मेरा विचार है कि बच्चों के खिलाफ उत्पीड़न की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए मां-बाप ही सबसे अधिक जिम्मेदार हैं क्योंकि बच्चों के सही लालन-पालन और उनके संरक्षण की पहली जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। हमारे पास ज्यादातर बच्चे मां- बाप की ज्यादतियों की वजह से ही भाग कर आते हैं। खुद मां- बाप ही बगैर यह सोचे उन्हें काम पर भेज देते हैं कि उनकी नजरों से दूर ये बच्चे आसानी से उत्पीड़न के शिकार बन जाएंगे। जो लोग बच्चों की खरीदिबक्री में संलिप्त हैं, जो मां-बाप को सुनहरे भविष्य का ख्वाब दिखाकर उनके बच्चे ले आते हैं हम केवल उन्हें ही दोषी नहीं मान सकते। आज दिल्ली जैसे महानगरों में उत्तर प्रदेश और बिहार से सबसे ज्यादा बच्चे आते हैं पर इसके लिए वहां की गरीबी ही एकमात्र कारण नहीं है। लोगों में जेजे एक्ट को लेकर जानकारी और जागरूकता का काफी अभाव है। इस वजह से बच्चों का व्यापार करने वाले लोग बड़े आराम से बच्चों का उत्पीड़न करते हैं और उन्हें पकड़े जाने का भय नहीं रहता। जिन राज्यों से आज बच्चे आते हैं या लाए जाते हैं। वास्तव में उन राज्यों में ही ऐसे उपाय किए जाने की जरूरत है ताकि बच्चों को वही रोका जा सके। राज्यों को अपने आधारभूत ढांचे का विकास करना होगा, रोजगार के पर्याप्त उपाय करने होंगे तभी ये हालात सुधरेंगे। इन राज्यों में बच्चों की समुचित शिक्षा का प्रबंध भी नहीं है। बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं तो उनके मुश्किल हालात में फंसने के खतरे काफी बढ़ जाते हैं।
कानूनन छूट का बेजा इस्तेमाल
बलात्कार जैसी हिंसा से बच्चों को सुरक्षा देने के लिए यों तो हमारे देश में कानून मौजूद हैं पर जब किसी बच्चे का बलात्कार होता है या परिवार का कोई सदस्य उसका शारीरिक शोषण करता है तो ऐसे मामलों में अक्सर बच्चों को डरा-धमका कर उनका बयान बदलवा देते हैं। सरकार को जेजे एक्ट के सेक्शन 23 (मां-बाप द्वारा उत्पीड़न के मामले में) को गैरजमानती बनाने की दिशा में भी ध्यान देना होगा क्योंकि इस छूट का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। मैं समझती हूं कि किसी भी देश की तरक्की का आकलन वहां की महिलाओं और बच्चे की सामाजिक स्थिति को देखकर करना चाहिए। यदि देश में महिलाएं और बच्चे रोजाना उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं तो यह कैसे माना जाए कि हमारा देश तरक्की कर रहा है? कानून के अनुसार बलात्कार या उत्पीड़न के शिकार बच्चों और लड़कियों को थानों में नहीं रखा जाना चाहिए पर इस कानून की रोज ही धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। हमने हाईकोर्ट तक में यह मामला उठाया पर स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। दिल्ली में मेरे हिसाब से बच्चों और महिलाओं के खिलाफ शोषण या हिंसा की घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं क्योंकि यहाँ बाल कल्याण समिति जैसी संस्थाएँ सक्रिय हैं पर बाहर कैसी स्थिति होगी हम इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। दिल्ली जैसे महानगर में हमारे पास लड़कियों के उत्पीड़न से सम्बंधित मामले आते ही रहते हैं।
राज्यों की भूमिका सही नहीं
यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्य आज भी अपनी भूमिका सही तरह से नहीं निभा रहा। बच्चों को उनके मूलभूत अधिकार तक नहीं मिल पाते। राज्य उनके अधिकारों की रक्षा नहीं कर पा रहा। आइसीपीएस (इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम) के तहत आज बच्चों के संरक्षण के लिए काफी पैसा आ रहा है पर सरकार न तो ठीक से योजना बना पा रही है और न ही यह पैसा खर्च कर पा रही है। यों दिखावे के लिए योजनाएं हैं भी पर उनका कोई फायदा होता दिखाई नहीं देता। जब तक परिवार, समाज और राज्य सभी अपनी भूमिका का मिलकर निर्वाह नहीं करेंगे, बच्चों को उनके अधिकार दिलाना सम्भव नहीं होगा। सरकार की योजनाएं दिल्ली जैसे स्थानों पर लागू की जा रही हैं पर और राज्यों में कुछ होता दिखाई नहीं देता। बच्चे जिन भयावह हालात से भाग कर आते हैं, उन्हें दोबारा उन्हीं हालात में वापस भेजने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। जरूरत है, यहीं पर उनके पुनर्वास, शिक्षा और विकास के समुचित प्रबंध किए जाएं। सुधार-गृहों में प्रशिक्षित काउन्सिलर्स से काउन्सिलिंग और उन्हें पूरे समय व्यस्त रखने की जरूरत है। सर्टिफिकेट कोर्सेस होने चाहिए जिनके अंतर्गत कारपेंटरी, मोबाइल रिपेयरिंग और खेलकूद जैसी चीजों के शिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। हाइकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस दिशा में कुछ काम हुआ है।
अवैध बाल सुधार गृह पर अंकुश लगे
उन चाइल्ड होम्स के हालात बेहतर हैं, जो हमारी निगरानी में रहते हैं। स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले होम की भी हर महीने जाँच की जाती है। नियम के अनुसार संस्थाओं को हर बच्चे को प्रत्येक तीन महीने पर सीडब्ल्यूसी के सामने पेश करना पड़ता है। महानगर में जो शेल्टर होम गैरकानूनी तरीके से चलाए जा रहे हैं वे बच्चों की खरीद- फरोख्त जैसे कायरें में लगे हो सकते हैं। यदि उनके पास वैध लाइसेंस नहीं हैं तो उन्हें बाल कल्याण समिति के समक्ष लाए जाने की जरूरत है ताकि हम बच्चों को उनसे बचा सकें। मेरा खयाल है कि बच्चों के पुनर्वास और उनके संरक्षण के लिए सरकार को पर्याप्त बजट की व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चे देश का भविष्य होते हैं पर अगर हम उन्हें समुचित विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर पर्यावरण मुहैया कराने के लिए पर्याप्त बजट का प्रबंध नहीं करेंगे तो देश का भविष्य कैसा होगा? ज्यादातर आरोपित परिवार से ही होते हैं और उन्हें आसानी से बच्चों के उत्पीड़न के मामलों में जमानत मिल जाया करती है। (राजेश चन्द्र की बातचीत पर आधारित)
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