Thursday, May 19, 2011

बचपन के साथ भद्दा मजाक


पिछले महीने देश की राजधानी दिल्ली में एक दस वर्षीय बाल बंधुआ मजदूर मोईन की नृशंस हत्या ने तथाकथित सभ्य समाज के मुंह पर एक और करारा तमाचा जड़ा है। बिहार के मधुबनी जिले के लहरियागंज गांव से 8 से 10 साल के बीच की उम्र के चार बच्चों को एक दलाल समीमुल्लाह की मार्फत, अच्छी जिंदगी और पढ़ाई का लालच देकर दिल्ली लाया गया। लेकिन यहां उन्हें मदरसे के बजाय एक कारखाने में बंदी बनाने के काम में लगा दिया गया। उन बच्चों ने यह काम कभी देखा भी नहीं था, लिहाजा काम के दौरान उनसे गलतियां होना स्वाभाविक था। इस पर मालिक कलीमुल्लाह, बच्चों को बुरी तरह से पीटता था। गर्म लोहे से दाग देना, पंखे पर लटकाकर घुमा देना, दीवारों पर पटक-पटक कर मारना उसके सजा देने के तरीके थे। ऐसी ही सजा के दौरान एक दिन मासूम मोईन की मौत हो गयी।
मीडिया के दबाव में हुई गिरफ्तारी
आजादपुर कब्रिस्तान के बाहर मजदूरी करने वाले एक नौजवान रईस की नजर आनन-फानन में कब्र खोदकर गाड़ी जा रही एक बच्चे की लहू-लुहान लाश पर पड़ी। यह देखकर रईस को शक हुआ। लाश को लेकर आने वाले लोगों से जब उसने पूछताछ की तो पहले तो उन्होंने उसे धमकाने की कोशिश की बाद में खुद भाग खड़े हुए। रईस ने पुलिस और बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता रिजवान को फोन कर दिया। इसके बाद मामला तूल पकड़ता गया। मीडिया और सामाजिक संगठनों के दबाव में आकर आखिरकार पुलिस ने दलाल और मालिक को गिरफ्तार कर लिया। मोईन की मां हादसे के पांच दिनों बाद दिल्ली पहुंच सकी। तब तक बच्चे की लाश बिना पोस्टमार्टम के शवगृह में पड़ी रही। मोईन की मां नजमा, दादी और नानी की मौजूदगी में कुछ लोगों के साथ मैं और मेरी पत्नी ने उस मासूम के शव को कब्रिस्तान ले जाकर दफनाया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र तथा तेजी से अधिक विकास कर रहे देश के लिए एक गुलाम बाल मजदूर की हत्या को साधारण घटना नहीं माना जा सकता। फूल से कोमल बच्चे के जिस्म में लगा एक-एक घाव जैसे मेरी अंतरात्मा में कई चिरस्थायी घाव छोड़ गया। उसके जनाजे का बोझ जैसे सदियों से चले आ रहे शोषण और अन्याय के शिकार हुए लाखों, करोड़ों बच्चों के वजन की तरह अब भी मेरे कंधों को तोड़ रहा है। मोईन के जिस्म में लगी चोटें आतंकवादी हमले के कारण हमारी संसद पर लगी चोटों से कम नहीं। ऐसा लगा जैसे बच्चे की पीठ के नहीं, बल्कि हमारे संविधान के चिथड़े कर दिये गये हों। सर्वोच्च न्यायालय पर जैसे कोई कालिख पोत दी गयी हो या मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर व गुरुद्वारे भरभराकर अचानक ढह गये हों।
कहां है मानवीय संवेदना
मालिक द्वारा हत्या का शिकार मोईन कोई अकेला बच्चा नहीं है। मुझे इससे पहले भी कई बार उन बच्चियों एवं बच्चों की अर्थियां उठानी पड़ी हैं जिन्हें खूबसूरत सपने दिखाकर या मां-बाप को चंद रुपयों का लालच देकर, पहाड़ों, जंगलों में बसे दूर-दराज के गांवों से शहरों में लाया गया था। किंतु जंगली जानवरों के बीच बिना किसी खतरे के पली-पुसी उन आदिवासी बच्चियों की इज्जत-आबरू ही नहीं, शहरी जानवर तो उनका जिस्म तक निगल गये। कई बार बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर डाली गयी या फिर गुलामी में यौन शोषण की शिकार होकर वे खुदकुशी करने को विवश हो गयीं। एक ओर तो मज़हबों, संस्कृतियों, तीर्थो, धर्म-गुरुओं और धर्म-स्थलों के सबसे बड़े घर भारत में बच्चों को भगवान का रूप, खुदा का नूर या ईश्वर का सबसे खूबसूरत तोहफा कहा जाता है। किंतु दूसरी ओर शायद ही ऐसा कोई अपराध हो जो बच्चों के साथ न किया जाता हो। इनमें भी सबसे बड़ी शिकार लड़कियां होती हैं। हाल ही में प्रकाशित जनगणना की रिपोर्ट में लड़कियों की लगातार घट रही संख्या सबसे बड़ी चिंता का विषय है। स्पष्ट है कि बच्चियों के प्रति अपराध उनके जन्म लेने से पहले ही भूण हत्या के रूप में शुरू हो जाते हैं।
47 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार
इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी कि हमारे देश में पांच वर्ष तक की आयु के 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सरकार खुद मानती है कि दो तिहाई से अधिक बच्चों को किसी न किसी प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़ता है। एक अन्य सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक देश के 53 फीसद बच्चे किसी न किसी प्रकार के यौन अत्याचार के शिकार होते हैं। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 6 करोड़ और सरकारी हिसाब से लगभग सवा करोड़ बच्चे पूर्णकालिक बाल मजदूरी करते हैं। इनमें लगभग एक करोड़ बच्चे बंधुआ मजदूर बने हुए हैं। यूनीसेफ तथा दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का मानना है कि देश में फुटपाथी बच्चों की संख्या 1.8 करोड़ है। पिछले वर्ष हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन से यह चौकाने वाला तथ्य सामने आया कि 5 से 12 वर्ष के बीच के फुटपाथी बच्चों में 66.8 प्रतिशत शारीरिक हिंसा और 55 प्रतिशत बच्चे यौन उत्पीड़न झेलने को मजबूर होते हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार लगभग 47 फीसद नाबालिग लड़कियों की शादी करा दी जाती है। माफिया द्वारा 3 लाख से ज्यादा बच्चों को अपाहिज बनाकर उनसे जबरिया भीख मंगाने का धंधा कराया जा रहा है। अपराधी गिरोहों द्वारा हर साल देश भर से 60 हजार बच्चे गायब कर दिए जाते हैं। चूंकि ये बच्चे गरीबों के होते हैं अत: सरकार व पुलिस को इनकी कोई फिक्र नहीं। यूं तो ये सभी आंकड़े मात्र संख्याएं भर हैं, किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि हर एक संख्या के पीछे बुझा हुआ ही सही, एक चेहरा, एक धड़कता हुआ दिल और एक कुचली गई आत्मा है। कैसे लेंगे चैन की सांस बाल श्रम के अभिशाप को ही लें। 6 करोड़ बच्चों को सस्ते श्रम के लालच में अशिक्षा, बीमारियों व दासता की गहरी खाई में धकेलकर जो समाज समृद्धि और विकास के सपने संजो रहा है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में मानवीय गरिमा से वंचित रहकर पनपने वाले नागरिक समृद्धि के टापुओं पर बैठे लोगों को क्या कभी चैन की सांस लेने देंगे? ये बच्चे गरीब माता-पिता के बच्चे हैं, यह तय है। किंतु ये माता-पिता इसलिए गरीब हैं कि क्योंकि या तो वे बेरोजगार हैं या उन्हें साल भर में 50-60 दिन से ज्यादा रोजगार नहीं मिलता। उन्हें सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती। क्योंकि उनकी जगह उनके बच्चों को सस्ते या मुफ्त मजदूर की तरह काम पर लगा दिया जाता है। साथ ही बच्चे मालिकों के लिए किसी प्रकार की चुनौती भी नहीं होते। इसीलिए आज देश में साढ़े छ: करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं, जिनमें अधिकतर इन्हीं बच्चों के अभिभावक हैं।
47 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार
बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों के पीछे कुछ बुनियादी कारण जिम्मेदार हैं। पहला है, बचपन समर्थक और बाल अधिकार का सम्मान करने वाली मानसिकता की कमी। दूसरा, सामाजिक संवेदना और सरोकार का अभाव। तीसरा, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा ईमानदारी की कमी। चौथा, बच्चों के अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक संसाधन मुहैया कराने में कोताही। पांचवां, बच्चों की हिफाजत के लिए बने कानूनों के रखवालों की कोई भी जवाबदेही का न होना तथा छठा है, बच्चों के बारे में एक स्पष्ट नैतिकता का अभाव।
गरीब बच्चों के बारे में मानसिकता में खोट
गरीब बच्चों के मामले में हमारी मानसिकता दो प्रकार की है। यदि आप कथित तौर पर भले और संवेदनशील हैं, तो आप अभावग्रस्त बच्चों के ऊपर दया दिखाते या उन पर कोई उपकार करते हैं। परंतु दूसरी ओर ऐसे व्यावहारिक लोग हैं जो अपनी सम्पन्नता बढ़ाने, सुविधाएं हासिल करने और मौजमस्ती में यकीन रखते हैं। ऐसे लोग सस्ते मजदूरों के रूप में बच्चों के श्रम का शोषण, अपनी हवस मिटाने के लिए उनका यौन शोषण अथवा कुत्सित रौब-रुतबे के लिए बच्चों पर हिंसा का सहारा लेते हैं। हर बच्चा नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के साथ जन्मता है। किंतु उनके अधिकारों का सम्मान तथा पालना करते हुए बच्चों के प्रति संवेदनात्मक व मित्रतापूर्ण रिश्ता कितने लोग कायम कर पाते हैं?
बुद्धि-विलास का जरिया बना बाल अधिकार
आज बाल अधिकार तथाकथित सिविल सोसायटीके बीच बुद्धि-विलास, र्चचा-परिर्चचा के विषय अथवा सरकारी महकमों की परियोजना भर बन कर रह गये हैं। बच्चों के प्रति हम कैसे सोचते हैं, उनके साथ कैसे मित्रता और इज्जत का व्यवहार करते हैं, उनका विकास, संरक्षण और सम्मान हमारी निजी, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में कैसे ढल जाता है, इस सब पर गहरे मंथन और अमल की जरूरत है। हमें बाल मित्र समाज की रचना के लिए बाल मित्र सोच और जीवनर्चया पर आधारित बाल मित्र संस्कृति निर्मित करनी होगी।
सफेद हाथी बने विभिन्न राष्ट्रीय आयोग
देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों की हिफाजत, देखभाल, विकास और शिक्षा की गारंटी देता है। बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, शिक्षा और बाल अधिकारों से सम्बंधित अनेक कानून बने हुए हैं। किंतु इन पर अमल करने की किसी की भी जवाबदेही नहीं है। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय व राज्य आयोग बनाए गए हैं। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि ढिंढोरा पीटने वाले राष्ट्रीय आयोग को पिछले साल भर में देश भर से बच्चों के उत्पीड़न की कुल 75 शिकायतें ही मिली। इनमें से दिल्ली से 13 और उप्र से 6 शिकायतें थीं। इनमें भी ज्यादातर शिकायतें स्कूली छात्रों के साथ हुई मारपीट की थीं। सफेद हाथी बने इन आयोगों से भला कौन पूछे कि इतने भारी भरकम बजट की कीमत पर इन्होंने कितने बच्चों को उत्पीड़न से बचाया? हमारी जानकारी में तो एक भी बच्चे को बंधुआ मजदूरी से छुटकारा दिलाकर पुनर्वासित करने की कोई घटना नहीं है। न ही बलात्कार, अपाहिज बनाकर जबरिया भीख मंगवाने, बाल वेश्यावृत्ति की किसी घटना पर उनका ध्यान जाता है, इंसाफ दिलाना तो दूर की बात है।
बनानी होगी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति
आज जरूरत है एक जबर्दस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की। प्रभावशाली कानून बनाकर उनके पालना की जवाबदेही सुनिश्चित करने की। साथ ही जरूरत है विभिन्न विभागों और मंत्रालयों के बीच तालमेल बनाकर बच्चों को केंद्र में रखकर चलने वाली नई विकास नीति, अर्थनीति और राजनीति की। बाल अधिकारों के प्रति सभी प्रचार माध्यमों, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया से जागरूकता फैलाने की। जरूरत है लाखों की भीड़ जुटाने वाले हमारे धर्मगुरुओं, संत-महात्माओं में बचपन के प्रति सम्मान और संवेदना की और जरूरत है हम और आप जैसे लोगों में एक बुनियादी नैतिकता की। लेखक बाल श्रम विरोधी आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।


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