रामू, छोटू, लालू, कालू, मुन्ना, पप्पू, राजू, बहादुर, रानी, मुन्नी, चुटकी आदि पढ़ने और सुनने में दुलार भरे नाम लगते हैं। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप और विशेषकर हमारे देश के लोग इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि इन नामों से उन बच्चों को पुकारा जाता है जो घरों, कारखानों, खदानों, गैराजों, दुकानों, ढाबों आदि में अपना बचपन खाक में मिला रहे होते हैं। इन बच्चों के असली नाम क्या हैं यह जानने की किसी को फुर्सत नहीं है क्योंकि ये बच्चे ऐसी मशीनें हैं जो बहुत कम खर्च और बिना किसी हीलो-हुज्जत के काम में लगे रहते हैं। इनको बदलने में भी कोई खर्च नहीं होता। देश का सभ्य कहा जाने वाला नागरिक समाज एक तरफ तो किसी जानवर के सड़कपर कुचल जाने से विचलित हो उठता है और घर की पहली रोटी घी लगाकर गइया को खिलाकर पुण्य कमाता है, दूसरी तरफ यही समाज इस ओर आंखें मूंदे रहने में ही अपनी भलाई देखता है कि प्यारे- प्यारे नामों के कितने बच्चे लगातार मारपीट व धौंस का शिकार होते हैं और जूठन खाकर, उतरन पहनकर जिंदगी बिता रहे होते हैं। यह सच है कि बच्चों पर हिंसा पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर श्राप है लेकिन जितनी बेलगाम यह भारत में है उसको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। राष्ट्रसंघ के अध्ययन के मुताबिक 18 साल तक की उम्र के बच्चों को दुनिया के लगभग हर भाग में 2 स्तरों पर हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। एक है घरवालों और रिश्तेदारों द्वारा ढाया जा रहा जुर्म और दूसरा है समाज एवं राज्य की अन्य संस्थाओं द्वारा किया जा रहा अत्याचार व शोषण। हमारा देश विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है पर यहां बच्चों के खिलाफ हिंसा किस तरह बेलगाम हो चुकी है, इसका अंदाजा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ऊपर प्रदर्शित (2007-2009 के) आंकड़ों से लगाया जा सकता है। ये आंकड़े सच्चाई का अंश मात्र हैं। सामाजिक शोधकर्ता और कार्यकर्ता जो सामाजिक संरचना से वाकिफ हैं तथा पुलिसतंत्र किस तरह से काम करता है, उसकी जानकारी रखते हैं, इस बात को लगातार रेखांकित करते रहते हैं कि जो मामले थानों तक पहुंचते हैं वे वास्तविक घटनाओं का छोटा सा भाग ही होते हैं। मर्यादा व इज्जत के नाम पर या पुलिस को फजीहत से बचाने के लिए ऐसे ज्यादातर मामले दबा दिये जाते हैं। बावजूद इसके, जो तथ्य हैं उनसे यह स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि (सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी) बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं। शर्मनाक पहलू यह है कि जो मामले अदालत तक पहुंचते भी हैं, उनमें सजा का अनुपात लगभग एक तिहाई ही है। बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का शर्मनाक पहलू यह भी है कि महानगर जो विकास, सभ्यता व खुशहाली के केंद्र माने जाते हैं, बच्चों के खिलाफ हिंसा के भी केंद्र बन गए हैं। दिल्ली इस मामले में भी आगे है। पूरे देश में एक लाख की आबादी में बच्चों के खिलाफ हिंसा की दो वारदातें हो रही हैं तो दिल्ली में यह अनुपात एक लाख की आबादी पर 16 का है। हालांकि दिल्ली शहर के बहुत पास निठारी में किस तरह गरीबों के बच्चों पर यौन हिंसा की गई और उन्हें मौत के घाट उतारा गया, ऐसे उदाहरण विदेशों में भी मिलते हैं। बच्चों के विरुद्ध हिंसा में असामाजिक तत्व ही हैं ऐसा नहीं है। सम्भ्रांत परिवार, अफसरशाही, जज सभी इसमें शामिल हैं। उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में ऐसे बच्चे जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है और जो घरों में, खदानों में, कालीन बुनने, चाय की दुकानों, गैराजों और दुकानों आदि पर काम कर रहे हैं, की संख्या लगभग सवा करोड़ है। हालांकि एनजीओ के अनुसार असली संख्या इससे पांच गुना ज्यादा है। ये बच्चे कितना दर्दनाक और जोखिमभरा जीवन जीते हैं और उनका क्या अंजाम होता है, इस बाबत हाल ही में मोईन की हत्या एक खुला चिट्ठा बयान करती है। उत्तर-पूर्व के राज्य मेघालय में जहां कानून और संविधान का शासन है-निजी मिल्कयत वाली, चूहों के बिलों सरीखी (जिन्हें अंग्रेजी में- रैट माइंस कहा जाता है) कोयला खदानों में असम, बिहार, झारखंड और नेपाल, बांग्लादेश से लाए गए पांच से 18 साल की उम्र के 70 हजार से ज्यादा बच्चे अपने जीवन को विनाश की ओर ले जा रहे हैं। इसकी दर्दनाक दास्तां एक अंग्रेजी पत्रिका ने हाल ही में तस्वीरों के साथ प्रस्तुत की है। गैर कानूनी तौर पर चलाई जा रही इन खदानों के मामलों में केंद्र सरकार के एक जल संसाधन राज्यमंत्री भी शामिल हैं। राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस मुखिया और राज्य के खदान मंत्रालय के सचिव को इस बात की जानकारी नहीं है कि इन खदानों में कितने बच्चे काम कर रहे हैं और कितने मारे जा चुके हैं। बच्चों से खतरनाक काम कराये जाने के खिलाफ कानून 1986 में बनाया गया था। उनसे घरों में काम कराए जाने के खिलाफ भी कानून 2006 में बनाया गया पर राज्य इन कानूनों को लेकर कितना संजीदा है, अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आजतक केवल 7 हजार बच्चों को ही इस तरह के जोखिम भरे कामों से मुक्त कराया गया है। मामला बहुत साफ है। राज्य और उसका तंत्र जिसमें न्याय पालिका भी शामिल है, इस भयावह स्थिति से आंख मूंदे है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि ये बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं और इनका कोई वोट बैंक नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ऐसे गिरोह सक्रिय हैं जिनके तार बड़े पैमाने पर बच्चों की तस्करी कर रहे अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से जुड़े हैं। ये भी सरकारी आंकड़ा ही है कि देश भर से हर साल लगभग 55 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं। इनमें से कोई 15 हजार तो गुमशुदा ही रह जाते हैं। इन बच्चों का प्रयोग सेक्स उद्योग और अंगों की तस्करी के लिए भी किया जाता है। बच्चों की शारीरिक सुरक्षा के अतिरिक्त एक और क्षेत्र जिसमें हमारा सभ्य समाज और राज्य पंगु दिखता है, यह है कि राष्ट्रीय बजट में इन पर किया जाने वाला खर्च लगातार कम हो रहा है। 2008-2009 के बजट में पूरे बजट का 5.28 फीसद बच्चों के लिए आरक्षित किया गया था तो 2009-10 के बजट में यह घटकर 4.32 फीसद रह गया। इन हालात में किसके सामने अपना दर्द बयान करे और कौन उनकी समस्याओं का निदान करेगा इस पर हमारे सम्भ्रांत समाज की एक राष्ट्रीय चुप्पी है। बच्चों की दुर्दशा के बारे में एक और दु:ख है जिसे बांटा जाना जरूरी है। संत, मौलवी और ज्ञानी ये बताते नहीं थकते कि बच्चे भगवान का ही रूप होते हैं, वे खुदा के जलवा हैं। पर जैसा कि पुरानी हिंदी फिल्म की बोल है- ‘आसमां पर है खुदा और जमीन पर हैं हम-आजकल वो इस तरफ देखता है कम।’ यहां भी बच्चों के हाथ निराशा ही लगी है।
Thursday, May 19, 2011
सभ्य-सम्भ्रांत समाज की राष्ट्रीय चुप्पी
रामू, छोटू, लालू, कालू, मुन्ना, पप्पू, राजू, बहादुर, रानी, मुन्नी, चुटकी आदि पढ़ने और सुनने में दुलार भरे नाम लगते हैं। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप और विशेषकर हमारे देश के लोग इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि इन नामों से उन बच्चों को पुकारा जाता है जो घरों, कारखानों, खदानों, गैराजों, दुकानों, ढाबों आदि में अपना बचपन खाक में मिला रहे होते हैं। इन बच्चों के असली नाम क्या हैं यह जानने की किसी को फुर्सत नहीं है क्योंकि ये बच्चे ऐसी मशीनें हैं जो बहुत कम खर्च और बिना किसी हीलो-हुज्जत के काम में लगे रहते हैं। इनको बदलने में भी कोई खर्च नहीं होता। देश का सभ्य कहा जाने वाला नागरिक समाज एक तरफ तो किसी जानवर के सड़कपर कुचल जाने से विचलित हो उठता है और घर की पहली रोटी घी लगाकर गइया को खिलाकर पुण्य कमाता है, दूसरी तरफ यही समाज इस ओर आंखें मूंदे रहने में ही अपनी भलाई देखता है कि प्यारे- प्यारे नामों के कितने बच्चे लगातार मारपीट व धौंस का शिकार होते हैं और जूठन खाकर, उतरन पहनकर जिंदगी बिता रहे होते हैं। यह सच है कि बच्चों पर हिंसा पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर श्राप है लेकिन जितनी बेलगाम यह भारत में है उसको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। राष्ट्रसंघ के अध्ययन के मुताबिक 18 साल तक की उम्र के बच्चों को दुनिया के लगभग हर भाग में 2 स्तरों पर हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। एक है घरवालों और रिश्तेदारों द्वारा ढाया जा रहा जुर्म और दूसरा है समाज एवं राज्य की अन्य संस्थाओं द्वारा किया जा रहा अत्याचार व शोषण। हमारा देश विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है पर यहां बच्चों के खिलाफ हिंसा किस तरह बेलगाम हो चुकी है, इसका अंदाजा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ऊपर प्रदर्शित (2007-2009 के) आंकड़ों से लगाया जा सकता है। ये आंकड़े सच्चाई का अंश मात्र हैं। सामाजिक शोधकर्ता और कार्यकर्ता जो सामाजिक संरचना से वाकिफ हैं तथा पुलिसतंत्र किस तरह से काम करता है, उसकी जानकारी रखते हैं, इस बात को लगातार रेखांकित करते रहते हैं कि जो मामले थानों तक पहुंचते हैं वे वास्तविक घटनाओं का छोटा सा भाग ही होते हैं। मर्यादा व इज्जत के नाम पर या पुलिस को फजीहत से बचाने के लिए ऐसे ज्यादातर मामले दबा दिये जाते हैं। बावजूद इसके, जो तथ्य हैं उनसे यह स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि (सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी) बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं। शर्मनाक पहलू यह है कि जो मामले अदालत तक पहुंचते भी हैं, उनमें सजा का अनुपात लगभग एक तिहाई ही है। बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का शर्मनाक पहलू यह भी है कि महानगर जो विकास, सभ्यता व खुशहाली के केंद्र माने जाते हैं, बच्चों के खिलाफ हिंसा के भी केंद्र बन गए हैं। दिल्ली इस मामले में भी आगे है। पूरे देश में एक लाख की आबादी में बच्चों के खिलाफ हिंसा की दो वारदातें हो रही हैं तो दिल्ली में यह अनुपात एक लाख की आबादी पर 16 का है। हालांकि दिल्ली शहर के बहुत पास निठारी में किस तरह गरीबों के बच्चों पर यौन हिंसा की गई और उन्हें मौत के घाट उतारा गया, ऐसे उदाहरण विदेशों में भी मिलते हैं। बच्चों के विरुद्ध हिंसा में असामाजिक तत्व ही हैं ऐसा नहीं है। सम्भ्रांत परिवार, अफसरशाही, जज सभी इसमें शामिल हैं। उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में ऐसे बच्चे जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है और जो घरों में, खदानों में, कालीन बुनने, चाय की दुकानों, गैराजों और दुकानों आदि पर काम कर रहे हैं, की संख्या लगभग सवा करोड़ है। हालांकि एनजीओ के अनुसार असली संख्या इससे पांच गुना ज्यादा है। ये बच्चे कितना दर्दनाक और जोखिमभरा जीवन जीते हैं और उनका क्या अंजाम होता है, इस बाबत हाल ही में मोईन की हत्या एक खुला चिट्ठा बयान करती है। उत्तर-पूर्व के राज्य मेघालय में जहां कानून और संविधान का शासन है-निजी मिल्कयत वाली, चूहों के बिलों सरीखी (जिन्हें अंग्रेजी में- रैट माइंस कहा जाता है) कोयला खदानों में असम, बिहार, झारखंड और नेपाल, बांग्लादेश से लाए गए पांच से 18 साल की उम्र के 70 हजार से ज्यादा बच्चे अपने जीवन को विनाश की ओर ले जा रहे हैं। इसकी दर्दनाक दास्तां एक अंग्रेजी पत्रिका ने हाल ही में तस्वीरों के साथ प्रस्तुत की है। गैर कानूनी तौर पर चलाई जा रही इन खदानों के मामलों में केंद्र सरकार के एक जल संसाधन राज्यमंत्री भी शामिल हैं। राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस मुखिया और राज्य के खदान मंत्रालय के सचिव को इस बात की जानकारी नहीं है कि इन खदानों में कितने बच्चे काम कर रहे हैं और कितने मारे जा चुके हैं। बच्चों से खतरनाक काम कराये जाने के खिलाफ कानून 1986 में बनाया गया था। उनसे घरों में काम कराए जाने के खिलाफ भी कानून 2006 में बनाया गया पर राज्य इन कानूनों को लेकर कितना संजीदा है, अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आजतक केवल 7 हजार बच्चों को ही इस तरह के जोखिम भरे कामों से मुक्त कराया गया है। मामला बहुत साफ है। राज्य और उसका तंत्र जिसमें न्याय पालिका भी शामिल है, इस भयावह स्थिति से आंख मूंदे है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि ये बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं और इनका कोई वोट बैंक नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ऐसे गिरोह सक्रिय हैं जिनके तार बड़े पैमाने पर बच्चों की तस्करी कर रहे अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से जुड़े हैं। ये भी सरकारी आंकड़ा ही है कि देश भर से हर साल लगभग 55 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं। इनमें से कोई 15 हजार तो गुमशुदा ही रह जाते हैं। इन बच्चों का प्रयोग सेक्स उद्योग और अंगों की तस्करी के लिए भी किया जाता है। बच्चों की शारीरिक सुरक्षा के अतिरिक्त एक और क्षेत्र जिसमें हमारा सभ्य समाज और राज्य पंगु दिखता है, यह है कि राष्ट्रीय बजट में इन पर किया जाने वाला खर्च लगातार कम हो रहा है। 2008-2009 के बजट में पूरे बजट का 5.28 फीसद बच्चों के लिए आरक्षित किया गया था तो 2009-10 के बजट में यह घटकर 4.32 फीसद रह गया। इन हालात में किसके सामने अपना दर्द बयान करे और कौन उनकी समस्याओं का निदान करेगा इस पर हमारे सम्भ्रांत समाज की एक राष्ट्रीय चुप्पी है। बच्चों की दुर्दशा के बारे में एक और दु:ख है जिसे बांटा जाना जरूरी है। संत, मौलवी और ज्ञानी ये बताते नहीं थकते कि बच्चे भगवान का ही रूप होते हैं, वे खुदा के जलवा हैं। पर जैसा कि पुरानी हिंदी फिल्म की बोल है- ‘आसमां पर है खुदा और जमीन पर हैं हम-आजकल वो इस तरफ देखता है कम।’ यहां भी बच्चों के हाथ निराशा ही लगी है।
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