दुखद यह है कि तमाम आधुनिकताओं और विकास की ओर बढ़ रहे अपने देश में बाल अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। भारतीय समाज में बच्चों के शोषण के मामले ज्यादातर दबा दिए जाते हैं। घर-परिवार के लोग इसकी शिकायत भी नहीं करते। कई बार पीड़ित मासूम भी चुपचाप रह जाता है। बाल अपराध को अपने समाज में गम्भीरता से नहीं लिया जाता। इसको लेकर एक टैबू समाज में बना हुआ है। इस अपराध की रोकथाम की दिशा में ‘प्रयास’ ने उल्लेखनीय काम किया है। 2007 में बाल अपराध के तमाम पहलुओं को समझने के लिए मेरे ही नेतृत्व में एक विस्तृत स्टडी रिपोर्ट तैयार हुई थी। इस मामले की पड़ताल के लिए हम देश के 13 राज्यों में गए। इन राज्यों में 12,500 बच्चों से सवाल जवाब किए। माता-पिता, शिक्षक और पास पड़ोस के 6,000 लोगों को अलग से शामिल किया। हमने 18,500 लोगों से बात की। बाल अपराध पर यह दुनिया की सबसे विस्तृत रिपोर्ट है। यही रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल वायलेंस एगेंस्ट चिल्ड्रेन चार्टर में शामिल हुई। उसमें दूसरे नम्बर पर चीन की रिपोर्ट थी, जिसमें 5000 बच्चों से बातचीत की गई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में बाल अपराध को ज्यादा गम्भीरता से नहीं लिया जाता है लेकिन हम लोगों ने ज्यादा बच्चों तक पहुंच कर वास्तविकता का पता लगाने का काम किया। हम जब इन बच्चों की सूची बना रहे थे तो उसमें हर तबके का ख्याल रखा। इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी बच्चे कहीं भी सुरक्षित नहीं थे। तीन चौथाई बच्चे किसी न किसी तरह के शोषण के शिकार थे। शोषण के बहुतेरे रूप बच्चों का शोषण भी कई प्रकार से होता है। सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली बात यौन शोषण से जुड़ी है। और तो और घर परिवारों में बच्चों को नजरअंदाज किया जाना भी एक तरह का बाल शोषण ही है। भारत वर्ष में अमूमन 75 फीसद बच्चे इनमें से किसी न किसी तौर पर शोषित हो जाते हैं। इसमें भी शर्मसार करने वाली बात यह है कि अधिकतर मामलों देखा जाता है कि बच्चों का शोषण ज्यादातर मामले में घर-परिवार के सदस्य या फिर परिचित ही करते हैं। इसकी वजह से ही बड़े परिवारों में तो मामला कारपेट के अंदर दबा दिया जाता है जबकि मिडल क्लास भी इसकी शिकायत नहीं करना चाहते। ऐसे में ढेरों मामले ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं लिखाई जाती है।
शोषण के बहुतेरे रूप
बच्चों का शोषण भी कई प्रकार से होता है। सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली बात यौन शोषण से जुड़ी है। और तो और घर परिवारों में बच्चों को नजरअंदाज किया जाना भी एक तरह का बाल शोषण ही है। भारत वर्ष में अमूमन 75 फीसद बच्चे इनमें से किसी न किसी तौर पर शोषित हो जाते हैं। इसमें भी शर्मसार करने वाली बात यह है कि अधिकतर मामलों देखा जाता है कि बच्चों का शोषण ज्यादातर मामले में घर-परिवार के सदस्य या फिर परिचित ही करते हैं। इसकी वजह से ही बड़े परिवारों में तो मामला कारपेट के अंदर दबा दिया जाता है जबकि मिडल क्लास भी इसकी शिकायत नहीं करना चाहते। ऐसे में ढेरों मामले ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं लिखाई जाती है।
विधेयक संसद में लम्बित
इस तरह के शोषण करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, इसका भरोसा दिलाने वाला लीगल सिस्टम भी नहीं है। हमारी इस रिपोर्ट के आधार पर ही बच्चों के यौन शोषण सम्बन्धित कानून संसद में प्रस्तावित है, जिसके लागू होने पर बाल यौन शोषण पर रोकथाम लगाने में मदद मिलेगी। यह बात सही है कि जागरूकता के अभाव में बच्चों का शोषण होता है। कई बार यह लापरवाही में भी हो जाता है लेकिन शोषण केवल शिक्षा और जागरूकता के अभाव की वजह से होता है, तर्कसंगत नहीं है। पश्चिमी समाज तो भारत से कहीं ज्यादा शिक्षित और जागरूक है फिर भी बच्चों के शोषण के वीभत्स रूप मिलते हैं।
विक्षिप्त मानसिकता दोषी
दरअसल, बच्चों का शोषण करने वाले लोग खास तरह की मनोवृत्ति वाले लोग हैं। आप उन्हें विक्षिप्त कह सकते हैं। दूसरे देशों में ऐसे लोगों की पहचान कर उन पर नजर रखने की कोशिश होती है। हमारे यहां अब तक ऐसी कोई कोशिश नहीं हुई है, जिसमें बच्चों का शोषण करने वाले लोगों का डाटा बेस तैयार हो सके। ‘प्रयास’ इस पहलू पर काम कर रहा है। हमारी कोशिश नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो की तरह ही बाल अपराध के मामलों का एक डाटा बेस बनाने की है। सबको शिक्षा देने के अधिकार को लागू किए जाने के बाद भी करीब 10 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं। करीब 3.5 करोड़ बच्चों का कोई घर बार नहीं है, वे सड़कों पर जीवन गुजारने को मोहताज हैं और इनमें तमाम तरह की कोशिशों के चलते महज 36000 बच्चों के लिए छत मुहैया हो सकी है। भारत की सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति कुछ इस तरह की बच्चों का टारगेट करना बेहद आसान है। यही वजह है कि भारत में चाइल्ड सेक्स को टूरिज्म से जोड़ दिया गया है। देश में हर साल 4 लाख बच्चे व्यावसायिक सेक्स कारोबार का हिस्सा बन जाते हैं, जिनका शोषण विदेशी पर्यटकों द्वारा किया जाता है। ऐसे कई ठिकाने उभरे हैं, जहां बच्चों के यौन शोषण का खेल संगठित कारोबार का रूप ले चुका है। इन मामलों में एक बार गिरफ्तार लोगों पर हमेशा नजर रखने की जरूरत है। बाल अपराध के अलावा हाल के दिनों में बच्चों के भी विभिन्न अपराधों में संलिप्ता बढ़ी है। लेकिन यह पहलू अभी चिंताजनक नहीं है। बच्चों द्वारा होने वाले अपराध बहुत कम हैं। देश की आबादी का 42 फीसद हिस्सा बच्चों का है, जिनकी उम्र 18 साल से कम है। यह आबादी कुल अपराध का महज 2 फीसद हिस्सों में शामिल है। लेकिन इस पहलू में एक चिंता की बात यह है कि हाल के दिनों में बच्चों की अपराध में संलिप्ता बढ़ी है। बच्चे कहीं ज्यादा गंभीर अपराध भी करने लगे हैं। यह भी देखा गया है कि उनका इस्तेमाल संगठित तौर पर किया जा रहा है। वे सोची- समझी साजिश के तहत आपराधिक कायरे को अंजाम दे रहे हैं।
बाल-वयस्क अपराध समान नहीं
पुलिस व्यवस्था में कई लोग हैं जिनका मानना है कि 15 साल से अधिक उम्र के बच्चे अगर अपराध में शामिल हैं तो उसके लिए भी वही कानून होना चाहिए जो 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए है। लेकिन यह सोच सही नहीं है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की मान्यताओं के मुताबिक भी 18 साल तक की उम्र बच्चों की होती है, उन्हें बड़ा नहीं माना जा सकता है। हां, यह हो सकता है कि पुलिस व्यवस्था, गैर सरकारी संगठन और समाज को मिलकर ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां न तो बच्चों पर अपराध होना चाहिए और न ही वे अपराध में संलिप्त हों। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बाल अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए देश भर में विशेष बाल न्यायालय बनाए जाएं। देश भर में करीब 700 जिले हैं तो इतने ही बाल न्यायालय होने चाहिए। भारत में कुल मिलाकर 16 हजार थाने हैं। हर थाने में बाल विकास अधिकारी की नियुक्ति की जरूरत है। दरअसल, हमें यह समझना होगा कि बच्चों के दिमाग पर किसी शोषण का असर लम्बे समय तक कायम रहता है और उनका विकास थम जाता है। जब हम इस नासूर को गम्भीरता से समझेंगे तभी इसकी रोकथाम के लिए सार्थक कदम उठाए जाएंगे।
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