन्न राष्ट्रीय आयोग
देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों की हिफाजत, देखभाल, विकास और शिक्षा की गारंटी देता है। बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, शिक्षा और बाल अधिकारों से सम्बंधित अनेक कानून बने हुए हैं। किंतु इन पर अमल करने की किसी की भी जवाबदेही नहीं है। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय व राज्य आयोग बनाए गए हैं। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि ढिंढोरा पीटने वाले राष्ट्रीय आयोग को पिछले साल भर में देश भर से बच्चों के उत्पीड़न की कुल 75 शिकायतें ही मिली। इनमें से दिल्ली से 13 और उप्र से 6 शिकायतें थीं। इनमें भी ज्यादातर शिकायतें स्कूली छात्रों के साथ हुई मारपीट की थीं। सफेद हाथी बने इन आयोगों से भला कौन पूछे कि इतने भारी भरकम बजट की कीमत पर इन्होंने कितने बच्चों को उत्पीड़न से बचाया? हमारी जानकारी में तो एक भी बच्चे को बंधुआ मजदूरी से छुटकारा दिलाकर पुनर्वासित करने की कोई घटना नहीं है। न ही बलात्कार, अपाहिज बनाकर जबरिया भीख मंगवाने, बाल वेश्यावृत्ति की किसी घटना पर उनका ध्यान जाता है, इंसाफ दिलाना तो दूर की बात है।
बनानी होगी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति
आज जरूरत है एक जबर्दस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की। प्रभावशाली कानून बनाकर उनके पालना की जवाबदेही सुनिश्चित करने की। साथ ही जरूरत है विभिन्न विभागों और मंत्रालयों के बीच तालमेल बनाकर बच्चों को केंद्र में रखकर चलने वाली नई विकास नीति, अर्थनीति और राजनीति की। बाल अधिकारों के प्रति सभी प्रचार माध्यमों, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया से जागरूकता फैलाने की। जरूरत है लाखों की भीड़ जुटाने वाले हमारे धर्मगुरुओं, संत-महात्माओं में बचपन के प्रति सम्मान और संवेदना की और जरूरत है हम और आप जैसे लोगों में एक बुनियादी नैतिकता की। लेखक बाल श्रम विरोधी आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
एक नहीं, उठाने होंगे कई कदम
दुखद यह है कि तमाम आधुनिकताओं और विकास की ओर बढ़ रहे अपने देश में बाल अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। भारतीय समाज में बच्चों के शोषण के मामले ज्यादातर दबा दिए जाते हैं। घर-परिवार के लोग इसकी शिकायत भी नहीं करते। कई बार पीड़ित मासूम भी चुपचाप रह जाता है। बाल अपराध को अपने समाज में गम्भीरता से नहीं लिया जाता। इसको लेकर एक टैबू समाज में बना हुआ है। इस अपराध की रोकथाम की दिशा में ‘प्रयास’ ने उल्लेखनीय काम किया है। 2007 में बाल अपराध के तमाम पहलुओं को समझने के लिए मेरे ही नेतृत्व में एक विस्तृत स्टडी रिपोर्ट तैयार हुई थी। इस मामले की पड़ताल के लिए हम देश के 13 राज्यों में गए। इन राज्यों में 12,500 बच्चों से सवाल जवाब किए। माता-पिता, शिक्षक और पास पड़ोस के 6,000 लोगों को अलग से शामिल किया। हमने 18,500 लोगों से बात की। बाल अपराध पर यह दुनिया की सबसे विस्तृत रिपोर्ट है। यही रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल वायलेंस एगेंस्ट चिल्ड्रेन चार्टर में शामिल हुई। उसमें दूसरे नम्बर पर चीन की रिपोर्ट थी, जिसमें 5000 बच्चों से बातचीत की गई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में बाल अपराध को ज्यादा गम्भीरता से नहीं लिया जाता है लेकिन हम लोगों ने ज्यादा बच्चों तक पहुंच कर वास्तविकता का पता लगाने का काम किया। हम जब इन बच्चों की सूची बना रहे थे तो उसमें हर तबके का ख्याल रखा। इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी बच्चे कहीं भी सुरक्षित नहीं थे। तीन चौथाई बच्चे किसी न किसी तरह के शोषण के शिकार थे। शोषण के बहुतेरे रूप बच्चों का शोषण भी कई प्रकार से होता है। सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली बात यौन शोषण से जुड़ी है। और तो और घर परिवारों में बच्चों को नजरअंदाज किया जाना भी एक तरह का बाल शोषण ही है। भारत वर्ष में अमूमन 75 फीसद बच्चे इनमें से किसी न किसी तौर पर शोषित हो जाते हैं। इसमें भी शर्मसार करने वाली बात यह है कि अधिकतर मामलों देखा जाता है कि बच्चों का शोषण ज्यादातर मामले में घर-परिवार के सदस्य या फिर परिचित ही करते हैं। इसकी वजह से ही बड़े परिवारों में तो मामला कारपेट के अंदर दबा दिया जाता है जबकि मिडल क्लास भी इसकी शिकायत नहीं करना चाहते। ऐसे में ढेरों मामले ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं लिखाई जाती है।
शोषण के बहुतेरे रूप
बच्चों का शोषण भी कई प्रकार से होता है। सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली बात यौन शोषण से जुड़ी है। और तो और घर परिवारों में बच्चों को नजरअंदाज किया जाना भी एक तरह का बाल शोषण ही है। भारत वर्ष में अमूमन 75 फीसद बच्चे इनमें से किसी न किसी तौर पर शोषित हो जाते हैं। इसमें भी शर्मसार करने वाली बात यह है कि अधिकतर मामलों देखा जाता है कि बच्चों का शोषण ज्यादातर मामले में घर-परिवार के सदस्य या फिर परिचित ही करते हैं। इसकी वजह से ही बड़े परिवारों में तो मामला कारपेट के अंदर दबा दिया जाता है जबकि मिडल क्लास भी इसकी शिकायत नहीं करना चाहते। ऐसे में ढेरों मामले ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं लिखाई जाती है।
विधेयक संसद में लम्बित
इस तरह के शोषण करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, इसका भरोसा दिलाने वाला लीगल सिस्टम भी नहीं है। हमारी इस रिपोर्ट के आधार पर ही बच्चों के यौन शोषण सम्बन्धित कानून संसद में प्रस्तावित है, जिसके लागू होने पर बाल यौन शोषण पर रोकथाम लगाने में मदद मिलेगी। यह बात सही है कि जागरूकता के अभाव में बच्चों का शोषण होता है। कई बार यह लापरवाही में भी हो जाता है लेकिन शोषण केवल शिक्षा और जागरूकता के अभाव की वजह से होता है, तर्कसंगत नहीं है। पश्चिमी समाज तो भारत से कहीं ज्यादा शिक्षित और जागरूक है फिर भी बच्चों के शोषण के वीभत्स रूप मिलते हैं।
विक्षिप्त मानसिकता दोषी
दरअसल, बच्चों का शोषण करने वाले लोग खास तरह की मनोवृत्ति वाले लोग हैं। आप उन्हें विक्षिप्त कह सकते हैं। दूसरे देशों में ऐसे लोगों की पहचान कर उन पर नजर रखने की कोशिश होती है। हमारे यहां अब तक ऐसी कोई कोशिश नहीं हुई है, जिसमें बच्चों का शोषण करने वाले लोगों का डाटा बेस तैयार हो सके। ‘प्रयास’ इस पहलू पर काम कर रहा है। हमारी कोशिश नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो की तरह ही बाल अपराध के मामलों का एक डाटा बेस बनाने की है। सबको शिक्षा देने के अधिकार को लागू किए जाने के बाद भी करीब 10 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं। करीब 3.5 करोड़ बच्चों का कोई घर बार नहीं है, वे सड़कों पर जीवन गुजारने को मोहताज हैं और इनमें तमाम तरह की कोशिशों के चलते महज 36000 बच्चों के लिए छत मुहैया हो सकी है। भारत की सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति कुछ इस तरह की बच्चों का टारगेट करना बेहद आसान है। यही वजह है कि भारत में चाइल्ड सेक्स को टूरिज्म से जोड़ दिया गया है। देश में हर साल 4 लाख बच्चे व्यावसायिक सेक्स कारोबार का हिस्सा बन जाते हैं, जिनका शोषण विदेशी पर्यटकों द्वारा किया जाता है। ऐसे कई ठिकाने उभरे हैं, जहां बच्चों के यौन शोषण का खेल संगठित कारोबार का रूप ले चुका है। इन मामलों में एक बार गिरफ्तार लोगों पर हमेशा नजर रखने की जरूरत है। बाल अपराध के अलावा हाल के दिनों में बच्चों के भी विभिन्न अपराधों में संलिप्ता बढ़ी है। लेकिन यह पहलू अभी चिंताजनक नहीं है। बच्चों द्वारा होने वाले अपराध बहुत कम हैं। देश की आबादी का 42 फीसद हिस्सा बच्चों का है, जिनकी उम्र 18 साल से कम है। यह आबादी कुल अपराध का महज 2 फीसद हिस्सों में शामिल है। लेकिन इस पहलू में एक चिंता की बात यह है कि हाल के दिनों में बच्चों की अपराध में संलिप्ता बढ़ी है। बच्चे कहीं ज्यादा गंभीर अपराध भी करने लगे हैं। यह भी देखा गया है कि उनका इस्तेमाल संगठित तौर पर किया जा रहा है। वे सोची- समझी साजिश के तहत आपराधिक कायरे को अंजाम दे रहे हैं।
बाल-वयस्क अपराध समान नहीं
पुलिस व्यवस्था में कई लोग हैं जिनका मानना है कि 15 साल से अधिक उम्र के बच्चे अगर अपराध में शामिल हैं तो उसके लिए भी वही कानून होना चाहिए जो 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए है। लेकिन यह सोच सही नहीं है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की मान्यताओं के मुताबिक भी 18 साल तक की उम्र बच्चों की होती है, उन्हें बड़ा नहीं माना जा सकता है। हां, यह हो सकता है कि पुलिस व्यवस्था, गैर सरकारी संगठन और समाज को मिलकर ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां न तो बच्चों पर अपराध होना चाहिए और न ही वे अपराध में संलिप्त हों। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बाल अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए देश भर में विशेष बाल न्यायालय बनाए जाएं। देश भर में करीब 700 जिले हैं तो इतने ही बाल न्यायालय होने चाहिए। भारत में कुल मिलाकर 16 हजार थाने हैं। हर थाने में बाल विकास अधिकारी की नियुक्ति की जरूरत है। दरअसल, हमें यह समझना होगा कि बच्चों के दिमाग पर किसी शोषण का असर लम्बे समय तक कायम रहता है और उनका विकास थम जाता है। जब हम इस नासूर को गम्भीरता से समझेंगे तभी इसकी रोकथाम के लिए सार्थक कदम उठाए जाएंगे।
दूसरों के विकास में बचपन झों कते बच्चे
जब हम बचपन बचाने की बात करते हैं तो निश्चित ही हमारा इशारा उन बच्चों की तरफ होता है जिनका बचपन छीना जा रहा है। जिनका वर्तमान, भविष्य, स्वास्थ्य, विकास की सम्भावनाएं आशाएं, इच्छाएं और सपने सभी चौपट किया जा रहा है, वह भी सिर्फ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की खातिर। देश में रोज-रोज तमाम तरह के घोटालों की र्चचा हो रही है। बड़े-बड़े रसूखदार लोग इन घोटालों में लिप्त होने के कारण कठघरे में हैं, और होने भी चाहिए। लेकिन ऐसे घोटाले जिन पर प्राय: किसी की नजर नहीं जाती वह है बच्चों की रोज की कमाई से इकट्ठा किया गया अरबों रुपयों का काला धन जो ऐसे ही मालिकों की जेब में जा रहा है। देश के किसी भी कोने में चले जाइए, आपको बाल श्रम के दर्शन बड़े आराम से हो जाएंगे। चाहे वह चाय ढाबा हो, जरी के कारखाने और आतिशबाजी बनाने की फैक्ट्री हो, या फिर अन्य कोई छोटी-मोटी यूनिट। सुबह पांच-छ: बजे से रात 12-1 बजे तक कोई छोटू अपना बचपन बेचता हुआ मिल जाएगा जिन्हें मजदूरी के नाम पर 10 से 50 रुपया हफ्ता मिलता है। सोचिए एक बच्चा 17-18 घंटे काम के बदले 50 रुपया हफ्ता पाता है जबकि वह वयस्क आदमी से दुगुना-तिगुना काम करता है और उसकी कमाई का सारा हिस्सा फैक्ट्री मालिक डकार जाता है। इतना ही नहीं गरीबी, लाचारी के मारे बाल-बंधुआ श्रमिक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी किसी तरह से अपने परिवार या स्वयं के भविष्य के लिए कोई आशा की किरण नहीं जगा पाते। मार-पिटाई खाने व अपनी जान तक देने के बाद भी किसी सरकार या राजनीतिक दलों की सहानुभूति का पात्र भी नहीं बन पाते। जैसा अभी हाल में एक बाल श्रमिक जो कि बिहार के मधुबनी का रहने वाला था, उसे उसके कारखाना मालिक ने पीट-पीटकर सिर्फ इसलिए मार डाला कि 17-18 घंटे काम करने के बाद 9 वर्षीय बच्चा मालिक द्वारा दिया गया टारगेट पूरा नहीं कर पाया था। उसी के साथ तीन अन्य बच्चों को तो किसी तरह साथियों ने मरने से बचा लिया मगर सज्जाद अली (बदला हुआ नाम) के शरीर पर पड़े निशान मालिकों द्वारा बच्चों पर जुल्म की कहानी बयां करने के लिए काफी है। जुल्म की यह दासतां राजधानी दिल्ली में कई वर्षों से चल रही थी और पुलिस को इसकी भनक तक न हो यह पुलिस की कार्यशैली पर एक प्रश्न चिह्न है क्योंकि भारत नगर थाना घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर है। मुक्ति आश्रम में पिछले कई वर्षो में ऐसे सैकड़ों मामले आए हैं जिनमें मां-बाप की नासमझी, गरीबी व मजबूरी का फायदा उठाकर बहला-फुसलाकर या फिर चुराकर उनके बच्चों को दिल्ली, मुम्बई, जयपुर व हैदराबाद आदि महानगरों में दलालों की मार्फत बेचा गया था। एक और बच्चे की कहानी का यहां उल्लेख करना चाहूंगा। कामिल (बदला हुआ नाम)। उम्र13 वर्ष। बिहार का रहने वाला है जो पिछले कई वर्षों से दिल्ली में जरी के कारखाने में काम कर रहा था। कामिल के पिताजी अंधे हैं। मां के बीमार पड़ने पर साहूकार का 40 हजार रुपया सिर पर चढ़ गया। ऐसे में कामिल कभी स्कूल नहीं जा सका। छोटी सी उम्र और जमाने भर का बोझ। इसी समय के लिए घात लगाए बैठा था एक दलाल। जिसने गरीब, लाचार, मजबूर मां- बाप को लालच के जाल में फंसाया और बच्चे को देश की राजधानी के सब्जबाग दिखाकर दिल्ली ले आया। फिर शुरू हुआ गुलामी का दुष्चक्र। घोर अंधेरे में मालिक की डरावनी आवाज में बच्चे को जगाया जाता और थमा दिए जाते औजार। सुबह 6 बजे से रात के 12-1 बजे तक काम, खाने कोई वक्त नहीं, सिर्फ और सिर्फ काम। बच्चे की नाजुक उंगलियां मशीनों की तरह चलने लगीं। अगल-बगल कौन रहता है, कौन आता-जाता है, इस सच से वह बेखबर था। न कभी खेलने को मिला और न घूमने को। बच्चे का जीवन एक छोटे से बदबूदार अंधेरे कमरे तक सिमटकर रह गया। एक साल कब पूरा हुआ, उसे पता भी नहीं चला। इस दौरान न तो बच्चे की कभी मां-बाप से बात हुई और न मुलाकात। पैसे के नाम पर सौ रुपया मेहनताना मिलता था। काम कम होने पर या गलती होने पर मार-पिटाई, गाली-गलौज तो जैसे उसकी नियति बन चुकी थी। मालिक को मतलब था तो सिर्फ ज्यादा से ज्यादा काम से। कामिल अब गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो चुका है और जीवन के लिए नये-नये सपने बुनते हुए पढ़िलखकर सामाजिक कार्यकर्ता बनना चाहता है। अब एक और बच्चे की कहानी उसी की जबानी बयां कर रहा हूं। ‘मेरा नाम रंजीत कुमार (बदला हुआ नाम) है। मेरी उम्र दस वर्ष है, मैं बिहार का रहने वाला हू। मेरे पिताजी राजमिस्त्री हैं जिन्हें कभी-कभार काम मिल जाता है। मेरी पांच बहनें हैं। मेरे पिताजी इतना पैसा नहीं कमा पाते कि घर का खर्च चल सके। लिहाजा घर का बड़ा बेटा होने पर घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। एक दिन एक आदमी (सेठ) मेरे घर आया और मेरे मां-बाप को कहा कि तुम्हारी पांच बेटियां हैं, इनकी शादी-ब्याह कैसे करोगे। तुम अपने बड़े बेटे को मेरे साथ दिल्ली भेज दो जहां वह मेरे पास रहेगा, अच्छे से काम कराऊंगा, फिर ये ढेर सारा पैसा कमाएगा। चूंकि सेठ गाड़ी से आया था उसका पहनावा भी अमीरों जैसा था। मेरे मां-बाप को उसने 1600 रुपये दिये और लालच में आकर मां-बाप ने मुझे उसके साथ दिल्ली भेज दिया। दिल्ली आकर तो जैसे मेरा बचपना कहीं खोता गया, क्योंकि सेठ सुबह पांच बजे मुझे बैग बनाने के काम पर लगा देता था और यह क्रम रात 12-1 बजे तक चलता था। इस दौरान मेरा सेठ हमेशा मेरे सामने छड़ी लेकर खड़ा रहता था। थकान होने या बीमार होने पर भी वह जरा सा रहम नहीं दिखाता था। मेरे हाथ सुबह से बराबर चलते रहते थे।’ रंजीत बताता है जब किसी बच्चे को स्कूल जाते हुए या खेलते हुए वह देखता तो उसका भी मन करता था। मगर वह तो गुलाम था, अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकता था। मुक्त होने के बाद रंजीत अब पढ़ाई-लिखाई करके पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहता है और अपने मालिक जैसे लोगों को सजा देना चाहता है। आज यह एक बड़ा सवाल है कि बाजार के उदारीकरण व आर्थिक नीतियों के आगे सबसे ज्यादा गरीब परिवार के बच्चे ही गुलामी को मजबूर होते हैं। महानगर की झोपड़ियों में तिल-तिलकर मरते, कूड़े के ढेर पर बैठकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते बच्चे आखिर कब तक यूं ही अपना तन-मन मारकर जीवन जीते रहेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हम सही मायनों में बच्चों को देश का भविष्य मानकर उनके लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा नहीं पहनाते बाल एवं बंधुआ मजदूरी नहीं रुकेगी। इंसानियत का समाजशास्त्र बचपन की सुरक्षा की गारंटी दे सकता है, खुले बाजार का अर्थशास्त्र कभी नहीं।
संगठित अपराध है बच्चों की गुमशुदगी
पहले यह सुनने में आता था कि फलां आदमी या बच्चा मेले में गया, गुम हो गया और नहीं मिला। परंतु वह कुछ समय या साल दो साल में मिल जाता था। वर्तमान में जो बच्चा किसी कारणवश रास्ता भूल जाता है, तो घर नहीं लौट पाता है। रास्ता भूलने के बाद वह पुलिस या किसी संस्था के हाथ लगता है तो उसे सरकारी या प्राइवेट होम में भेज दिया जाता है। बच्चा यदि ऐसे आदमी के हाथ लग गया, जो बाल व्यापार करने या कराने वाले समूह से सम्बंध रखता है तो वह बच्चे को आपराधिक कायरे में लगा देता है। वहां बच्चों को यह गिरोह निगरानी में रखकर कार्य कराता है। यदि गिरोह से सम्बंध नहीं रहा तो उसे किसी ढाबे वाले के हवाले कर देता है, उसके बदले कुछ पैसा लेता है। इस तरह के कई उदाहरण सामने आए हैं। पूर्व में मानव व्यापार आंशिक रूप से ही संगठित अपराधों में था किंतु अब मानव व्यापार विश्व-व्यापार का रूप ले चुका है। बाल मजदूरी व वेश्यावृत्ति कराने के लिए अधिक संख्या में छोटे- छोटे बच्चे-बच्चियों का अपहरण किया जा रहा है। यह संगठित अपराध में तब्दील हो चुका है। वजह सस्ती मजदूरी में घरेलू नौकर या अन्य औद्योगिक इकाइयों में बच्चों की बढ़ती मांग है। वेश्यावृत्ति का कारोबार भी बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इस कारोबार चलाने के लिए गरीब व असुरक्षित स्थानों पर रहने वाली बच्चियों को अगवा करके उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंका जा रहा है। इसके लिए अधिकतर कम उम्र की बच्चियों का अपहरण हो रहा है। अपहरण गिरोह के अलावा और कई तरह से किया जा रहा है। इसका खुलासा कुछ महीने पहले दिल्ली के सुल्तानपुरी थाने से दो महिलाओं के पकड़े जाने से हुआ। थाना नेब सराय से साध्वी गिरोह का पकड़ा जाना और ख्याला थाना अंतर्गत रैकेट का पर्दाफाश होना सिद्व कर रहा है कि दिल्ली में बच्चों को चुराने वाले गिरोह सक्रिय हैं। दिल्ली में सबसे ज्यादा गुमशुदगी दिल्ली में बच्चों के गुम होने या अपहरण से सम्बंधित मामले अधिक हैं। दिल्ली में प्रत्येक दिन 17 बच्चे गुम होते हैं जिसमें से 6 कभी भी नहीं मिलते हैं। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार चारों महानगरों में गुमशुदगी सम्बंधित मामलों में दिल्ली पहले स्थान पर है। आरटीआई के अंतर्गत प्राप्त सूचना के अनुसार जनवरी 2008 से अक्टूबर ’10 तक दिल्ली से 13,570 बच्चे गुम हुए और 1 जनवरी ’11 से 26 अप्रैल ’11 तक 550 बच्चे गुम हुए हैं। गुम हुए बच्चों में सर्वाधिक 12-19 वर्ष की लड़कियां हैं और सामान्यत: 0-19 वर्ष तक के लड़के व लड़कियां हैं। 90 प्रतिशत गुम हुए बच्चे झुग्गी-झोपड़ियों व स्लम के हैं। दिल्ली का उत्तरी-पूर्वी जिला गुमशुदा बच्चों के मामले में प्रथम स्थान पर है। 70 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के रहने वाले हैं। दिल्ली में गुम हुए कुल बच्चों में से 80 प्रतिशत पलायित लोगों के, 50 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से, 80 प्रतिशत एससी/एसटी और ओबीसी समुदाय से तथा 90 प्रतिशत बच्चे असंगठित क्षेतों में कार्य करने वाले मजदूरों के हैं। अपहरण की रिपोर्ट दर्ज नहीं समाज की धारणा है कि अपहरण, अमीरों के बच्चों का होता है न कि गरीब का। साथ ही यह भी कि गरीब का बच्चा भूख के कारण घर से भाग जाता है फिर वापस आ जाएगा। यही सोच गुमशुदा बच्चों के मुद्दे की सच्चाई को उजागर होने में समस्या पैदा करती है। इससे मिलती-जुलती सोच पुलिस-प्रशासन की भी है, लिहाजा अपहर्ता आसानी से बच निकलता है। गुमशुदा बच्चों के माता-पिता कहते रह जाते हैं कि उसके बच्चे को फलां आदमी ले गया है लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती। बहुतायत मामलों में तो वह एफआईआर भी दर्ज नहीं करती। दिल्ली के बाहरी इलाकों, स्लम, झुग्गी-झोपड़ी और असुरक्षित जगहों से बच्चे खेलते हुए या स्कूल जाते हुए गुम हो जाते हैं या अगवा कर लिए जाते हैं। इन जगहों पर रहने वाले ज्यादातर लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर से आए हुए हैं और अशिक्षित भी हैं। इनके मन में यह धारणा रहती है कि बच्चा कहीं खेल रहा होगा और शाम तक आ जाएगा। इस कारण से खोजने में देरी हो जाती है और गुम हुआ या अपहरण किया हुआ बच्चा आसानी से घर से दूर या रेलवे स्टेशन तक पहुंच जाता है। बाल तस्करी अपहृत बच्चों दिल्ली या देश के अन्य शहरों व गांवों से गुम हो रहे या अपहृत बच्चों को बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति, भीख मंगवाने व दूसरे कामों में लगाया जाता है। यह प्रक्रिया मानव व्यापार का ही अंग है। बच्चों का गुम होना या अपहरण करना बाल तस्करी या बाल व्यापार है। अपहृत बच्चों को बाल व्यापार के मकसद से लाया जाता है जबकि गुम हुआ या घर से नाराज होकर बच्चा घर से बाहर गुमराह होकर बाल तस्करों के हाथों में लग जाता है। इस तरह के बहुत से बच्चे जो घर से सम्पन्न हैं और अपने परिवार व रिश्तेदारों के फोन नम्बर या पता जानते भी हैं, वे भी घर वापस नहीं आते हैं। इस मामले में गिरोहों के पर्दाफाश होने से ऐसे उदाहरण सामने आए हैं। गिरोहों का उजागर होना इस बात की पुष्टि कर रहा है कि बाल व्यापार एक संगठित अपराध है। गुमशुदगी रोकने के उपाय बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि जिन इलाकों से बच्चे चुराए जा रहे हैं वहां के थाना अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाए। दूसरा, स्थानीय सामाजिक संगठनों, स्कूल के अध्यापकों और सांस्कृतिक संस्थाओं का भी दायित्व है कि वे बच्चों और बस्तियों के लोगों को सचेत करें कि बच्चों को चुराने वाले गिरोहों से कैसे बचा जा सकता है क्योंकि बच्चे अपने आप गुम नहीं हो रहे बल्कि उन्हें कोई चुरा रहा है। तीसरा, बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं और राष्ट्रीय तथा प्रांतीय स्तरों पर ऐसी एजेंसियां बनाई जाएं जो पुलिस द्वारा की गई कार्रवाइयों पर निगरानी रखें और सुनिश्चित करें कि प्रत्येक मामले में स्थानीय पुलिस ईमानदारी और तत्परता से कार्रवाई करे।
बाल अत्याचार के मुकाबले सूचना का अधिकार
जंगलों में होने वाले अवैध कटान, सीलिंग, बंजर और वहां की जमीन पर अवैध कब्जे तथा गरीबों पर होने वाले जुल्म की शिकायतें लगातार होती रही हैं। ऐसी शिकायतों के बंडल के बंडल अधिकारियों के तबादले के बाद उनके दफ्तरों में ही लुप्त होते रहे। यह जरूर रहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और भुक्तभोगियों द्वारा दौड़-धूप करने पर कुछ मामलों का निदान निकल आता था पर शेष का लिखित उत्तर देने की जहमत किसी अधिकारी ने नहीं उठाई इसलिए कि यह उनकी बाध्यता नहीं थी। लेकिन सूचना अधिकार अधिनियम 2005 लागू होने के बाद स्थिति अब बदल चुकी है। बच्चों पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में भी इस कानून के लागू होने से पारदर्शिता आयी है। यदि यह कानून न बनता तो शायद यह भी पता न चलता कि हरियाणा में कुल ईट-भट्ठों की संख्या 1993 है जिनमें से अनिवार्यत: फैक्ट्री एक्ट, 1948 के तहत पंजीकृत होने वाले ईट-भट्ठों की संख्या मात्र 18 है और औसतन एक ईट-भट्ठे में 61 मजदूर काम करते हैं जिनमें बड़ी संख्या में बाल मजदूर भी शामिल हैं।
आरटीआई ने बदली तस्वीर
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार यह भी पता चला कि हरियाणा के 174 ईट- भट्ठे बिना मजदूर के तथा 75 ईट भट्ठों में मात्र एक मजदूर काम करता है जबकि 90 प्रतिशत ईट भट्ठों में 19 से कम मजदूर कार्य करते हैं। असलियत में यह पता चला कि इन भट्ठों में बिहार तथा उत्तर प्रदेश से बाल तस्करी के माध्यम से लाये गये 1000 से ज्यादा बच्चे काम करते हैं। सूचना के अभाव में पहले जहां कुछ भी नहीं किया जा सकता था, अब इन बच्चों के लिए कुछ किया जा सकता है। फिलहाल वहां आश्वस्त होने की बात यही है कि सारे मामलों की उच्च स्तरीय जांच कराई जा रही है। एक बात और हुई कि पाली क्रशर जोन में जहां श्रमिकों के बच्चों के लिए पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी, सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पत्र व्यवहार करने से 2 स्कूल खुल गए, जबकि मांग पांच स्कूलों की थी। इस अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना से यह भी स्पष्ट हुआ कि हरियाणा सरकार का रवैया बंधुआ मजदूरों के मामले में अत्यधिक अड़ियल है और वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा अदालती आदेशों पर भी लीपा-पोती करने में जी-जान से जुटी है जिसके चलते मजदूर तो आर्थिक संकट से जूझ ही रहे हैं उन के बच्चे भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं।
उजागर हुई सरकार की विफलता
इस अधिनियम में दिल्ली के श्रम विभाग की विफलताओं को भी खूब उजागर किया। पंजीकरण की अधिसूचना जारी होने के वर्षों बाद भी यहां के 80 प्रतिशत कारखानों और 90 प्रतिशत दुकानों तथा प्रतिष्ठानों का पंजीकरण नहीं हुआ जिससे दिल्ली सरकार को अब तक करोड़ों की राजस्व की हानि तो हुई ही, यह भी साबित हो गया कि वह कारखानेदारों और दुकानदारों के आगे कितनी असहाय है। प्राप्त सूचनाओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि श्रम विभाग के अधिकारियों की दिलचस्पी मुक्त बंधुआ-बाल मजदूरों के पुनर्वास से कहीं इस निमित्त आए धन को जन- जागरूकता के नाम पर बंदरबांट करने में अधिक है। और इस इस तरह वहां के अधिकारियों ने कई करोड़ रुपये का वारा-न्यारा कर डाला। मेट्रो रेल और कॉमनवेल्थ गेम्स के रमिकों के बारे में भी इस प्रकार के सारे तथ्य सामने आए, पर चूंकि पूरे कुएं में भांग पड़ी है, इसलिए तत्काल निदान निकलना मुश्किल है। दिल्ली ही की तरह अन्य राज्य सरकारों की भी दिलचस्पी बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास में नहीं थी। पर सूचना अधिकार अधिनियम के तहत लगातार सूचना मांगने से राज्य सरकारों और अधिकारियों पर दबाव बढ़ा है और मामले मे तेजी आई है। पश्चिम बंगाल ने इस मामले में सबसे अधिक तेजी दिखाई। बिहार के 10 से 15 वर्ष पूर्व मुक्त बाल एवं बंधुआ मजदूरों को भी पुनर्वास राशि मिलने लगी है। इस दबाव के चलते मुक्त बाल एवं बंधुआ मजदूरों के लिए बिहार सरकार ने अपने हिस्से का पैसा जिलों को भेज दिया है, पर स्टाफ की कमी से काम तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है। वहां बच्चों की शिक्षा पर भी अब जोर दिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में भी दिखा असर
उत्तर प्रदेश सरकार की तंद्रा इस प्रकार के सवाल उठाये जाने के बाद भंग हुई है और पुनर्वास की फाइलें दौड़ने लगी हैं। इस पूछताछ से यह भी उजागर हुआ कि वहां के ईट भट्ठों से मुक्त कराकर छत्तीसगढ़ भेजे गये हजारों बंधुआ वर्षो बीत जाने के बाद भी उसी हाल में पड़े हैं। इस मामले में वहां की सरकार का रवैया हरियाणा सरकार से अलग दिखाई नहीं पड़ता लेकिन उनके रवैयों से निराश होकर अपने प्रयास पर विराम भी नहीं लगाया जा सकता। इस अधिनियम के चलते निदरेषों पर हुए पुलिसिया जुल्म की भी अनेक दास्तानों का खुालासा हुआ, खासकर नक्सली बेल्ट में। निस्संदेह वे अधिकारी जिनकी जवाब देने की जिम्मेदारी होती है लोकसभा और विधानसभाओं में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर की तरह कभी-कभी यहां भी गोलमोल जवाब देते हैं। पर इस सबके बाद जनता को मिले इस हथियार का सचमुच कोई जवाब नहीं। तथा प्राय: ऐसे रहस्यों का पर्दाफाश होता रहता है जिसे जानकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं पर यह अधिनियम अधिकारियों की मनमानी पर अंकुश लगाने में बड़ा कारगर सिद्ध हुआ है और उसे कुछ भी गलत करने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि उसके अधिक से अधिक उपयोग के लिए जनता को प्रशिक्षित और प्रोत्साहित किया जाए।
क्या-क्या हैं बच्चों के विरुद्ध अपराध
भारतीय दंड संहिता में बच्चों के विरुद्ध अपराध का कोई अलग वर्गीकरण नहीं है। सामान्यतया वे अपराध, जो बच्चों के विरुद्ध किए जाते हैं, या वे अपराध जिनमें बच्चे भुक्तभोगी होते हैं, उन्हें बच्चों के विरुद्ध अपराध माना जाता है। भारतीय दंड संहिता और विभिन्न निरोधात्मक एवं सुरक्षात्मक ‘विशेष और स्थानीय कानूनों’ में विशेषकर ऐसे अपराधों का उल्लेख मिलता है, जिनमें बच्चे भुक्तभोगी होते हैं या इस रूप में जाने जाते हैं। सम्बंधित कानून और उसकी धाराओं में दी गई परिभाषाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न अपराधों के लिए बच्चों की आयु में अंतर है, लेकिन किशोरावस्था न्याय कानून-2000 के अनुसार बच्चे की आयु 18 वर्ष से कम परिभाषित की गई है। इसके तहत उन्हीं अपराधों को बच्चों के विरुद्ध अपराध माना गया है जिनमें या तो बच्चों को अपराध का शिकार बनाया जाता है या प्रकारांतर में वे इसके भुक्तभोगी होते हैं। अपराध की श्रेणियां बहरहाल, विभिन्न अपराधों के उन मामलों को जिनमें बच्चे भुक्तभोगी अथवा प्रताड़ित होते हैं, मोटे तौर पर दो श्रेणी में रखा जा सकता है :- बच्चों के विरुद्ध होने वाले वे अपराध जिनमें भारतीय दंड संहिता के तहत सजा का प्रावधान है। बच्चों के विरुद्ध होने वाले वे अपराध जिनमें अपराधी विशेष और स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत दंडनीय होता है। उपयरुक्त दो श्रेणियों के अनुसार बच्चों के विरुद्ध अपराध से सम्बंधित विशेष धाराएं/कानून निम्नलिखित हैं :-
भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडनीय, बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध :
क) हत्या (302 भादंवि)।
ख) भ्रूणहत्या के विरुद्ध धारा 315 और 316 भादंवि।
ग) शिशुहत्या (नवजात शिशु -0 से 1 वर्ष-के विरुद्ध अपराध) धारा 315 भादंवि।
घ) आत्महत्या के लिए उत्प्रेरण (बच्चों को आत्महत्या के लिए दूसरे व्यक्ति द्वारा उकसाना) धारा 305 भादंवि।
ङ) अरक्षित और परित्यक्त (परित्याग की मंशा से अभिभावकों या अन्य द्वारा बच्चों को आश्रय न देना या हमेशा के लिए छोड़ना) धारा 317 भादंवि।
च) अपहरण और फुसला या धमकाकर भगा ले जाना ए) बाहर भेजने (कबूतरबाजी)/तस्करी के लिए अपहरण (धारा 360 भादंवि) बी) विधिक संरक्षत्व से अपहरण (361 भादंवि) सी) फिरौती के लिए अपहरण (धारा 363-धारा 384 के साथ पठनीय) डी) ऊंट दौड़ आदि के लिए अपहरण (धारा 363 भादंवि) ई) भिक्षावृत्ति के लिए अपहरण(धारा 363-ए भादंवि) एफ) विवाह के लिए बाध्य करने उद्देश्य से अपहरण (धारा 366 भादंवि) जी) गुलामी के लिए अपहरण (धारा 367 भादंवि) एच) सम्बंधित व्यक्ति से चुराने के मकसद से 10 वर्ष तक के बच्चे का अपहरण (धारा 369 भादंवि)
छ) छोटी आयु की लड़की की मुख्तारी या दलाली(बलपूर्वक उकसाने या अवैध संभोग के लिए ललचाने के निमित्त(366-ए भादंवि)
ज) वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की बिक्री (धारा 372 भादंवि)
झ) वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को खरीदना (धारा 373 भादंवि)
ञ) बलात्कार (धारा 376 भादंवि)
ट) अप्राकृतिक अपराध (भादंवि 377) 1.विशेष और स्थानीय कानूनों के अंतर्गत दंडनीय, बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध : अ) अनैतिक अवैध क्रय-विक्रय निरोधक कानून 1956 (जहां छोटे बच्चों को वेश्यावृत्ति में अपमानित किया जाता है ) ब) बाल विवाह निरोध (संशोधन) कानून 1929 स) बाल श्रम (निवारण एवं विनियमन) कानून 1986
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