Thursday, May 19, 2011

संगठित अपराध है बच्चों की गुमशुदगी


पहले यह सुनने में आता था कि फलां आदमी या बच्चा मेले में गया, गुम हो गया और नहीं मिला। परंतु वह कुछ समय या साल दो साल में मिल जाता था। वर्तमान में जो बच्चा किसी कारणवश रास्ता भूल जाता है, तो घर नहीं लौट पाता है। रास्ता भूलने के बाद वह पुलिस या किसी संस्था के हाथ लगता है तो उसे सरकारी या प्राइवेट होम में भेज दिया जाता है। बच्चा यदि ऐसे आदमी के हाथ लग गया, जो बाल व्यापार करने या कराने वाले समूह से सम्बंध रखता है तो वह बच्चे को आपराधिक कायरे में लगा देता है। वहां बच्चों को यह गिरोह निगरानी में रखकर कार्य कराता है। यदि गिरोह से सम्बंध नहीं रहा तो उसे किसी ढाबे वाले के हवाले कर देता है, उसके बदले कुछ पैसा लेता है। इस तरह के कई उदाहरण सामने आए हैं। पूर्व में मानव व्यापार आंशिक रूप से ही संगठित अपराधों में था किंतु अब मानव व्यापार विश्व-व्यापार का रूप ले चुका है। बाल मजदूरी व वेश्यावृत्ति कराने के लिए अधिक संख्या में छोटे- छोटे बच्चे-बच्चियों का अपहरण किया जा रहा है। यह संगठित अपराध में तब्दील हो चुका है। वजह सस्ती मजदूरी में घरेलू नौकर या अन्य औद्योगिक इकाइयों में बच्चों की बढ़ती मांग है। वेश्यावृत्ति का कारोबार भी बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इस कारोबार चलाने के लिए गरीब व असुरक्षित स्थानों पर रहने वाली बच्चियों को अगवा करके उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंका जा रहा है। इसके लिए अधिकतर कम उम्र की बच्चियों का अपहरण हो रहा है। अपहरण गिरोह के अलावा और कई तरह से किया जा रहा है। इसका खुलासा कुछ महीने पहले दिल्ली के सुल्तानपुरी थाने से दो महिलाओं के पकड़े जाने से हुआ। थाना नेब सराय से साध्वी गिरोह का पकड़ा जाना और ख्याला थाना अंतर्गत रैकेट का पर्दाफाश होना सिद्व कर रहा है कि दिल्ली में बच्चों को चुराने वाले गिरोह सक्रिय हैं। दिल्ली में सबसे ज्यादा गुमशुदगी दिल्ली में बच्चों के गुम होने या अपहरण से सम्बंधित मामले अधिक हैं। दिल्ली में प्रत्येक दिन 17 बच्चे गुम होते हैं जिसमें से 6 कभी भी नहीं मिलते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसकी एक रिपोर्ट के अनुसार चारों महानगरों में गुमशुदगी सम्बंधित मामलों में दिल्ली पहले स्थान पर है। आरटीआई के अंतर्गत प्राप्त सूचना के अनुसार जनवरी 2008 से अक्टूबर ’10 तक दिल्ली से 13,570 बच्चे गुम हुए और 1 जनवरी ’11 से 26 अप्रैल ’11 तक 550 बच्चे गुम हुए हैं। गुम हुए बच्चों में सर्वाधिक 12-19 वर्ष की लड़कियां हैं और सामान्यत: 0-19 वर्ष तक के लड़के व लड़कियां हैं। 90 प्रतिशत गुम हुए बच्चे झुग्गी-झोपड़ियों व स्लम के हैं। दिल्ली का उत्तरी-पूर्वी जिला गुमशुदा बच्चों के मामले में प्रथम स्थान पर है। 70 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के रहने वाले हैं। दिल्ली में गुम हुए कुल बच्चों में से 80 प्रतिशत पलायित लोगों के, 50 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से, 80 प्रतिशत एससी/एसटी और ओबीसी समुदाय से तथा 90 प्रतिशत बच्चे असंगठित क्षेतों में कार्य करने वाले मजदूरों के हैं। अपहरण की रिपोर्ट दर्ज नहीं समाज की धारणा है कि अपहरण, अमीरों के बच्चों का होता है न कि गरीब का। साथ ही यह भी कि गरीब का बच्चा भूख के कारण घर से भाग जाता है फिर वापस आ जाएगा। यही सोच गुमशुदा बच्चों के मुद्दे की सच्चाई को उजागर होने में समस्या पैदा करती है। इससे मिलती-जुलती सोच पुलिस-प्रशासन की भी है, लिहाजा अपहर्ता आसानी से बच निकलता है। गुमशुदा बच्चों के माता-पिता कहते रह जाते हैं कि उसके बच्चे को फलां आदमी ले गया है लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती। बहुतायत मामलों में तो वह एफआईआर भी दर्ज नहीं करती। दिल्ली के बाहरी इलाकों, स्लम, झुग्गी-झोपड़ी और असुरक्षित जगहों से बच्चे खेलते हुए या स्कूल जाते हुए गुम हो जाते हैं या अगवा कर लिए जाते हैं। इन जगहों पर रहने वाले ज्यादातर लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर से आए हुए हैं और अशिक्षित भी हैं। इनके मन में यह धारणा रहती है कि बच्चा कहीं खेल रहा होगा और शाम तक आ जाएगा। इस कारण से खोजने में देरी हो जाती है और गुम हुआ या अपहरण किया हुआ बच्चा आसानी से घर से दूर या रेलवे स्टेशन तक पहुंच जाता है। बाल तस्करी अपहृत बच्चों दिल्ली या देश के अन्य शहरों व गांवों से गुम हो रहे या अपहृत बच्चों को बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति, भीख मंगवाने व दूसरे कामों में लगाया जाता है। यह प्रक्रिया मानव व्यापार का ही अंग है। बच्चों का गुम होना या अपहरण करना बाल तस्करी या बाल व्यापार है। अपहृत बच्चों को बाल व्यापार के मकसद से लाया जाता है जबकि गुम हुआ या घर से नाराज होकर बच्चा घर से बाहर गुमराह होकर बाल तस्करों के हाथों में लग जाता है। इस तरह के बहुत से बच्चे जो घर से सम्पन्न हैं और अपने परिवार व रिश्तेदारों के फोन नम्बर या पता जानते भी हैं, वे भी घर वापस नहीं आते हैं। इस मामले में गिरोहों के पर्दाफाश होने से ऐसे उदाहरण सामने आए हैं। गिरोहों का उजागर होना इस बात की पुष्टि कर रहा है कि बाल व्यापार एक संगठित अपराध है। गुमशुदगी रोकने के उपाय बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि जिन इलाकों से बच्चे चुराए जा रहे हैं वहां के थाना अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाए। दूसरा, स्थानीय सामाजिक संगठनों, स्कूल के अध्यापकों और सांस्कृतिक संस्थाओं का भी दायित्व है कि वे बच्चों और बस्तियों के लोगों को सचेत करें कि बच्चों को चुराने वाले गिरोहों से कैसे बचा जा सकता है क्योंकि बच्चे अपने आप गुम नहीं हो रहे बल्कि उन्हें कोई चुरा रहा है। तीसरा, बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं और राष्ट्रीय तथा प्रांतीय स्तरों पर ऐसी एजेंसियां बनाई जाएं जो पुलिस द्वारा की गई कार्रवाइयों पर निगरानी रखें और सुनिश्चित करें कि प्रत्येक मामले में स्थानीय पुलिस ईमानदारी और तत्परता से कार्रवाई करे।



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