Thursday, May 19, 2011

बाल अत्याचार के मुकाबले सूचना का अधिकार


जंगलों में होने वाले अवैध कटान, सीलिंग, बंजर और वहां की जमीन पर अवैध कब्जे तथा गरीबों पर होने वाले जुल्म की शिकायतें लगातार होती रही हैं। ऐसी शिकायतों के बंडल के बंडल अधिकारियों के तबादले के बाद उनके दफ्तरों में ही लुप्त होते रहे। यह जरूर रहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और भुक्तभोगियों द्वारा दौड़-धूप करने पर कुछ मामलों का निदान निकल आता था पर शेष का लिखित उत्तर देने की जहमत किसी अधिकारी ने नहीं उठाई इसलिए कि यह उनकी बाध्यता नहीं थी। लेकिन सूचना अधिकार अधिनियम 2005 लागू होने के बाद स्थिति अब बदल चुकी है। बच्चों पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में भी इस कानून के लागू होने से पारदर्शिता आयी है। यदि यह कानून न बनता तो शायद यह भी पता न चलता कि हरियाणा में कुल ईट-भट्ठों की संख्या 1993 है जिनमें से अनिवार्यत: फैक्ट्री एक्ट, 1948 के तहत पंजीकृत होने वाले ईट-भट्ठों की संख्या मात्र 18 है और औसतन एक ईट-भट्ठे में 61 मजदूर काम करते हैं जिनमें बड़ी संख्या में बाल मजदूर भी शामिल हैं।
आरटीआई ने बदली तस्वीर
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार यह भी पता चला कि हरियाणा के 174 ईट- भट्ठे बिना मजदूर के तथा 75 ईट भट्ठों में मात्र एक मजदूर काम करता है जबकि 90 प्रतिशत ईट भट्ठों में 19 से कम मजदूर कार्य करते हैं। असलियत में यह पता चला कि इन भट्ठों में बिहार तथा उत्तर प्रदेश से बाल तस्करी के माध्यम से लाये गये 1000 से ज्यादा बच्चे काम करते हैं। सूचना के अभाव में पहले जहां कुछ भी नहीं किया जा सकता था, अब इन बच्चों के लिए कुछ किया जा सकता है। फिलहाल वहां आश्वस्त होने की बात यही है कि सारे मामलों की उच्च स्तरीय जांच कराई जा रही है। एक बात और हुई कि पाली क्रशर जोन में जहां श्रमिकों के बच्चों के लिए पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी, सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पत्र व्यवहार करने से 2 स्कूल खुल गए, जबकि मांग पांच स्कूलों की थी। इस अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना से यह भी स्पष्ट हुआ कि हरियाणा सरकार का रवैया बंधुआ मजदूरों के मामले में अत्यधिक अड़ियल है और वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा अदालती आदेशों पर भी लीपा-पोती करने में जी-जान से जुटी है जिसके चलते मजदूर तो आर्थिक संकट से जूझ ही रहे हैं उन के बच्चे भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं।
उजागर हुई सरकार की विफलता
इस अधिनियम में दिल्ली के श्रम विभाग की विफलताओं को भी खूब उजागर किया। पंजीकरण की अधिसूचना जारी होने के वर्षों बाद भी यहां के 80 प्रतिशत कारखानों और 90 प्रतिशत दुकानों तथा प्रतिष्ठानों का पंजीकरण नहीं हुआ जिससे दिल्ली सरकार को अब तक करोड़ों की राजस्व की हानि तो हुई ही, यह भी साबित हो गया कि वह कारखानेदारों और दुकानदारों के आगे कितनी असहाय है। प्राप्त सूचनाओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि श्रम विभाग के अधिकारियों की दिलचस्पी मुक्त बंधुआ-बाल मजदूरों के पुनर्वास से कहीं इस निमित्त आए धन को जन- जागरूकता के नाम पर बंदरबांट करने में अधिक है। और इस इस तरह वहां के अधिकारियों ने कई करोड़ रुपये का वारा-न्यारा कर डाला। मेट्रो रेल और कॉमनवेल्थ गेम्स के रमिकों के बारे में भी इस प्रकार के सारे तथ्य सामने आए, पर चूंकि पूरे कुएं में भांग पड़ी है, इसलिए तत्काल निदान निकलना मुश्किल है। दिल्ली ही की तरह अन्य राज्य सरकारों की भी दिलचस्पी बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास में नहीं थी। पर सूचना अधिकार अधिनियम के तहत लगातार सूचना मांगने से राज्य सरकारों और अधिकारियों पर दबाव बढ़ा है और मामले मे तेजी आई है। पश्चिम बंगाल ने इस मामले में सबसे अधिक तेजी दिखाई। बिहार के 10 से 15 वर्ष पूर्व मुक्त बाल एवं बंधुआ मजदूरों को भी पुनर्वास राशि मिलने लगी है। इस दबाव के चलते मुक्त बाल एवं बंधुआ मजदूरों के लिए बिहार सरकार ने अपने हिस्से का पैसा जिलों को भेज दिया है, पर स्टाफ की कमी से काम तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है। वहां बच्चों की शिक्षा पर भी अब जोर दिया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में भी दिखा असर
उत्तर प्रदेश सरकार की तंद्रा इस प्रकार के सवाल उठाये जाने के बाद भंग हुई है और पुनर्वास की फाइलें दौड़ने लगी हैं। इस पूछताछ से यह भी उजागर हुआ कि वहां के ईट भट्ठों से मुक्त कराकर छत्तीसगढ़ भेजे गये हजारों बंधुआ वर्षो बीत जाने के बाद भी उसी हाल में पड़े हैं। इस मामले में वहां की सरकार का रवैया हरियाणा सरकार से अलग दिखाई नहीं पड़ता लेकिन उनके रवैयों से निराश होकर अपने प्रयास पर विराम भी नहीं लगाया जा सकता। इस अधिनियम के चलते निदरेषों पर हुए पुलिसिया जुल्म की भी अनेक दास्तानों का खुालासा हुआ, खासकर नक्सली बेल्ट में। निस्संदेह वे अधिकारी जिनकी जवाब देने की जिम्मेदारी होती है लोकसभा और विधानसभाओं में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर की तरह कभी-कभी यहां भी गोलमोल जवाब देते हैं। पर इस सबके बाद जनता को मिले इस हथियार का सचमुच कोई जवाब नहीं। तथा प्राय: ऐसे रहस्यों का पर्दाफाश होता रहता है जिसे जानकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं पर यह अधिनियम अधिकारियों की मनमानी पर अंकुश लगाने में बड़ा कारगर सिद्ध हुआ है और उसे कुछ भी गलत करने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि उसके अधिक से अधिक उपयोग के लिए जनता को प्रशिक्षित और प्रोत्साहित किया जाए।


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