साल 2003 में जन्मी आठ साल की उस बच्ची का नाम साहिन, सकीना या जौहर कुछ भी हो सकता है। लेकिन उसकी कहानी सच्ची है। वह मेरठ में है। उसे याद नहीं कि वह कब यहां लाई गई। जबसे उसने होश संभाला है, खुद को उसने मेरठ के देह व्यापार की तंग गलियों में ही पाया है। उस आठ साल की लड़की तक मेरठ के एक एनजीओ की मदद से पहुंचा। उस लड़की के जन्म का साल 2003 है लेकिन उससे मिलने के बाद वह आपको किसी भी तरह से आठ साल की छोटी बच्ची नजर नहीं आती। वह चौदह-पंद्रह साल की किशोरी की तरह दिखती है। उसके बातचीत और सोचने का अंदाज छोटी बच्ची की तरह है। पता नहीं आठ साल की उम्र में बच्चे होश संभाल पाते हैं, या नहीं। वह जैसी दिखती है, वह है नहीं। यह उस एनजीओ के कार्यकर्ताओं ने बताया। आठ साल की वह लड़की ऑक्सीटॉक्सिन के इंजेक्शन की वजह से सोलह साल की हुई है। मेरठ में उसे तैयार किया जा रहा है।
दलालों का तगड़ा नेटवर्क
एक एनजीओ की तरफ से मेरे साथ आई कार्यकर्ता की मानें तो मेरठ में इस तरह के कई मामले हैं। समय-समय पर धड़-पकड़ भी होती है। बातें मीडिया में आती हैं। बरामदगी के कुछ दिनों के बाद उस बच्ची की याद न मीडिया को रहती है, न गैर सरकारी संस्था को, और न ही पुलिस को। वह बच्ची अगर मेरठ में पकड़ी गई थी तो उसके बाद वह आगरा पहुंच जाएगी। कुल बातचीत में इशारों-इशारों में उन कार्यकर्ता ने बता दिया कि पुलिस, एनजीओ और प्रेस से अधिक चुस्तदु रुस्त नेटवर्क देश में और देश के बाहर भी दलालों का है। दिल्ली, मुम्बई से लेकर सिंगापुर तक इस तरह की ‘ऑक्सिटॉक्सिन पीड़ित बच्चियों’ को मोटी रकम लेकर भेजा जाता है।
आदमी को समझ लिया जानवर
ऑक्सीटॉक्सिन एक सस्ता हार्मोन है। जिसके इंजेक्शन का इस्तेमाल अधिक कमाई के लालच में दूधवाले गाय और भैंसों से अधिक दूध पाने के लिए करते हैं। ऑक्सीटॉक्सिन की अनुशंसा पशु चिकित्सा विज्ञान भी नहीं करता है। बावजूद इसके, इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से इसलिए हो पाता है क्योंकि यह बिना किसी पर्ची के सस्ती कीमत पर दवा की दुकानों पर उपलब्ध है। पहले जानवरों पर इसका गलत इस्तेमाल शुरू हुआ और अब इसका प्रयोग इंसानों पर हो रहा है। धीरे-धीरे हम जानवर और इंसान की खाई को पाटने में लगे हैं या खुद जानवर होते जा रहे हैं?
यौवन उभारने के लिए पशुओं की दवा
पुष्पांजलि क्रॉसले अस्पताल की वरिष्ठ गाइनोकॉलॉजिस्ट डॉ. ज्योति मिश्रा कहती हैं-‘ऑक्सिटॉक्सिन के इस्तेमाल से शरीर में विस्तार आता है। यह बात सच है। लेकिन इसका इस्तेमाल सामान्य परिस्थितयों में बेहद घातक साबित हो सकता है।’ इस इंजेक्शन के तमाम खतरे को जानने के बावजूद इसका इस्तेमाल खास मकसद से छोटी बच्चियों के ऊपर धड़ल्ले से हो रहा है। आज ऑक्सिटॉक्सिन के इस्तेमाल के लिए उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मुफीद प्रयोगशालाएं बनी हैं अलवर, धौलपुर,आगरा, मेरठ और फिरोजपुर की जमीन।
अलवर है मुख्य प्रयोगशाला
अभी अधिक दिन नहीं हुए जब राजस्थान के अलवर के दो गांवों में दिल्ली पुलिस राजधानी से लापता हुई लड़कियों की तलाश में पहुंची और यह देखकर सन्न रह गई कि इस गांव में कम उम्र की गायब लड़कियों की बड़ी संख्या थी। चौंकाने वाली बात यह भी थी कि इन लड़कियों को वहां देखरेख के साथ पाला जा रहा था। कुछ-कुछ उसी तरह जैसे बकरे की बलि चढ़ने से पहले, उसे पाला जाता है। यहां पांच-छह साल की लड़कियों को लगातार ऑक्सीटॉक्सिन का इंजेक्शन दिया जा रहा था। इस वजह से इन सभी बच्चियों की काया अगले
छह-सात महीनों में चौदह-पन्द्रह साल की किशोरियों की तरह हो जाती है बल्कि उनके स्वभाव में असामान्य यौन लालसा पैदा होती है। अलवर के जिस गांव में ये लड़कियां मिलीं, वहां किसी प्रकार का उद्योग नहीं था, न ही पशुपालन का चलन दिखाई पड़ता है लेकिन वहां की दवा की दुकानों में प्रतिबंधित ऑक्सीटॉक्सिन बेहद कम कीमत पर उपलब्ध था। उत्तर प्रदेश में वेश्या बस्तियों में रहने वाली महिलाओं के पुनर्वास के लिए लम्बे समय से काम कर रही मेरठ की अतुल शर्मा के अनुसार अलवर और मेरठ जैसे ठिकानों का इस्तेमाल छोटी उम्र की बच्चियों को लाकर उन्हें प्रशिक्षित करने के तौर पर किया जाता है। यहां इन्हें तैयार करने के बाद देश के दूसरे हिस्सों में या फिर देश के बाहर की मंडियों में भेजा जाता है।
मां-बाप की भी होती है मिलीभगत
एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी के अनुसार कई बार यह सौदा मां-बाप की सहमति से भी होता है। एक बार बच्ची गायब हो गई। उसके दो साल के बाद मां-बाप अपहरण करने वाले का नाम लेकर यह कहते हुए थाने आए कि उनकी बच्ची का अमुक आदमी ने अपहरण किया है और उनके पास अपनी देरी का कोई पर्याप्त कारण न हो तो इसका क्या अर्थ निकलता है? मामला स्पष्ट है, जब तक उन्हें तयशुदा रकम मिलती रही, वे चुप रहे। जिस दिन पैसे आने बंद हुए, वे शिकायत लेकर हाजिर हो गए। यदि परिवार वालों की सहमति से कुछ होने बात मान भी लें तो उसकी संख्या नगण्य है। इस सम्बंध में पुलिस जो भी तर्क दे लेकिन अपहरण और इस तरह के धंधे के फलने-फूलने के पीछे उसकी लापरवाही ही एक बड़ी वजह है। बात राजधानी की करें तो सिर्फ मार्च महीने में 153 लड़कियों के लापता होने का मामला दर्ज हुआ है। जब राष्ट्रीय राजधानी का आलम यह है फिर छोटे शहरों और गांवों में लड़कियों की सुरक्षा का तो ऊपरवाला ही मालिक है।
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