Thursday, May 19, 2011

बदल रहा है बच्चों के खिलाफ अपराध का परिदृश्य


बच्चों के विरुद्ध अपराध एक विश्वव्यापी परिघटना है। भारत में पिछले दस वर्षो में इसमें लगातार वृद्धि होती चली जा रही है। 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भारत में बच्चों के साथ र्दुव्‍यवहार के ऊपर एक अध्ययन किया था, जिसमें यह बात सामने आई थी कि बच्चों के प्रति हिंसा की घटनाएं और छोटे बच्चों पर लैंगिक हमले तेजी से बढ़ रहे हैं। मध्य प्रदेश जैसा पिछड़ा राज्य बाल यौन-उत्पीड़न के मामले में सबसे आगे है। इसके बाद महाराष्ट्र का स्थान आता है। राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के यौन उत्पीड़न की जितनी घटनाएं होती हैं, उनमें से 51 प्रतिशत इन्हीं दो राज्यों में सामने आती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बच्चों के खिलाफ घर की चारदीवारी से लेकर बाहर तक अपराध होते हैं। घर के अंदर के अपराध के बारे में कोई जागरूकता नहीं है। मां-बाप द्वारा बच्चों के उत्पीड़न या घर के अंदर बच्चों के शारीरिक शोषण के मामलों पर ज्यादा बातचीत नहीं की जाती। बच्चों के खिलाफ अपराधों को हम मुख्य रूप से चार भागों में बांट सकते हैं-(1) बलात्कार, (2) अपहरण, (3) छोटे बच्चों की खरीद-फरोख्त और (4) कन्या भ्रूण-हत्या। बच्चों के खिलाफ बलात्कार की घटनाओं में आंकड़ों के हिसाब से 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2006 में जहां कुल 5,102 मामले दर्ज हुए तो 2007 में दर्ज होने वाले मामलों की संख्या 6,377 थी। दर्ज आंकड़ों से अलग देश भर में बच्चों के साथ बलात्कार की एक अलग ही भयावह तस्वीर होगी। गुमशुदा बच्चों के मामले में बात करें तो केवल 2009 में ही देश भर में 60,000 बच्चे गुम हुए जबकि पिछले वर्षों में यह संख्या 44,000 के आसपास हुआ करती थी। यह बढ़ोतरी ग्लोबलाइजेशन की वजह से हुई है और यह काफी चिंता का विषय है।
देहव्यापार अहम अपराध
बच्चों द्वारा कराए जाने वाले अपराधों में सेक्स टूरिज्म या देह-व्यापार में उन्हें लगाना सबसे प्रमुख है। यह एक संगठित अपराध है जिसमें बड़े पैमाने पर बच्चों को धकेला जा रहा है। एक अन्य तरीके से बच्चों का अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाने का भी व्यवसाय चल रहा है जिसका सबसे बड़ा केन्द्र कानपुर है। इसी तरह जेब काटने के धंधे के लिए गाजियाबाद एक बड़े प्रशिक्षण केन्द्र के तौर पर उभरा है। ड्रग्स की सप्लाई या तस्करी के काम के लिए जिस प्रशिक्षण की जरूरत होती है, उसे उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा केन्द्र मुम्बई है। इधर, चाइल्ड पोनरेग्राफी के रूप में बच्चों के खिलाफ अपराध का एक नया बाजार तैयार हुआ है। पिछले चार-पांच वर्षों में इस अपराध में काफी उछाल आया है। यह एक प्रकार का सायलेंट क्राइम है जिसे हम साइबर क्राइम के अंतर्गत रख सकते हैं। इसकी तरफ मां-बाप का, एनजीओ का और पुलिस का भी ध्यान बहुत कम है। अगर इन पर ध्यान दिया जाए तो अपराध के आंकड़ों में जबरदस्त उछाल आ जाएगा। स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की भी एक नई प्रवृत्ति इधर बड़े पैमाने पर देखने में आ रही है जिसे देखते हुए स्कूलों के नियम- कानूनों में भी बदलाव लाने की जरूरत सामने आई है।
उकसाने वाले दो कारक
बच्चों के खिलाफ अपराध को उकसाने वाले कारकों को हम दो भागों में बांट कर समझ सकते हैं-पुश फैक्टर और पुल फैक्टर। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तबाही, कृषि में गिरावट, अशिक्षा और गरीबी को हम पुश फैक्टर के तौर पर समझ सकते हैं जबकि पुल फैक्टर में शहरी चमक-दमक या आकर्षण, फिल्मों के मायालोक और संगठित गिरोहों के पल्रोभनों को रखा जा सकता है। बच्चों के उत्पीड़न को देखने के नजरिये में आज दुनिया के पैमाने पर काफी परिवर्तन आया है पर हमारे देश में बच्चों के हित में काम करने वाली मशीनरी आज भी पुराने र्ढे पर ही काम कर रही है। जहां तक पुलिस के नजरिये की बात है तो वह पूरी तरह भारतीय दण्ड संहिता से बंधी हुई है और इसलिए वह केवल पेनिट्रेटिव सेक्स को ही यौन हिंसा मानती है जबकि आज परिदृश्य काफी बदल गया है। 1992 में संयुक्त राष्ट्र समझौते का अनुमोदन करने के बाद भारत को अब वही नीति लागू करनी होगी जो संधि में दी गई है। इसके अनुसार किसी भी उम्र में बच्चे का यदि किसी वयस्क द्वारा अपनी यौन संतुष्टि के लिए किसी भी तरह से उपयोग किया जाता है तो ऐसा करना यौन उत्पीड़न के दायरे में आएगा। उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना, उसे गंदी तस्वीरें या फिल्में आदि दिखा कर उत्तेजित करना भी यौन उत्पीड़न के अंतर्गत ही माना जाएगा। आज हमें अपने कानूनों को इसी हिसाब से पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। सरकार भी इसे मानती है। हमें इस मुद्दे पर एक सामाजिक जागरूकता लाने के लिए भी काम करना होगा।
संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधि
बच्चों के अधिकारों से सम्बंधित अन्तरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने के साथ-साथ हम अपने देश के संविधान द्वारा बच्चों से किए गए उन वादों के लिए भी जवाबदेह हैं, जो उन्हें स्वस्थ और सम्मानपूर्ण हालात में विकास करने का सम्पूर्ण अवसर देने के लिए किए गए थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि बच्चों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हम हर अन्तरराष्ट्रीय संधि पत्र पर हस्ताक्षर तो कर देते हैं पर बदकिस्मती से जमीनी स्तर पर उसे लागू करने का प्रयास ही नहीं करते। गरीबी और अशिक्षा इसके लिए दो सबसे बड़े उत्पादक कारक हैं। इन्हीं कारणों से जमीनी स्तर पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं हो पाती। बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बजट में जो प्रावधान होने चाहिए वह आज भी उपलब्ध नहीं कराया गया है। हमारे पास जरूरतमंद बच्चों के पुनर्वास के लिए आश्रय तक नहीं हैं। जो हैं वे अपराधी बच्चों के सुधार-गृह हैं। मजबूरी में हम मासूम बच्चों को भी अपराधी या आरोपित बच्चों के साथ रखते हैं। यह असंवेदनशीलता धड़ल्ले से बरती जा रही है। पुनर्वास व्यवस्था की कमी के चलते ही हम फुटपाथों पर बच्चों को भीख मांगते देखते हैं पर कुछ हस्तक्षेप नहीं कर पाते। हमारे देश की पुलिस की मानसिकता आज भी औपनिवेशिक दौर में है जबकि बच्चों के मामले में पुलिस से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील रवैया रखने की अपेक्षा होती है। पुलिस के प्रशिक्षण पर आज विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
समस्या के त्रिआयाम
बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध की समस्या को हमें तीन तरह से देखना होगा। एक तो हमारे देश में एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है जिसके तहत बच्चों का पुनर्वास एक लम्बी प्रक्रिया में किया जा सके। बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए अब तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा सका है। जिन पाश्चात्य देशों की तर्ज पर हमने अपने रिमांड होम्स बनाए हैं, उन्होंने अपने यहां उन्हें पूरी तरह बदल लिया है पर हम किसी किस्म के बदलाव की दिशा में नहीं सोच रहे। देश के सुधार-गृहों पर सरकार को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए ताकि देश की जनता उनकी वास्तविक स्थिति का पता चल सके। सरकार ने मुश्किल परिस्थितियों में फंसे बच्चों की हिफाजत और उनके पुनर्वास के लिए बाल कल्याण समितियों की स्थापना तो कर दी पर उन्हें बिल्कुल अक्षम बना कर रखा है। इन समितियों में जहां प्रतिबद्ध और जानकार लोगों की जरूरत थी, वहां आज केवल राजनीतिक सम्पकरे की वजह से ही उनमें लोग रखे जा रहे हैं और इसका खमियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इस व्यवस्था में बच्चों के लिए नियुक्त ज्यूडिशियरी काम के बोझ से इतनी दबी हुई होती है कि वह बच्चों की जरूरतों को समझ ही नहीं पाती।
नोडल एजेंसी की जरूरत
देश के पुलिस थानों की तरह वे भी सीमा-विवाद में उलझे रहते हैं और इस कारण समय पर बच्चों को समुचित मदद नहीं मिल पाती। जरूरत इस बात की है कि बच्चों के सम्पूर्ण विकास और उनके संरक्षण के लिए एक ही नोडल एजेंसी हो तथा इस मकसद के लिए आम नागरिकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। वर्तमान कानूनों की वजह से अक्सर आम नागरिक बच्चों की मदद करने से घबराते हैं। बच्चों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम में बाल सुरक्षा आयोग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती थी पर चूंकि उसके पास कोई न्यायिक अधिकार नहीं है, इसलिए वह भी प्रभावकारी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा। वह अभी एक सलाहकार समिति भर है। इतने सीमित संसाधनों के होते हुए वह कोई योगदान कर पाएगा ऐसा सोचना बेवकूफी ही होगी। जब तक इसे भी एससीएसटी आयोग की तरह प्रभावकारी बनाने के लिए संसद द्वारा पारित नहीं किया जाएगा, यह कोई भी प्रभावकारी भूमिका निभाने में सक्षम नहीं हो सकेगा। पर यह सब करने के लिए बच्चों के प्रति एक जिम्मेदारी का अहसास और कुछ बदलाव लाने की इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। फिलहाल तो ये दोनों ही चीजें दृश्यपटल से ओझल हैं।


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