Wednesday, May 25, 2011

काले कारोबार का दूसरा पहलू


उत्तरी कश्मीर के पट्टन इलाके से हाल ही में नशीली दवाओं की बड़ी खेप बरामद हुई है। इस सिलसिले में जो चार व्यक्ति पकड़े गए, उनमें से तीन पूर्व आतंकी हैं। इनसे हुए किसी और बड़े खुलासे का पता तो अभी नहीं चल सका है, लेकिन इतना जरूर मालूम हो गया है कि पहले आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े रह चुके कुछ लोग अब मुख्य धारा में शामिल होने के नाम पर युवाओं को नशे का शिकार बनाने की साजिश में जुट चुके हैं। यह इस नजरिये से तो गौर करने की बात है ही कि अपराध की दुनिया से अभी भी उनका साबका नहीं टूटा है, इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य इसके पीछे छुपा हुआ है। बहुत हद तक आशंका यह है कि वे अभी भी उन गिरोहों के लिए ही काम कर रहे हों, जिनके लिए पहले वे सीधे तौर पर देश का अमन-चैन छीनने का काम करते रहे हैं। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि नशीले पदार्थो की तस्करी से दुनिया भर के आतंकवादी गिरोहों का संबंध रहा है और अभी भी है। यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें बहुत कम मेहनत से बहुत ज्यादा धन मिल जाता है, बल्कि इसलिए भी कि इसके जरिये वे भोले-भाले युवकों को आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं और एक बार नशे का आदी हो जाने के बाद मनमाने काम करवाते हैं। कश्मीर के हालात को ध्यान में रखते हुए अगर इस नजरिये से इस स्थिति को देखें तो यह नशे के दूसरे मामलों की तरह सिर्फ नशीले पदार्थो के काले व्यापार तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि बड़ी संख्या में आतंकवादी गिरोहों का दारोमदार नशे के काले कारोबार पर ही टिका हुआ है। क्योकि इन्हें अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत होती है। जो वैध तरीके से इन्हें मिल ही नहीं सकता और अवैधानिक तरीकों से इसे हासिल करने के लिए इन्हें बहुत अधिक धन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा अपने गिरोह में शामिल करने के लिए इन्हें रोज नए-नए युवकों की जरूरत होती है। सब्जबाग दिखाने के लिए भी जरूरी है कि पहले उन्हें कुछ धन मुहैया कराया जाए। साथ ही, ऐसे ही कई और काम गिरोह चलाने के लिए उन्हें करने होते हैं। इन सबके लिए उन्हें बड़ी धनराशि की जरूरत होती है। जाहिर है, वह किसी सही काम से आ ही नहीं सकता। अवैधानिक तरीके से बड़ी धनराशि हासिल करने का रास्ता नशे के कारोबार से होकर जाता है। इसलिए पूरे एशिया महाद्वीप में सक्ति्रय लगभग सभी आतंकवादी गिरोह आसानी से पैसा कमाने के लिए नशीले पदार्थो और नकली नोटों का काला धंधा ही करते हैं। कश्मीर तथा भारत के अन्य भागों में भी सक्ति्रय आतंकवादी गिरोह इस मामले में अपवाद नहीं हैं। न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि पूरे सीमावर्ती इलाके को नशा किस तरह अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। जम्मू-कश्मीर के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान तक के तमाम युवक इनकी चपेट में आ चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या में शिक्षित बेरोजगार शामिल हैं। रोजगारशुदा युवकों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। जो बेरोजगार हैं, उनकी स्थिति तो नशे के चलते बुरी है ही, रोजगारशुदा युवकों का भी पारिवारिक जीवन इसके चलते लगभग तबाह हो रहा है। अच्छी-खासी जिंदगी जीते युवक सिर्फ नशे के चलते हताशा के भंवर में फंस चुके हैं। जो बेरोजगार या कम आमदनी वाले व्यवसायों में हैं, उन्हें न चाहते हुए भी अपराधों की दुनिया की ओर कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं। आम तौर पर ऐसे युवकों की शुरुआत चोरी-छिनैती जैसी घटनाओं से होती है, और बाद में ये सारी हदें पार करने लगते हैं। यह सब इन्हें इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि नशे की अपनी जरूरतें ये आसानी से पूरी नहीं कर सकते। ऐसी ही लतों के शिकार युवक आखिरकार राष्ट्रद्रोही गिरोहों के हत्थे भी चढ़ जाते हैं, जो उन्हें अपनी मर्जी के मुताबिक विध्वंसक गतिविधियों में इस्तेमाल करते हैं। ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें युवकों के गलत रास्ते पर जाने का पहला कारण नशा साबित हुआ है। इसके बावजूद पूरे देश में चोरी-छिपे नशीली दवाएं बिक रही हैं और जिन्हें उनकी जरूरत होती है वे किसी-न-किसी तरह हासिल भी कर रहे हैं। नशे की एक खुराक देने के लिए ये धंधेबाज अपने शिकार युवकों से अपने मन मुताबिक काम तो कराते ही हैं, उनसे मुंहमांगा दाम भी वसूलते हैं। जाहिर है, वे न सिर्फ हमारी अर्थ्व्यवस्था को खोखला बनाने पर तुले हुए हैं, बल्कि हमारी नई पीढ़ी को भी बर्बाद कर रहे हैं। जिन युवकों की प्रतिभा का सदुपयोग रचनात्मक कार्यो से देश की बेहतरी के लिए हो सकता है, उनका दुरुपयोग विध्वंसक गतिविधियों में करके वे देश की बर्बादी में कर रहे हैं। कश्मीर इस लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील है। एक तो वह सीमावर्ती राज्य है, दूसरे अलगाववादियों की सक्रियता अभी भी कुछ खास कम नहीं हुई है। अलबत्ता, सुरक्षाबलों और सरकार के सार्थक प्रयासों से उनके मंसूबों पर लगातार जिस पानी फिर रहा है, उससे वे हताशा की ओर बढ़ रहे हैं। यह हताशा उनके भीतर कुंठा पैदा कर रही है और कुंठा के तहत वे कुछ भी करने को आमादा हैं। यह बात अब पूरी तरह साफ हो चुकी है कि आम कश्मीरी न तो अलगाववाद को सही मानता है और न ही वह आतंक पसंद करता है। सच तो यह है कि अलगाववाद और आतंकवाद के चलते सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी जनता का ही हुआ है। अधिकतर कारोबार ठप हो गए हैं और अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। खेती-बागवानी का व्यवसाय भी आतंकवाद के ही कारण उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं दे पा रहा है। वे इससे बेतरह आजिज हैं और जल्द से जल्द छुटकारा चाहते हैं। इसके बावजूद इनकी विध्वंसक गतिविधियों में शामिल होना कई बार कश्मीरी युवाओं की मजबूरी होती है। बुजुर्गो की मानें तो अलगाववाद की उनकी बातों से कोई सहमत नहीं है। सभी कशमीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं और अमन-चैन की जिंदगी जीना चाहते हैं। यह पता लगाया जाना चाहिए कि इसके बावजूद वे उनकी गतिविधियों में किस मजबूरी में शामिल होते हैं? बहुत हद तक संभव है कि इसके मूल में एक बड़ी वजह यह नशा भी हो। इस मामले की तह तक जाना बहुत जरूरी हो गया है। इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि नशे के काले कारोबार को जितनी जल्दी हो सके पूरे देश में किसी तरह ठप करने का इंतजाम बनाया जाए। चूंकि इनका काला कारोबार पूरे देश में फैला हुआ है और हमारे देश में पुलिस के कार्य एवं अधिकार का दायरा अलग-अलग राज्यों तक सिमटा हुआ है, इसलिए इसे केवल राज्यों की पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। बेहतर यह होगा कि इसे उच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया जाए और इसके लिए एक अलग टास्क फोर्स बनाई जाए। इसके जिम्मे केवल नशे और इस कारोबार के विभिन्न पहलुओं पर काम करना ही हो। ताकि पूरे देश में फैले इनके नेटवर्क की ठीक से पड़ताल की जा सके और इनके काले कारोबार को पूरी तरह खत्म किया जा सके। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)


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