जब हम बचपन बचाने की बात करते हैं तो निश्चित ही हमारा इशारा उन बच्चों की तरफ होता है जिनका बचपन छीना जा रहा है। जिनका वर्तमान, भविष्य, स्वास्थ्य, विकास की सम्भावनाएं आशाएं, इच्छाएं और सपने सभी चौपट किया जा रहा है, वह भी सिर्फ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की खातिर। देश में रोज-रोज तमाम तरह के घोटालों की र्चचा हो रही है। बड़े-बड़े रसूखदार लोग इन घोटालों में लिप्त होने के कारण कठघरे में हैं, और होने भी चाहिए। लेकिन ऐसे घोटाले जिन पर प्राय: किसी की नजर नहीं जाती वह है बच्चों की रोज की कमाई से इकट्ठा किया गया अरबों रुपयों का काला धन जो ऐसे ही मालिकों की जेब में जा रहा है। देश के किसी भी कोने में चले जाइए, आपको बाल श्रम के दर्शन बड़े आराम से हो जाएंगे। चाहे वह चाय ढाबा हो, जरी के कारखाने और आतिशबाजी बनाने की फैक्ट्री हो, या फिर अन्य कोई छोटी-मोटी यूनिट। सुबह पांच-छ: बजे से रात 12-1 बजे तक कोई छोटू अपना बचपन बेचता हुआ मिल जाएगा जिन्हें मजदूरी के नाम पर 10 से 50 रुपया हफ्ता मिलता है। सोचिए एक बच्चा 17-18 घंटे काम के बदले 50 रुपया हफ्ता पाता है जबकि वह वयस्क आदमी से दुगुना-तिगुना काम करता है और उसकी कमाई का सारा हिस्सा फैक्ट्री मालिक डकार जाता है। इतना ही नहीं गरीबी, लाचारी के मारे बाल-बंधुआ श्रमिक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी किसी तरह से अपने परिवार या स्वयं के भविष्य के लिए कोई आशा की किरण नहीं जगा पाते। मार-पिटाई खाने व अपनी जान तक देने के बाद भी किसी सरकार या राजनीतिक दलों की सहानुभूति का पात्र भी नहीं बन पाते। जैसा अभी हाल में एक बाल श्रमिक जो कि बिहार के मधुबनी का रहने वाला था, उसे उसके कारखाना मालिक ने पीट-पीटकर सिर्फ इसलिए मार डाला कि 17-18 घंटे काम करने के बाद 9 वर्षीय बच्चा मालिक द्वारा दिया गया टारगेट पूरा नहीं कर पाया था। उसी के साथ तीन अन्य बच्चों को तो किसी तरह साथियों ने मरने से बचा लिया मगर सज्जाद अली (बदला हुआ नाम) के शरीर पर पड़े निशान मालिकों द्वारा बच्चों पर जुल्म की कहानी बयां करने के लिए काफी है। जुल्म की यह दासतां राजधानी दिल्ली में कई वर्षों से चल रही थी और पुलिस को इसकी भनक तक न हो यह पुलिस की कार्यशैली पर एक प्रश्न चिह्न है क्योंकि भारत नगर थाना घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर है। मुक्ति आश्रम में पिछले कई वर्षो में ऐसे सैकड़ों मामले आए हैं जिनमें मां-बाप की नासमझी, गरीबी व मजबूरी का फायदा उठाकर बहला-फुसलाकर या फिर चुराकर उनके बच्चों को दिल्ली, मुम्बई, जयपुर व हैदराबाद आदि महानगरों में दलालों की मार्फत बेचा गया था। एक और बच्चे की कहानी का यहां उल्लेख करना चाहूंगा। कामिल (बदला हुआ नाम)। उम्र13 वर्ष। बिहार का रहने वाला है जो पिछले कई वर्षों से दिल्ली में जरी के कारखाने में काम कर रहा था। कामिल के पिताजी अंधे हैं। मां के बीमार पड़ने पर साहूकार का 40 हजार रुपया सिर पर चढ़ गया। ऐसे में कामिल कभी स्कूल नहीं जा सका। छोटी सी उम्र और जमाने भर का बोझ। इसी समय के लिए घात लगाए बैठा था एक दलाल। जिसने गरीब, लाचार, मजबूर मां- बाप को लालच के जाल में फंसाया और बच्चे को देश की राजधानी के सब्जबाग दिखाकर दिल्ली ले आया। फिर शुरू हुआ गुलामी का दुष्चक्र। घोर अंधेरे में मालिक की डरावनी आवाज में बच्चे को जगाया जाता और थमा दिए जाते औजार। सुबह 6 बजे से रात के 12-1 बजे तक काम, खाने कोई वक्त नहीं, सिर्फ और सिर्फ काम। बच्चे की नाजुक उंगलियां मशीनों की तरह चलने लगीं। अगल-बगल कौन रहता है, कौन आता-जाता है, इस सच से वह बेखबर था। न कभी खेलने को मिला और न घूमने को। बच्चे का जीवन एक छोटे से बदबूदार अंधेरे कमरे तक सिमटकर रह गया। एक साल कब पूरा हुआ, उसे पता भी नहीं चला। इस दौरान न तो बच्चे की कभी मां-बाप से बात हुई और न मुलाकात। पैसे के नाम पर सौ रुपया मेहनताना मिलता था। काम कम होने पर या गलती होने पर मार-पिटाई, गाली-गलौज तो जैसे उसकी नियति बन चुकी थी। मालिक को मतलब था तो सिर्फ ज्यादा से ज्यादा काम से। कामिल अब गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो चुका है और जीवन के लिए नये-नये सपने बुनते हुए पढ़िलखकर सामाजिक कार्यकर्ता बनना चाहता है। अब एक और बच्चे की कहानी उसी की जबानी बयां कर रहा हूं। ‘मेरा नाम रंजीत कुमार (बदला हुआ नाम) है। मेरी उम्र दस वर्ष है, मैं बिहार का रहने वाला हू। मेरे पिताजी राजमिस्त्री हैं जिन्हें कभी-कभार काम मिल जाता है। मेरी पांच बहनें हैं। मेरे पिताजी इतना पैसा नहीं कमा पाते कि घर का खर्च चल सके। लिहाजा घर का बड़ा बेटा होने पर घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। एक दिन एक आदमी (सेठ) मेरे घर आया और मेरे मां-बाप को कहा कि तुम्हारी पांच बेटियां हैं, इनकी शादी-ब्याह कैसे करोगे। तुम अपने बड़े बेटे को मेरे साथ दिल्ली भेज दो जहां वह मेरे पास रहेगा, अच्छे से काम कराऊंगा, फिर ये ढेर सारा पैसा कमाएगा। चूंकि सेठ गाड़ी से आया था उसका पहनावा भी अमीरों जैसा था। मेरे मां-बाप को उसने 1600 रुपये दिये और लालच में आकर मां-बाप ने मुझे उसके साथ दिल्ली भेज दिया। दिल्ली आकर तो जैसे मेरा बचपना कहीं खोता गया, क्योंकि सेठ सुबह पांच बजे मुझे बैग बनाने के काम पर लगा देता था और यह क्रम रात 12-1 बजे तक चलता था। इस दौरान मेरा सेठ हमेशा मेरे सामने छड़ी लेकर खड़ा रहता था। थकान होने या बीमार होने पर भी वह जरा सा रहम नहीं दिखाता था। मेरे हाथ सुबह से बराबर चलते रहते थे।’ रंजीत बताता है जब किसी बच्चे को स्कूल जाते हुए या खेलते हुए वह देखता तो उसका भी मन करता था। मगर वह तो गुलाम था, अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकता था। मुक्त होने के बाद रंजीत अब पढ़ाई-लिखाई करके पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहता है और अपने मालिक जैसे लोगों को सजा देना चाहता है। आज यह एक बड़ा सवाल है कि बाजार के उदारीकरण व आर्थिक नीतियों के आगे सबसे ज्यादा गरीब परिवार के बच्चे ही गुलामी को मजबूर होते हैं। महानगर की झोपड़ियों में तिल-तिलकर मरते, कूड़े के ढेर पर बैठकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते बच्चे आखिर कब तक यूं ही अपना तन-मन मारकर जीवन जीते रहेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हम सही मायनों में बच्चों को देश का भविष्य मानकर उनके लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा नहीं पहनाते बाल एवं बंधुआ मजदूरी नहीं रुकेगी। इंसानियत का समाजशास्त्र बचपन की सुरक्षा की गारंटी दे सकता है, खुले बाजार का अर्थशास्त्र कभी नहीं।
Thursday, May 19, 2011
दूसरों के विकास में बचपन झों कते बच्चे
जब हम बचपन बचाने की बात करते हैं तो निश्चित ही हमारा इशारा उन बच्चों की तरफ होता है जिनका बचपन छीना जा रहा है। जिनका वर्तमान, भविष्य, स्वास्थ्य, विकास की सम्भावनाएं आशाएं, इच्छाएं और सपने सभी चौपट किया जा रहा है, वह भी सिर्फ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की खातिर। देश में रोज-रोज तमाम तरह के घोटालों की र्चचा हो रही है। बड़े-बड़े रसूखदार लोग इन घोटालों में लिप्त होने के कारण कठघरे में हैं, और होने भी चाहिए। लेकिन ऐसे घोटाले जिन पर प्राय: किसी की नजर नहीं जाती वह है बच्चों की रोज की कमाई से इकट्ठा किया गया अरबों रुपयों का काला धन जो ऐसे ही मालिकों की जेब में जा रहा है। देश के किसी भी कोने में चले जाइए, आपको बाल श्रम के दर्शन बड़े आराम से हो जाएंगे। चाहे वह चाय ढाबा हो, जरी के कारखाने और आतिशबाजी बनाने की फैक्ट्री हो, या फिर अन्य कोई छोटी-मोटी यूनिट। सुबह पांच-छ: बजे से रात 12-1 बजे तक कोई छोटू अपना बचपन बेचता हुआ मिल जाएगा जिन्हें मजदूरी के नाम पर 10 से 50 रुपया हफ्ता मिलता है। सोचिए एक बच्चा 17-18 घंटे काम के बदले 50 रुपया हफ्ता पाता है जबकि वह वयस्क आदमी से दुगुना-तिगुना काम करता है और उसकी कमाई का सारा हिस्सा फैक्ट्री मालिक डकार जाता है। इतना ही नहीं गरीबी, लाचारी के मारे बाल-बंधुआ श्रमिक हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी किसी तरह से अपने परिवार या स्वयं के भविष्य के लिए कोई आशा की किरण नहीं जगा पाते। मार-पिटाई खाने व अपनी जान तक देने के बाद भी किसी सरकार या राजनीतिक दलों की सहानुभूति का पात्र भी नहीं बन पाते। जैसा अभी हाल में एक बाल श्रमिक जो कि बिहार के मधुबनी का रहने वाला था, उसे उसके कारखाना मालिक ने पीट-पीटकर सिर्फ इसलिए मार डाला कि 17-18 घंटे काम करने के बाद 9 वर्षीय बच्चा मालिक द्वारा दिया गया टारगेट पूरा नहीं कर पाया था। उसी के साथ तीन अन्य बच्चों को तो किसी तरह साथियों ने मरने से बचा लिया मगर सज्जाद अली (बदला हुआ नाम) के शरीर पर पड़े निशान मालिकों द्वारा बच्चों पर जुल्म की कहानी बयां करने के लिए काफी है। जुल्म की यह दासतां राजधानी दिल्ली में कई वर्षों से चल रही थी और पुलिस को इसकी भनक तक न हो यह पुलिस की कार्यशैली पर एक प्रश्न चिह्न है क्योंकि भारत नगर थाना घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर है। मुक्ति आश्रम में पिछले कई वर्षो में ऐसे सैकड़ों मामले आए हैं जिनमें मां-बाप की नासमझी, गरीबी व मजबूरी का फायदा उठाकर बहला-फुसलाकर या फिर चुराकर उनके बच्चों को दिल्ली, मुम्बई, जयपुर व हैदराबाद आदि महानगरों में दलालों की मार्फत बेचा गया था। एक और बच्चे की कहानी का यहां उल्लेख करना चाहूंगा। कामिल (बदला हुआ नाम)। उम्र13 वर्ष। बिहार का रहने वाला है जो पिछले कई वर्षों से दिल्ली में जरी के कारखाने में काम कर रहा था। कामिल के पिताजी अंधे हैं। मां के बीमार पड़ने पर साहूकार का 40 हजार रुपया सिर पर चढ़ गया। ऐसे में कामिल कभी स्कूल नहीं जा सका। छोटी सी उम्र और जमाने भर का बोझ। इसी समय के लिए घात लगाए बैठा था एक दलाल। जिसने गरीब, लाचार, मजबूर मां- बाप को लालच के जाल में फंसाया और बच्चे को देश की राजधानी के सब्जबाग दिखाकर दिल्ली ले आया। फिर शुरू हुआ गुलामी का दुष्चक्र। घोर अंधेरे में मालिक की डरावनी आवाज में बच्चे को जगाया जाता और थमा दिए जाते औजार। सुबह 6 बजे से रात के 12-1 बजे तक काम, खाने कोई वक्त नहीं, सिर्फ और सिर्फ काम। बच्चे की नाजुक उंगलियां मशीनों की तरह चलने लगीं। अगल-बगल कौन रहता है, कौन आता-जाता है, इस सच से वह बेखबर था। न कभी खेलने को मिला और न घूमने को। बच्चे का जीवन एक छोटे से बदबूदार अंधेरे कमरे तक सिमटकर रह गया। एक साल कब पूरा हुआ, उसे पता भी नहीं चला। इस दौरान न तो बच्चे की कभी मां-बाप से बात हुई और न मुलाकात। पैसे के नाम पर सौ रुपया मेहनताना मिलता था। काम कम होने पर या गलती होने पर मार-पिटाई, गाली-गलौज तो जैसे उसकी नियति बन चुकी थी। मालिक को मतलब था तो सिर्फ ज्यादा से ज्यादा काम से। कामिल अब गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो चुका है और जीवन के लिए नये-नये सपने बुनते हुए पढ़िलखकर सामाजिक कार्यकर्ता बनना चाहता है। अब एक और बच्चे की कहानी उसी की जबानी बयां कर रहा हूं। ‘मेरा नाम रंजीत कुमार (बदला हुआ नाम) है। मेरी उम्र दस वर्ष है, मैं बिहार का रहने वाला हू। मेरे पिताजी राजमिस्त्री हैं जिन्हें कभी-कभार काम मिल जाता है। मेरी पांच बहनें हैं। मेरे पिताजी इतना पैसा नहीं कमा पाते कि घर का खर्च चल सके। लिहाजा घर का बड़ा बेटा होने पर घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर है। एक दिन एक आदमी (सेठ) मेरे घर आया और मेरे मां-बाप को कहा कि तुम्हारी पांच बेटियां हैं, इनकी शादी-ब्याह कैसे करोगे। तुम अपने बड़े बेटे को मेरे साथ दिल्ली भेज दो जहां वह मेरे पास रहेगा, अच्छे से काम कराऊंगा, फिर ये ढेर सारा पैसा कमाएगा। चूंकि सेठ गाड़ी से आया था उसका पहनावा भी अमीरों जैसा था। मेरे मां-बाप को उसने 1600 रुपये दिये और लालच में आकर मां-बाप ने मुझे उसके साथ दिल्ली भेज दिया। दिल्ली आकर तो जैसे मेरा बचपना कहीं खोता गया, क्योंकि सेठ सुबह पांच बजे मुझे बैग बनाने के काम पर लगा देता था और यह क्रम रात 12-1 बजे तक चलता था। इस दौरान मेरा सेठ हमेशा मेरे सामने छड़ी लेकर खड़ा रहता था। थकान होने या बीमार होने पर भी वह जरा सा रहम नहीं दिखाता था। मेरे हाथ सुबह से बराबर चलते रहते थे।’ रंजीत बताता है जब किसी बच्चे को स्कूल जाते हुए या खेलते हुए वह देखता तो उसका भी मन करता था। मगर वह तो गुलाम था, अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकता था। मुक्त होने के बाद रंजीत अब पढ़ाई-लिखाई करके पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहता है और अपने मालिक जैसे लोगों को सजा देना चाहता है। आज यह एक बड़ा सवाल है कि बाजार के उदारीकरण व आर्थिक नीतियों के आगे सबसे ज्यादा गरीब परिवार के बच्चे ही गुलामी को मजबूर होते हैं। महानगर की झोपड़ियों में तिल-तिलकर मरते, कूड़े के ढेर पर बैठकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते बच्चे आखिर कब तक यूं ही अपना तन-मन मारकर जीवन जीते रहेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हम सही मायनों में बच्चों को देश का भविष्य मानकर उनके लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा नहीं पहनाते बाल एवं बंधुआ मजदूरी नहीं रुकेगी। इंसानियत का समाजशास्त्र बचपन की सुरक्षा की गारंटी दे सकता है, खुले बाजार का अर्थशास्त्र कभी नहीं।
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